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सत्ता और सियासत: मंत्रियों की दादागिरी और डॉ. मोहन यादव का वन लाइनर... आखिर मुख्यमंत्री तो मुख्यमंत्री है

Arvind Tiwari अरविंद तिवारी
Updated Mon, 16 Dec 2024 04:55 PM IST
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सार

कैलाश विजयवर्गीय दिल्ली जाकर अमित शाह से मिले तो डॉ. मोहन यादव ने सालभर का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की आड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यहां दस्तक दे दी। विजयवर्गीय को लेकर शाह का हमेशा सॉफ्ट कॉर्नर रहता है, पर मोदी न जाने क्यों उनसे उखड़े-उखड़े से रहते हैं। 

Power and Politics: Arvind Tiwari's column on government and governance
सत्ता औैर सियासत: प्रदेश की सियासी और प्रशासनिक हलचल के पीछे की सुगबुगाहट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अपने मंत्रिमंडल में कई वरिष्ठ नेताओं की मंत्री के रूप में मौजूदगी और उनकी राजनीतिक दादागिरी का जवाब आखिरकार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दे ही दिया। अपने मुख्यमंत्रित्वकाल का एक साल पूरा होने के मौके पर डॉ. यादव अलग-अलग अखबारों और चैनलों के प्रतिनिधियों से मुखातिब हुए। इसी दौरान जब यह मुद्दा उठा तो बहुत ही बेबाकी के साथ यादव बोल पड़े कि कोई कितना ही वरिष्ठ हो, मुख्यमंत्री आखिर मुख्यमंत्री होता है और मंत्री, मंत्री। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, नरेंद्र सिंह तोमर और राकेश सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के लिए मुख्यमंत्री का यह वन लाइनर सबकुछ समझने के लिए पर्याप्त है। 
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इसको कहते हैं कुर्सी का दबदबा
मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले एक लार्डशिप की इन दिनों तूती बोल रही है। इन्होंने जो कह दिया, वह पत्थर की लकीर के समान है। 'सरकार' भी उनकी खूब सुनते हैं और आला नौकरशाह तो उनके कहे का पालन करने में गर्व का अनुभव करते हैं। छोटी-मोटी पोस्टिंग तो इनकी आंखों के इशारे पर ही हो जाती है। पिछले दिनों हाईकोर्ट की अलग-अलग बेंच में वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। चयनित अधिवक्ताओं की सूची पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि जिन नामों पर लार्डशिप ने उंगली रख दी थी, उनका बेड़ा पार हो गया। इंदौर के जिन छह अधिवक्ताओं के आगे वरिष्ठ का तमगा जुड़ा उनमें से तीन लार्डशिप के बहुत प्रिय हैं। 

बरास्ता सीएस... दिल्ली के तार जुड़े हैं मध्य प्रदेश से 
मध्य प्रदेश को लंबे समय बाद ऐसा मुख्य सचिव मिला है, जिसके तार सीधे दिल्ली से जुड़े हुए हैं। मुख्य सचिव के रूप में अपने दो-ढाई माह के कार्यकाल में अनुराग जैन ने यह तो एहसास करवा ही दिया है कि वे हां में हां मिलाने वाले मुख्य सचिव नहीं हैं। पीएमओ में सीधी पकड़ का फायदा उन्हें मिल रहा है और दिल्ली में कामकाज का अनुभव मध्य प्रदेश में उनकी राह आसान किए हुए है। कहा तो यह भी जा रहा है कि मध्य प्रदेश से जुड़े कई मामलों में 'दिल्ली' के हित बरास्ता मुख्य सचिव ही ध्यान में रखे जा रहे हैं। बीते सप्ताह देश के मुख्य सचिवों की बड़ी बैठक में भी मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव दूसरे नौकरशाहों से हटकर अपने अलग अंदाज के कारण चर्चा में रहे। 

