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Bhopal News: मोबाइल-लाइफस्टाइल से बिगड़ रही बच्चों की थायराइड ग्रंथि, युवाओं में तेजी से बढ़ा हाइपोथाइरॉएडिज्म
न्यूज डेस्क,अमर उजाला भोपाल
Published by: संदीप तिवारी
Updated Tue, 03 Feb 2026 05:41 PM IST
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सार
मोबाइल की लत, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक तनाव के कारण बच्चों व युवाओं में हाइपोथाइरॉएडिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसे देखते हुए भोपाल में आयुष मंत्रालय और शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय ने विशेषज्ञ उपचार केंद्र शुरू किया है, जहां समग्र इलाज किया जा रहा है।
शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मोबाइल पर घंटों बिताया जाने वाला समय, शारीरिक गतिविधियों की कमी और लगातार मानसिक तनाव अब बच्चों और युवाओं की थायराइड सेहत पर भारी पड़ने लगा है। शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल की नोडल अधिकारी डॉ. जूही गुप्ता ने बताया कि बच्चों में थायराइड ग्रंथि की अस्मिता और अनियमितताएं तेजी से सामने आ रही हैं, जिनमें सबसे ज्यादा मामले हाइपोथाइरॉएडिज्म के हैं। इसी बढ़ती चुनौती को देखते हुए आयुष मंत्रालय भारत सरकार और शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल द्वारा हाइपोथाइरॉएडिज्म का विशेषज्ञ उपचार केंद्र शुरू किया गया है। यहां होम्योपैथी के साथ योग, आहार चिकित्सा और प्राकृतिक पद्धतियों के जरिए रोग की जड़ पर काम किया जा रहा है।
थायराइड हार्मोन में असंतुलन की यह है बड़ी वजह
डॉ. जूही गुप्ता के अनुसार आज का युवा वर्ग शारीरिक रूप से निष्क्रिय होता जा रहा है। बैठे-बैठे काम करना, लगातार मोबाइल में लगे रहना और दिमाग को पर्याप्त आराम न मिलना थायराइड हार्मोन में असंतुलन की बड़ी वजह बन रहा है। उन्होंने कहा कि बच्चे सोते समय भी मानसिक रूप से मोबाइल से जुड़े रहते हैं, जिससे हार्मोनल वेरिएशन बढ़ रहा है और धीरे-धीरे कई बीमारियां शरीर में स्थापित हो रही हैं।
यह भी पढ़ें-मोहन यादव ने कहा- केंद्रीय बजट में है भविष्य की संभावनाएं, 18 को आएगा एमपी का बजट
पहचान शुरुआती अवस्था में हो जाए तो कंट्रोल संभव
उपचार से पहले प्रत्येक मरीज का बॉडी कंपोजिशन एनालिसिस किया जाता है, जिससे व्यक्ति-विशेष के अनुसार उपचार योजना बनाई जा सके। यही कारण है कि बड़ी संख्या में मरीज इस केंद्र से लाभ ले रहे हैं।डॉ. जूही गुप्ता ने बताया कि यदि हाइपोथाइरॉएडिज्म की पहचान शुरुआती अवस्था में हो जाए तो केवल होम्योपैथी उपचार से ही बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। गंभीर मामलों में एलोपैथिक दवाओं को सहायक रूप में शामिल किया जाता है, लेकिन पहले से चल रही दवाओं को बिना विशेषज्ञ सलाह के बंद नहीं किया जाता।
यह भी पढ़ें-एक माह बाद भी जांच ठप, SIT कार्यालय पहुंचे कांग्रेसी, आरोप-महापौर और अफसरों को बचाया जा रहा
महिलाओं में भी बढ़ी बीमारी
विशेषज्ञों के अनुसार हाइपोथाइरॉएडिज्म केवल वजन बढ़ने की समस्या नहीं है। महिलाओं में यह अनियमित माहवारी के रूप में सामने आता है, जबकि बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास पर इसका सीधा असर पड़ता है। लंबे समय तक अनदेखी करने पर डायबिटीज, मोटापा और अन्य हार्मोनल रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बीमारी का इलाज कम उम्र में शुरू कर दिया जाए तो इसके दीर्घकालिक और अनुवांशिक प्रभावों को भी काफी हद तक रोका जा सकता है।
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थायराइड हार्मोन में असंतुलन की यह है बड़ी वजह
डॉ. जूही गुप्ता के अनुसार आज का युवा वर्ग शारीरिक रूप से निष्क्रिय होता जा रहा है। बैठे-बैठे काम करना, लगातार मोबाइल में लगे रहना और दिमाग को पर्याप्त आराम न मिलना थायराइड हार्मोन में असंतुलन की बड़ी वजह बन रहा है। उन्होंने कहा कि बच्चे सोते समय भी मानसिक रूप से मोबाइल से जुड़े रहते हैं, जिससे हार्मोनल वेरिएशन बढ़ रहा है और धीरे-धीरे कई बीमारियां शरीर में स्थापित हो रही हैं।
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पहचान शुरुआती अवस्था में हो जाए तो कंट्रोल संभव
उपचार से पहले प्रत्येक मरीज का बॉडी कंपोजिशन एनालिसिस किया जाता है, जिससे व्यक्ति-विशेष के अनुसार उपचार योजना बनाई जा सके। यही कारण है कि बड़ी संख्या में मरीज इस केंद्र से लाभ ले रहे हैं।डॉ. जूही गुप्ता ने बताया कि यदि हाइपोथाइरॉएडिज्म की पहचान शुरुआती अवस्था में हो जाए तो केवल होम्योपैथी उपचार से ही बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। गंभीर मामलों में एलोपैथिक दवाओं को सहायक रूप में शामिल किया जाता है, लेकिन पहले से चल रही दवाओं को बिना विशेषज्ञ सलाह के बंद नहीं किया जाता।
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महिलाओं में भी बढ़ी बीमारी
विशेषज्ञों के अनुसार हाइपोथाइरॉएडिज्म केवल वजन बढ़ने की समस्या नहीं है। महिलाओं में यह अनियमित माहवारी के रूप में सामने आता है, जबकि बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास पर इसका सीधा असर पड़ता है। लंबे समय तक अनदेखी करने पर डायबिटीज, मोटापा और अन्य हार्मोनल रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बीमारी का इलाज कम उम्र में शुरू कर दिया जाए तो इसके दीर्घकालिक और अनुवांशिक प्रभावों को भी काफी हद तक रोका जा सकता है।

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