धार भोजशाला: सरस्वती की साधना बनाम शुक्रवार की नमाज, प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती; क्या कहता है इतिहास?
Dhar Bhojshala: धार की भोजशाला में बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक ही दिन पड़ने से तनाव की स्थिति बनी है। प्रशासन पुराने फार्मूले पर निर्भर है। विवाद का इतिहास धार्मिक दावों, परंपराओं और अदालती व्यवस्थाओं से जुड़ा रहा है। आइये विस्तार से समझते हैं।
विस्तार
धार स्थित भोजशाला परिसर में शुक्रवार को बसंत पंचमी और नमाज के एक ही दिन पड़ने के चलते किसी भी तरह के टकराव की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक पुलिस बंदोबस्त कर दिया है। हालांकि, शांति बनाए रखने की इस कवायद में अफसरों को किसी नए प्रयोग से ज़्यादा भरोसा उस फार्मूले पर है, जिसे करीब दस साल पहले यानी वर्ष 2016 में आजमाया गया था। उस दौरान न तो दोनों समाज आमने-सामने आए थे और न ही भोजशाला परिसर को खाली कराने की नौबत आई थी।
इसी बीच मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की ओर से सांकेतिक पूजा को लेकर दिया गया बयान भी इस ओर इशारा कर रहा है कि इस बार भी प्रशासन की रणनीति लगभग वही रहेगी। संभावना जताई जा रही है कि भोजशाला पहुंचने वाले उत्सव समिति के जुलूस को मुख्य द्वार पर रोका नहीं जाएगा और प्रवेश अपेक्षाकृत सहज रहेगा। वहीं, कमाल मौला मस्जिद वाले हिस्से को टेंट लगाकर ढकने की तैयारी है, जहां सीमित संख्या में सांकेतिक नमाज अदा कराई जाएगी। पिछली बार यह रणनीति प्रशासन की ओर से सार्वजनिक नहीं की गई थी, लेकिन इस बार पहले ही मुस्लिम समाज की तरफ से सांकेतिक नमाज को लेकर बयान सामने आ चुका है।
अब सवाल यह है कि भोजशाला को लेकर ऐसी स्थिति क्यों बनती है और प्रशासन को इस बार वर्षों पुराने फार्मूले पर ही क्यों भरोसा करना पड़ रहा है? इसकी जड़ें भोजशाला के उस ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद में छिपी हैं, जो दशकों से समय-समय पर उभरता रहा है। आइए, इस पूरे मामले को समझने के लिए इतिहास के पन्ने पलटते हैं।
भोजशाला का इतिहास
दरअसल, हिंदू समाज का दावा है कि मध्यप्रदेश में स्थित धार में सन् 1034 में परमार शासक महाराज भोज ने ज्ञान की साधना और मां सरस्वती की आराधना के लिए मां सरस्वती मंदिर भोजशाला का निर्माण करवाया। यह नालंदा, तक्षशिला की तरह एक विशाल आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था। सैकड़ों अलंकृत लाल स्तंभों पर आधारित सभा भवन के शिखर पर देवी-देवताओं की मूर्तियां शोभायमान थीं। इस भवन में माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, भास्कर भट्ट, धनपाल, मानतुगाचार्य जैसे प्रकाण्ड विद्वान अध्ययन व अध्यापन करते थे। भवन के मध्य में विशाल यज्ञकुंड हैं, जिसमें सन् 1035 में अनेक राजाओं की उपस्थिति में 40 दिवसीय यज्ञ के साथ ही मंदिर के गर्भगृह में मूर्तिकार मनथल द्वारा मकराना संगमरमर की गढ़ी मां सरस्वती की अप्रतिम सौंदर्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा बसंत पंचमी के दिन की गई।
अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया
सन् 1269 में अरब मूल के कमाल मौलाना धार आकर बसे। 30 वर्ष बाद सन् 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने परमारों के अभेदय माने जाने वाले मालवा पर आक्रमण कर इस्लामी राज्य की स्थापना की और भोजशाला सहित अनेक ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के स्थलों को ध्वस्त किया। सन् 1401 में दिलावर खां गौरी ने मालवा पर अपना राज्य घोषित कर विजय मंदिर को नष्ट किया। सन् 1514 में मेहमूद शाह खिलजी द्वितीय ने आक्रमण कर भोजशाला को मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयत्न किया। खिलजी ने ही कमाल मौलाना की याद में भोजशाला के बाहर एक मकबरा मृत्यु के 204 वर्षों बाद बनवाया, जबकि कमाल मौलाना की मृत्यु सन् 1310 में अहमदाबाद में हुई थी।
