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Padma Shri Award 2026: बुंदेली लोक कला और पारंपरिक युद्ध कला के संरक्षक भगवानदास रैकवार को पद्मश्री
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: आनंद पवार
Updated Sun, 25 Jan 2026 06:13 PM IST
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सार
बुंदेली लोक कला और परंपरागत युद्ध कलाओं के संरक्षण में जीवन समर्पित करने वाले भगवानदास रैकवार को पद्मश्री सम्मान 2026 से सम्मानित किया गया है। उनका चयन ‘गुमनाम नायकों’ की श्रेणी में किया गया है, जिन्होंने बिना प्रचार समाज और संस्कृति के लिए निस्वार्थ सेवा की।
भगवानदास रैकवार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बुंदेलखंड की माटी, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को जीवन समर्पित करने वाले लोक कलाकार भगवानदास रैकवार को वर्ष 2026 के पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है। यह सम्मान उन्हें बुंदेली लोक कला और परंपरागत युद्ध कलाओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार में उनके अतुलनीय योगदान के लिए प्रदान किया जा रहा है। भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘गुमनाम नायकों’ की श्रेणी में चयनित किया गया है। ऐसे साधक, जिन्होंने बिना किसी बड़े मंच या प्रचार के समाज और संस्कृति के लिए निस्वार्थ भाव से काम किया। भगवानदास रैकरवार का जन्म 2 जनवरी 1944 को स्व. गोरेलाल रायकवार के घर हुआ। सागर के रहने वाले रैकवार बुंदेलखंड की उस समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जिसमें लोक जीवन, शौर्य, कला और साधना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने अखाड़ा संस्कृति, पारंपरिक युद्ध कला, लोक नृत्य, वाद्य और शस्त्र विद्या को न केवल संरक्षित किया, बल्कि नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी सतत प्रयास किया। लाठी, भाला, तलवार, ढाल, त्रिशूल, फरसा और कबड्डी जैसी पारंपरिक युद्ध कलाओं के प्रशिक्षण के साथ उन्होंने बुंदेली लोक परंपराओं को जीवित रखा।
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बुंदेलखंड की वीर परंपरा से रूबरू कराया
रैकवार का जीवन संघर्ष, साधना और सेवा की मिसाल है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने श्री छत्रसाल व्यायामशाला परिसर को सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। यहां उन्होंने युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ अनुशासन, संस्कृति और इतिहास से जोड़ने का कार्य किया। उनके लिए कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-दर्शन है। वे देश-प्रदेश के अनेक लोक उत्सवों, सांस्कृतिक महोत्सवों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बुंदेली लोक कला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। महाकुंभ, लोक रंग, राष्ट्रीय नाट्य समारोह, सांस्कृतिक मेले और राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बुंदेलखंड की वीर परंपरा से रूबरू कराया। उनके प्रयासों से कई विलुप्तप्राय लोक कलाएं पुनर्जीवित हुईं और स्थानीय कलाकारों को नई पहचान मिली।
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कला को साधना बनाया
भगवानदास रैकवार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने कला को जीविका नहीं, साधना बनाया। उन्होंने कभी प्रचार की चाह नहीं रखी, न ही पुरस्कारों की दौड़ में शामिल हुए। यही कारण है कि उनका चयन ‘गुमनाम नायकों’ की श्रेणी में हुआ जहां असली कर्म को पहचान मिलती है।
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बुंदेलखंड में हर्ष का माहौल
पद्मश्री-2026 की घोषणा के बाद बुंदेलखंड सहित पूरे प्रदेश में हर्ष और गर्व का माहौल है। सांस्कृतिक जगत, लोक कलाकारों और आम नागरिकों ने इसे बुंदेली संस्कृति के लिए ऐतिहासिक सम्मान बताया है। यह सम्मान न केवल भगवानदास रैकवार के जीवनकार्य की स्वीकृति है, बल्कि उन असंख्य लोक कलाकारों के लिए प्रेरणा भी है, जो आज भी परंपरा की मशाल थामे हुए हैं।
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बुंदेलखंड की वीर परंपरा से रूबरू कराया
रैकवार का जीवन संघर्ष, साधना और सेवा की मिसाल है। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने श्री छत्रसाल व्यायामशाला परिसर को सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। यहां उन्होंने युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ अनुशासन, संस्कृति और इतिहास से जोड़ने का कार्य किया। उनके लिए कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-दर्शन है। वे देश-प्रदेश के अनेक लोक उत्सवों, सांस्कृतिक महोत्सवों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बुंदेली लोक कला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। महाकुंभ, लोक रंग, राष्ट्रीय नाट्य समारोह, सांस्कृतिक मेले और राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बुंदेलखंड की वीर परंपरा से रूबरू कराया। उनके प्रयासों से कई विलुप्तप्राय लोक कलाएं पुनर्जीवित हुईं और स्थानीय कलाकारों को नई पहचान मिली।
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कला को साधना बनाया
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बुंदेलखंड में हर्ष का माहौल
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