Budget For Buddha Circuit: बजट में बुद्ध सर्किट का एलान, नॉर्थ ईस्ट की पहाड़ियों में बसे शांति के तीर्थ
दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए नॉर्थ ईस्ट एक नया आध्यात्मिक द्वार बन सकता है। यह सर्किट रोज़गार देगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करेगा, लेकिन उससे भी बड़ा लाभ भारत की सॉफ्ट पावर का विस्तार है।
विस्तार
बजट में बुद्ध तीर्थ को लेकर किया गया एलान केवल इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत को पुनर्जीवित करने की पहल है। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा, ये राज्य मिलकर एक ऐसा बौद्ध सर्किट बनाएंगे, जहां प्रकृति, ध्यान और इतिहास एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
बुद्ध सर्किट का अर्थ धीमी यात्रा, गहरा अनुभव और भीतर की शांति से है।। नॉर्थ ईस्ट के ये बौद्ध स्थल हमें याद दिलाते हैं कि बुद्ध केवल गया में नहीं, हर उस जगह हैं जहाँ करुणा और मौन है। नॉर्थ ईस्ट लंबे समय तक मुख्यधारा के पर्यटन से दूर रहा, लेकिन यहाँ बौद्ध परंपरा किताबों में नहीं, जीवन में बसती है।
सरकार का लक्ष्य इस सर्किट को बेहतर कनेक्टिविटी, सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटकों से जोड़ने का है। खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए नॉर्थ ईस्ट एक नया आध्यात्मिक द्वार बन सकता है। यह सर्किट रोज़गार देगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करेगा, लेकिन उससे भी बड़ा लाभ भारत की सॉफ्ट पावर का विस्तार है।
तवांग, अरुणाचल प्रदेश
अरुणाचल प्रदेश का तवांग मठ भारत का सबसे बड़ा और एशिया के प्रमुख बौद्ध मठों में एक है। बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच स्थित यह मठ केवल इमारत नहीं, अनुशासन और करुणा का जीवित केंद्र है। यहां सुबह की प्रार्थनाओं में पहाड़ भी ध्यानस्थ हो जाते हैं।
सिक्किम
सिक्किम में बौद्ध धर्म कोई दर्शनीय स्थल नहीं, बल्कि जीवन शैली है। रुमटेक मठ, पेमायांग्त्से और ताशिदिंग जैसे स्थल बौद्ध दर्शन को सरल, शांत और गहरे रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहां यात्रा का मतलब दौड़ नहीं, ठहराव है।
असम
असम के कुछ क्षेत्रों में बौद्ध प्रभाव प्राचीन व्यापार मार्गों से जुड़ा रहा है। यहाँ के बौद्ध स्थल बताते हैं कि बुद्ध का मार्ग केवल संन्यास नहीं, संतुलन सिखाता है ।
मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा
इन राज्यों में बौद्ध स्थल कम प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनकी विशेषता यही है। यहाँ भीड़ नहीं, शुद्ध अनुभव है। छोटे मठ, स्थानीय परंपराएं और जनजातीय संस्कृति सब मिलकर बुद्ध के ‘मध्यम मार्ग’ को जीवंत करते हैं।