वाग्देवी की प्रतिमा लंदन पहुंची
अंग्रेजों के शासनकाल में सन् 1875 में भोपावर का पाॅलिटिकल एजेंट मेजर किनकैड ने भोजशाला की खुदाई करवाकर मुगल आक्रमणकारियों द्वारा खंडित कर जमीन में गाड़ दी गई वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन लेकर गए, जो आज भी ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट लंदन में रखी है।
तीन बार शुक्रवार को आई बसंत पंचमी
बसंत पंचमी पर सशर्त प्रवेश व पूजन तो दूसरी और मुस्लिम समाज को वर्षभर प्रति शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई। विरोध में हिंदू समाज ने भोज उत्सव समिति के नेतृत्व में प्रति मंगलवार भोजशाला के बाहर सड़क पर सत्याग्रह प्रारंभ किया। 18 फरवरी 2003 को पूजन के लिए बढ़ रहे हिंदू महिला-पुरुषों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया। 19 फरवरी को संपूर्ण धार जिले में आंदोलन हुआ, इस दौरान पुलिस की गोली से तीन हिंदू मारे गए। तब 1400 लोगों पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई। 8 अप्रैल 2003 को हिंदू समाज को सशर्त पूजन और दर्शन का अधिकार मिला। अब तक 2006, 2013 व 2016 में शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी आई है।
सर्वे में 7 प्रमुख तथ्य सामने आए
1- यहां अंदर 27 फीट तक खुदाई की गई है, जहां दीवार का ढांचा मिला है।
2- यहां से वाग्देवी, मां सरस्वती, हनुमानजी, गणेशजी समेत अन्य देवी प्रतिमा, शंख, चक्र सहित 79 अवशेष मिले हैं।
3- यहां से श्रीकृष्ण, वासुकी नाग और शिवजी की प्रतिमा मिली है।
4- स्तंभ, तलवार, दीवारों के 150 नक्काशी वाले अवशेष मिले हैं।
5- सनातनी आकृतियों वाले पत्थर मिले हैं।
6- अंडरग्राउंड अक्कल कुइया चिह्नित हुई।
7-केमिकल ट्रीटमेंट के बाद सीता-राम, ओम नम: शिवाय की आकृतियां चिह्नित हुई हैं।
98 दिन चला सर्वे
दरअसल, भोजशाला को लेकर 22 मार्च 2024 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सर्वे शुरू किया था, जो करीब 98 दिनों तक चला। भोजशाला के सर्वे में कई सनातनी मूर्तियां मिली थीं। इनमें भगवान गणेशा, शिव से लेकर अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां शामिल है। जबकि 1 हजार 700 अवशेष मिले थे। इसमें मुख्य रूप से 106 स्तभ और 82 भित्ति चित्र के भी अवशेष भी शामिल थे। 31 सिक्के भी मिले। इसमें से एक परमार कालीन था। भोजशाला को लेकर 98 दिन चले सर्वे के बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के वकील ने इंदौर बेंच में अपनी रिपोर्ट सौंप दी। बताया जा रहा हैं, कि दो हजार से अधि पेज की रिपोर्ट में एएसआई ने 1700 से ज्यादा अवशेषों का विश्लेषण कर यह बनाया था।

इसके बाद एएसआई ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर यह सर्वे हुआ था। रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंप दी गई है, और अब सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई चल रही है, जिसमें हिंदू पक्ष ने हाई कोर्ट की कार्यवाही पर लगी रोक हटाने की मांग की है। अब सुप्रीम कोर्ट की रोक को हटाने के लिए सुनवाई होनी प्रस्तावित है। हिंदू फ्रंट फॉर धर्म जस्टिस का कहना है कि भोजशाला पर धर्म स्थल उपासना अधिनियम प्रभावी नहीं हैं, इसलिए इसे हाई कोर्ट इंदौर द्वारा ही सुना जाना चाहिए।
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आम दिन लगता हैं शुल्क
