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Jharkhand: दुष्कर्म से जन्में बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाएगी सरकार, HC का बड़ा फैसला; 12वीं तक मुफ्त शिक्षा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: प्रशांत तिवारी Updated Tue, 09 Jun 2026 10:46 PM IST
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सार

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामलों की जांच और पीड़ितों के अधिकारों को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने 15 दिनों में प्रारंभिक जांच, दो महीने में अंतिम जांच, टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध, पीड़िताओं के पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा और हेल्पलाइन 181 को प्रभावी बनाने जैसे महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं।

Jharkhand HC issues guidelines on handling exploitation cases sets timelines for probe
झारखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िताओं और उनके बच्चों के पुनर्वास को लेकर एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि दुष्कर्म की घटनाओं से जन्मे बच्चों को 12वीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इतना ही नहीं, यदि ये बच्चे भविष्य में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे आईआईटी, एनआईटी, एम्स या आईआईएम में प्रवेश पाने में सफल होते हैं तो उन्हें विशेष छात्रवृत्ति भी दी जाए। कोर्ट ने इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का भी निर्देश दिया है।

स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया फैसला
मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने दुष्कर्म पीड़िताओं की सुरक्षा, सम्मान और पुनर्वास से जुड़ी एक स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश दिया। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िताओं और उनके बच्चों को केवल कानूनी सहायता ही नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक सुरक्षा भी मिलनी चाहिए, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।

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पीड़िताओं के साथ समाज के व्यवहार पर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने समाज के रवैये पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि कई मामलों में दुष्कर्म पीड़िताओं के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो वे खुद आरोपी हों। अदालत ने कहा, "हमें यह देखकर गहरा दुख होता है कि कुछ परिस्थितियों में दुष्कर्म पीड़िताओं का उपहास किया जाता है और उनके साथ दुर्व्यवहार होता है। कई बार पीड़िताओं और उनके परिवारों का सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता है, जिससे उन्हें भारी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।" कोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में पीड़िताओं को सामाजिक दबाव के कारण अपना घर तक छोड़ना पड़ता है। हालांकि अदालत ने उम्मीद जताई कि समय के साथ समाज का यह रवैया बदलेगा और पीड़िताओं को सम्मान मिलेगा।
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पुलिस को दिए संवेदनशीलता से काम करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामलों की जांच और पीड़िताओं से व्यवहार को लेकर पुलिस प्रशासन के लिए भी विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िताओं के साथ पूरी संवेदनशीलता और सम्मान के साथ पेश आना पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी है। जांच के दौरान ऐसा माहौल बनाया जाए, जहां पीड़िता बिना किसी डर, दबाव या झिझक के अपनी बात रख सके।

महिला अधिकारी ही दर्ज करें पीड़िता का बयान
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जहां संभव हो, दुष्कर्म पीड़िता का बयान सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक की महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज किया जाए। अदालत का मानना है कि इससे पीड़िता अधिक सहज महसूस करेगी और मामले की सही जानकारी सामने आ सकेगी।

जीरो एफआईआर दर्ज करना होगा अनिवार्य
हाईकोर्ट ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि दुष्कर्म के मामलों में अधिकार क्षेत्र की परवाह किए बिना अनिवार्य रूप से जीरो एफआईआर दर्ज की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पीड़िता को केवल क्षेत्राधिकार के आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। इसलिए शिकायत मिलने पर तुरंत जीरो एफआईआर दर्ज कर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।

पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन पर जोर
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िताओं और उनके बच्चों का पुनर्वास केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और बेहतर भविष्य के अवसर भी मिलने चाहिए। अदालत का यह फैसला न केवल पीड़िताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, बल्कि यह उनके बच्चों के भविष्य को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने की दिशा में भी एक बड़ी पहल है।

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