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'गुलाबी सोने' से महके बांके बिहारी: धसान का बैकवाटर बना ग्रामीणों का रोजगार, रोजाना मथुरा पहुंच रहे कमल के फूल

Sat, 15 Aug 2026 07:56 AM IST
हिमांशु सिंह बघेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुर Published by: हिमांशु सिंह बघेल Updated Sat, 15 Aug 2026 07:56 AM IST
सार

धसान नदी के बैकवाटर में उग रहे कमल के फूल छतरपुर के ग्रामीणों के लिए रोजगार और आय का नया साधन बन गए हैं। जुलाई से नवंबर तक चलने वाले सीजन में रोजाना करीब 20 हजार फूल एकत्र कर ग्रामीण उन्हें ट्रेनों के जरिए मथुरा मंडी पहुंचाते हैं। 

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From MP Dhasan River to Banke Bihari Temple How 'Pink Gold' Lotus Farming Transformed a Village’s Economy
धसान नदी के बैकवाटर में उग रहे कमल के फूल - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

बुंदेलखंड की धरती पर धसान नदी का बैकवाटर अब ग्रामीणों के लिए रोजगार और आय का नया जरिया बन गया है। सरसेड़ गांव के कूड़ा हार क्षेत्र में नदी के ठहरे पानी में उग रहे कमल के फूल अब मथुरा-वृंदावन के मंदिरों तक पहुंच रहे हैं। यहां के कमल के फूल बांके बिहारी सहित प्रमुख देवालयों में भगवान के चरणों में अर्पित किए जा रहे हैं। कभी अनुपयोगी समझे जाने वाले बैकवाटर क्षेत्र ने दर्जनों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक तस्वीर बदल दी है।
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जुलाई से नवंबर तक चलता है कारोबार
ग्रामीणों के मुताबिक, कमल के फूलों का कारोबार जुलाई से शुरू होकर नवंबर में दीपावली तक चलता है। सावन, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, नवरात्रि और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान कमल के फूलों की मांग काफी बढ़ जाती है। चार से पांच महीने के इस सीजन में ग्रामीण अच्छी आय अर्जित कर लेते हैं। सरसेड़ और आसपास के ग्रामीणों ने पारंपरिक खेती के साथ कमल के फूलों को रोजगार का बेहतर विकल्प बनाया है। परमलाल रैकवार, सीमा रैकवार और मुन्नी रैकवार सहित कई ग्रामीण धसान नदी के बैकवाटर का उपयोग कर कमल के फूलों का संग्रह और व्यापार कर रहे हैं। ग्रामीणों के लिए यह फूल अब ‘गुलाबी सोना’ बन गया है।
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रोजाना 20 हजार तक फूलों का संग्रह
हरपालपुर और आसपास के गांवों से रोजाना 15 से 20 ग्रामीणों की टोली तड़के धसान नदी के बैकवाटर में पहुंचती है। प्रत्येक व्यक्ति करीब दो बोरे कमल के फूल एकत्र करता है। एक बोरे में लगभग 500 से 600 फूल आते हैं। इस तरह रोजाना करीब 15 हजार से 24 हजार, औसतन 20 हजार कमल के फूल एकत्र किए जाते हैं।
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ट्रेनों से सीधे मथुरा पहुंचता है माल
कमल के फूलों को मथुरा पहुंचाने के लिए ग्रामीणों ने रेल नेटवर्क को अपना जरिया बनाया है। हरपालपुर से संपर्क क्रांति एक्सप्रेस सहित अन्य ट्रेनों के जरिए ग्रामीण दिल्ली-मथुरा की ओर जाते हैं। कई बार अलग-अलग ट्रेनों के जरिए फूलों को मथुरा मंडी तक पहुंचाया जाता है। इससे कमल के फूल सुबह नदी से निकलकर अपेक्षाकृत कम समय में बड़ी मंडी तक पहुंच जाते हैं। स्थानीय स्तर पर करीब 50 पैसे की लागत या खरीद में तैयार होने वाला कमल मथुरा मंडी में पहुंचकर करीब 1.25 से 2 रुपये प्रति फूल तक बिक जाता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने पर भाव और बेहतर मिलने की बात ग्रामीण बताते हैं। मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए इन फूलों की मांग बनी रहती है।

बिचौलियों से दूरी, सीधे मंडी में बिक्री
ग्रामीणों ने फूलों को सीधे मथुरा मंडी में बेचने का तरीका अपनाया है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और बिक्री से मिलने वाला लाभ सीधे ग्रामीणों तक पहुंच रहा है। परमलाल रैकवार, सीमा रैकवार, मुन्नी रैकवार के साथ पूरन, नंदू, जीतू, पंचू, शेरू, पप्पू और हरगोविंद सहित कई ग्रामीण इस कारोबार से जुड़े हैं। धसान नदी का बैकवाटर अब केवल ठहरे हुए पानी का क्षेत्र नहीं रहा। कमल के फूलों ने इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नए केंद्र में बदल दिया है। पानी में उगा यह ‘गुलाबी सोना’ न केवल मथुरा-वृंदावन के मंदिरों तक पहुंच रहा है, बल्कि बुंदेलखंड के ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार और अतिरिक्त आय का आधार भी बन रहा है।
 
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