शर्मा के अनुसार सन 2002 में हुए आंदोलन में तीन लोगों का बलिदान भी हुआ व आठ लोगों पर रासुका लगाया गया। साथ ही 2 हजार से ज्यादा लोगों पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेजा गया था। करीब 14 हजार लोगों पर अन्य प्रकरण दर्ज किए गए थे। इस तरह के बलिदान के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की तत्कालीन मंत्री भावना बेन चिखलिया ने आदेश दिया था कि मंगलवार को भोजशाला में पूजा अर्चना होगी, जबकि साल में एक बार बसंत पंचमी पर पूजा की जा सकती है। वहीं शुक्रवार को नमाज होगी। शेष दिन आम पर्यटकों को भोजशाला में एक रुपए के शुल्क पर प्रवेश दिया जाता है।

धार में एएसआई द्वारा संरक्षित धरोहर भोजशाला का मुद्दा पुन जन चर्चा का विषय बन चुका हैं, वर्ष 2016 के बाद करीब 10 साल बाद पुन बसंत पंचमी व शुक्रवार एक ही दिन 23 जनवरी को हा रहा है। बसंत पंचमी को जहां हिंदू समाज करता हैं, वहीं दूसरी और मुस्लिम समाज को दोपहर के समय नमाज भी पढता है। ऐसे में शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखना अब प्रशासन के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय बना चुका हैं, जिसको लेकर प्रशासन ने तैयारियां पिछले 15 दिनों से शुरु कर दी थी। लॉ-एंड-आडॅर की पूरी जिम्मेदारी इंदौर कमिश्नर व इंदौर आईजी के हाथों में है। दो दिन बाद 23 जनवरी वसंत पंचमी को सुबह सात बजे से ही पूजन शुरु हो जाएगा। भोजशाला में मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा पुनः स्थापित करने के संकल्प को लेकर हिंदू समाज आंदोलनरत है। यह अयोध्या राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद सबसे लंबे और प्रभावशाली आंदोलनों में गिना जाता है।
1952 से पड़ी आंदोलन की नींव
भोजशाला परिसर में वसंत पंचमी उत्सव मनाने की शुरुआत वर्ष 1952 में हुई। धीरे-धीरे यह धार्मिक आयोजन सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ता गया। 1994 से 2003 के बीच भोजशाला को लेकर कई बड़े प्रदर्शन हुए। इस दौरान समाज के लोग अपने संकल्प पर डटे रहे। आंदोलन अपने चरम पर तब पहुंचा जब 2003 में भोजशाला के ताले खोले गए और हिंदू समाज को प्रत्येक मंगलवार पूजा का अधिकार मिला। उसी कड़ी में वसंत पंचमी पर अखंड पूजा का संकल्प सामने आया।
इतिहास और पृष्ठभूमि
इतिहासक के अनुसार भोजशाला का निर्माण 1034 ईस्वी में परमार शासक महाराजा भोज ने कराया था। इसे अध्ययनशाला के रूप में स्थापित किया गया, जहां भाषा, विद्या और संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता था। भोजशाला को मां वाग्देवी के प्राकट्य स्थल के रूप में भी जाना जाता है। महाराजा भोज ने 84 ग्रंथों की रचना की थी। इतिहास के अलग- अलग कालखंडों में 1305 से 1514 के बीच अलाउद्दीन खिलजी, दिलावर खां गौरी और महमूद खिलजी द्वितीय के आक्रमणों से इस इमारत को क्षति पहुंची।

लगा था ताला
इतिहास में भोजशाला का महत्व निर्विवाद है, लेकिन इसके स्वरूप और अधिकार को लेकर हिंदू और मुस्लिम समाज के अपने-अपने दावे हैं। मुस्लिम समाज इसे कमाल मौलाना मस्जिद मानते हुए नमाज अदा करता रहा है, वहीं हिंदू समाज वसंत पंचमी पर पूजा करता आया है। वर्ष 1998 में वसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ आने पर विवाद गहराया। इसके पहले 12 मई 1997 को तत्कालीन कलेक्टर वीबी सुब्रह्मण्यम ने भोजशाला पर ताले लगवा दिए थे। ताले खुलवाने की मांग ने जनआंदोलन का रूप दे दिया।
तनाव बढ़ता हैं
2003 में ताले खोले गए और 7 अप्रेल को एएसआइ ने आदेश जारी किया। इसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति दी गई। आदेश में वसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा का अधिकार भी दिया गया, लेकिन यदि वसंत पंचमी शुक्रवार को पड़े तो स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। इसी अस्पष्टता के कारण जब-जब वसंत पंचमी शुक्रवार को आई, तब पूजा और नमाज़ को लेकर प्रशासन, हिंदू संगठनों और मुस्लिम समाज के बीच तनाव की स्थिति बनी।

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