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Bhojshala: भोजशाला पर सुनवाई जारी, याचिकाकर्ता ने कहा- मूर्ति न होने पर भी मंदिर का स्वरूप बना रहता है
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Dinesh Sharma
Updated Wed, 08 Apr 2026 10:55 PM IST
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सार
धार भोजशाला मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई जारी रही। हिंदू पक्ष ने तर्क दिया कि प्राण-प्रतिष्ठा के बाद स्थल का स्वरूप मंदिर ही रहता है। एएसआई संरक्षित स्मारक पर वक्फ कानून लागू नहीं बताया। ऐतिहासिक साक्ष्य भी पेश किए गए।
धार में स्थित भोजशाला
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विस्तार
धार स्थित भोजशाला मामले में दायर याचिका पर तीसरे दिन बुधवार को भी मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की डबल बेंच ने मामले की सुनवाई की। बुधवार को भी हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने पक्ष रखते हुए कई साक्ष्य प्रस्तुत किए और विस्तृत बहस की। उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी मंदिर में वर्तमान में मूर्ति मौजूद न हो, तब भी उसका धार्मिक स्वरूप मंदिर का ही बना रहता है।
जैन ने कहा कि हिंदू धर्म में प्राण प्रतिष्ठा के बाद किसी स्थान का चरित्र स्थायी रूप से मंदिर का हो जाता है, जिसे बदला नहीं जा सकता। जैन ने अपनी दलीलों के पक्ष में राम जन्मभूमि विवाद पर फैसले और कृष्ण जन्मभूमि से जुड़े मामलों का हवाला देते हुए कहा कि मूर्ति को भी कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आक्रमण, अतिक्रमण या हिंसा के माध्यम से किसी मंदिर को नष्ट करने के प्रयास के बावजूद उसका मूल स्वरूप समाप्त नहीं होता।
ये भी पढ़ें- Dhar Bhojshala: : भोजशाला मामले में रखा पक्ष- एक बार मंदिर रहा स्थल हमेशा मंदिर ही माना जाता है
बहस के दौरान वक्फ एक्ट 2025 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए जैन ने कहा कि भोजशाला पर ये कानून लागू नहीं होते। उन्होंने दलील दी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारकों पर यह अधिनियम प्रभावी नहीं होता। जैन ने अदालत को यह भी बताया कि प्रतिवादी मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने अपने जवाब में स्वीकार किया है कि भोजशाला एक संस्कृत विद्यालय रहा है और यह परमार कालीन स्मारक है, जहां राजा भोज का शासन था। जवाब में संस्कृत शिलालेखों के मिलने का भी उल्लेख किया गया है।
साथ ही, सोसाइटी ने यह भी माना है कि 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान धार-मालवा क्षेत्र प्रभावित हुआ था। हिंदू पक्ष ने इसे आधार बनाते हुए तर्क दिया कि मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया था, जो सफल नहीं हुआ। अपने तर्कों के समर्थन में जैन ने गंगा नदी, नर्मदा नदी और गोवर्धन पर्वत जैसे उदाहरण देते हुए कहा कि भौतिक रूप न होने पर भी ये स्थल पूजनीय बने रहते हैं। उन्होंने कहा कि भोजशाला में मां वाग्देवी आज भी आस्था के केंद्र के रूप में विराजमान हैं और उनका पक्ष केवल आस्था नहीं बल्कि शोध आधारित तथ्यों पर आधारित है।
कल भी होगी सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई नौ अप्रैल, गुरुवार को चौथे दिन दोपहर 2:30 बजे निर्धारित की गई है, जिसमें वकील जैन भोजशाला के पक्ष में अपने तर्क जारी रखेंगे। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विनय जोशी, पार्थ यादव, मनी मुंजाल, सौरभ सिंह और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल भी उपस्थित रहे।
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जैन ने कहा कि हिंदू धर्म में प्राण प्रतिष्ठा के बाद किसी स्थान का चरित्र स्थायी रूप से मंदिर का हो जाता है, जिसे बदला नहीं जा सकता। जैन ने अपनी दलीलों के पक्ष में राम जन्मभूमि विवाद पर फैसले और कृष्ण जन्मभूमि से जुड़े मामलों का हवाला देते हुए कहा कि मूर्ति को भी कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आक्रमण, अतिक्रमण या हिंसा के माध्यम से किसी मंदिर को नष्ट करने के प्रयास के बावजूद उसका मूल स्वरूप समाप्त नहीं होता।
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बहस के दौरान वक्फ एक्ट 2025 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए जैन ने कहा कि भोजशाला पर ये कानून लागू नहीं होते। उन्होंने दलील दी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारकों पर यह अधिनियम प्रभावी नहीं होता। जैन ने अदालत को यह भी बताया कि प्रतिवादी मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने अपने जवाब में स्वीकार किया है कि भोजशाला एक संस्कृत विद्यालय रहा है और यह परमार कालीन स्मारक है, जहां राजा भोज का शासन था। जवाब में संस्कृत शिलालेखों के मिलने का भी उल्लेख किया गया है।
साथ ही, सोसाइटी ने यह भी माना है कि 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान धार-मालवा क्षेत्र प्रभावित हुआ था। हिंदू पक्ष ने इसे आधार बनाते हुए तर्क दिया कि मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया था, जो सफल नहीं हुआ। अपने तर्कों के समर्थन में जैन ने गंगा नदी, नर्मदा नदी और गोवर्धन पर्वत जैसे उदाहरण देते हुए कहा कि भौतिक रूप न होने पर भी ये स्थल पूजनीय बने रहते हैं। उन्होंने कहा कि भोजशाला में मां वाग्देवी आज भी आस्था के केंद्र के रूप में विराजमान हैं और उनका पक्ष केवल आस्था नहीं बल्कि शोध आधारित तथ्यों पर आधारित है।
कल भी होगी सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई नौ अप्रैल, गुरुवार को चौथे दिन दोपहर 2:30 बजे निर्धारित की गई है, जिसमें वकील जैन भोजशाला के पक्ष में अपने तर्क जारी रखेंगे। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विनय जोशी, पार्थ यादव, मनी मुंजाल, सौरभ सिंह और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल भी उपस्थित रहे।

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