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Lal Bahadur Shastri Punyatithi 2026: जब देश भूखा था, प्रधानमंत्री ने खुद रखा उपवास; जानिए शास्त्री जी का त्याग
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवानी अवस्थी
Updated Fri, 09 Jan 2026 12:55 PM IST
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सार
Lal Bahadur Shastri death anniversary 2026: लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि 11 जनवरी को मनाई जाती है। इस वर्ष शास्त्री जी की पुण्यतिथि के मौके पर उनके जीवन से जुड़ी रोचक बातें जानिए, जो हर किसी को नहीं पता।
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री
- फोटो : instagramm
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विस्तार
Lal Bahadur Shastri Death Anniversary 2026 : भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो शोर नहीं मचाते, लेकिन युग बदल देते हैं। लाल बहादुर शास्त्री उन्हीं में से एक थे। वे सादगी की प्रतिमूर्ति, संकल्प की चट्टान और नैतिक राजनीति के अंतिम महान प्रतीक थे। उनकी पुण्यतिथि सिर्फ एक तारीख नहीं, एक चेतावनी है कि सत्ता सेवा के लिए होती है, सुविधा के लिए नहीं। आज जब राजनीति ब्रांडिंग, प्रचार और ताकत के प्रदर्शन में उलझी है, शास्त्री याद दिलाते हैं कि नेतृत्व का असली वजन चरित्र में होता है, पोस्टर में नहीं। उनका जीवन बताता है कि कम बोलकर भी बड़ा काम किया जा सकता है, अगर नीयत साफ हो।
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लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि 11 जनवरी को मनाई जाती है। इस वर्ष शास्त्री जी की पुण्यतिथि के मौके पर उनके जीवन से जुड़ी रोचक बातें जानिए, जो हर किसी को नहीं पता।
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सादगी में महानता की परिभाषा
लाल बहादुर शास्त्री का जीवन बताता है कि महान बनने के लिए ऊंची आवाज नहीं, ऊंचा चरित्र चाहिए। प्रधानमंत्री होते हुए भी वे रेल की सेकेंड क्लास यात्रा को अपमान नहीं मानते थे। उनके पास न बंगला था, न बैंक बैलेंस। बस भरोसा था कि जनता उन्हें अपना मानेगी।
‘जय जवान, जय किसान’
1965 के युद्ध और खाद्यान्न संकट के दौर में दिया गया यह नारा आज भी भारत की आत्मा है। शास्त्री जानते थे कि देश की रक्षा बंदूक से और देश की भूख हल से होती है। यह नारा भारत की रीढ़, जवान और किसान को सम्मान देने की ऐतिहासिक घोषणा थी।
गरीबी में जन्म, संघर्ष में जीवन
1904 में मुगलसराय में जन्मे शास्त्री ने बचपन में ही पिता को खो दिया। नाव से गंगा पार कर स्कूल जाना, भूखे रहकर पढ़ाई करना, ये किस्से प्रेरक नहीं, बल्कि आज की सुविधाभोगी राजनीति पर करारा तमाचा हैं।
प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी निजी बलिदान
जब देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब शास्त्री ने हफ्ते में एक दिन उपवास का आह्वान किया। वे खुद इसका पालन करते थे। यहां तक कि उन्होंने देश के लिए अपने परिवार की सुख-सुविधाओं तक को त्याग दिया।
ताशकंद समझौता और रहस्यमयी मृत्यु
10 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका निधन आज भी सवालों से घिरा है। आधिकारिक तौर पर इसे हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन परिवार और कई विशेषज्ञों ने जांच की मांग उठाई। भारत ने एक ईमानदार नेता खोया, लेकिन सच्चाई आज भी अधूरी है।
नेतृत्व जो सत्ता से नहीं, संस्कार से आया
शास्त्री न करिश्माई वक्ता थे, न भीड़ को उकसाने वाले नेता। उनकी ताकत थी नैतिक साहस। वे निर्णय लेते समय लोकप्रियता नहीं, राष्ट्रहित को तरजीह देते थे।