वे बहुत सोशल थे, ये बहुत ज्यादा वर्कोहोलिक
संघ के पदाधिकारियों एवं स्वयंसेवकों के बीच मालवा प्रांत के नए प्रांत प्रचारक राजमोहन और निवृत्तमान प्रांत प्रचारक बलिराम पटेल का तुलनात्मक अध्ययन शुरू हो गया है। राजमोहन नाक की सीध में चलने में भरोसा रखते हैं। बहुत ज्यादा टेक्नो फ्रेंडली हैं और जिसे जो काम सौंपते हैं, उससे सौ प्रतिशत परफेक्शन के साथ होने की अपेक्षा रखते हैं। खुद बहुत ज्यादा काम करते हैं और अपनी टीम से भी ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। इससे इतर पटेल बहुत सोशल थे, घुलने-मिलने में बहुत ज्यादा भरोसा रखते थे और अपनी टीम को जरूरत से ज्यादा पांव पसारने देते थे। वैसे संघ के मालवा प्रांत के मुख्यालय सुदर्शन भवन में इन दिनों जो माहौल है उसके बाद ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं। 

बोलना था मनी लांड्रिंग, कह गए मनी डार्लिंग
वरिष्ठ मंत्री तुलसी सिलावट बहुत कोशिश करते हैं, पर ज्यादातर मौके पर जुबान फिसल ही जाती है। कांग्रेस में थे, तब भी ऐसा हो जाता था और अब भी ऐसा ही हो रहा है। पिछले दिनों इंदौर में हुई यूरेशियन समूह की बैठक में मध्य प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि के नाते सिलावट को भी भाषण देने का मौका मिला। बैठक में मनी लॉन्ड्रिंग भी चर्चा का बड़ा मुद्दा था और जब सिलावट बोलने खड़े हुए तो फिर उनकी जुबान फिसल गई और आदत के मुताबिक मनी लॉन्ड्रिंग को मनी डार्लिंग कह बैठे। कार्यक्रम में ही मौजूद भाजपा के एक दिग्गज ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा कि विषय कुछ भी हो, सिलावट को जो सही लगता है, वही कहते हैं। 

कोशिश बहुत कर रहे हैं पटवारी, पर मामला जम नहीं रहा
मध्य प्रदेश में कांग्रेस संगठन को पटरी पर लाने के लिए जीतू पटवारी पूरी कोशिश कर रहे हैं। रात-दिन एक करके बूथ स्तर तक कांग्रेस का नेटवर्क खड़ा करना चाहते हैं और ब्लॉक व जिला इकाइयों को सक्रिय करना चाहते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद भी सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण जो सामने आ रहा है, वह यह है कि पार्टी के लोगों में नेता के रूप में पटवारी की स्वीकार्यता ही नहीं बन पा रही है। जब आपको कोई नेता ही नहीं माने तो फिर किसी भी प्रयास का सफल होना संदिग्ध ही है। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण पिछले आठ महीने में सामने आ चुके हैं। 

गेम, मैच एंड शो टू विवेक अग्रवाल
आला नौकरशाह विवेक अग्रवाल के बारे में यह मशहूर है कि वे जिस भी काम में हाथ डालते हैं, उसे सौ प्रतिशत अपने ही नियंत्रण में रखते हैं। इंदौर में हाल ही में हुआ यूरेशियन समूह का आयोजन इसका एक बड़ा उदाहरण है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव जैसे अहम पद पर पदस्थ अग्रवाल की असरकारक उपस्थिति तो थी ही आयोजन के सारे सूत्र भी उनके इर्द-गिर्द ही रहे। विदेशी प्रतिनिधियों ने भी उनकी भूमिका को जमकर सराहा और पांच दिन की इस कॉन्फ्रेंस में जिस दमदारी से अग्रवाल ने अलग-अलग मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया उसकी भी जमकर चर्चा रही। भारत की अगुवाई में इस कान्फ्रेंस में कई बड़े फैसले हुए। 

चलते-चलते
कैलाश विजयवर्गीय दिल्ली जाकर अमित शाह से मिले तो डॉ. मोहन यादव ने सालभर का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की आड़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यहां दस्तक दे दी। विजयवर्गीय को लेकर शाह का हमेशा सॉफ्ट कॉर्नर रहता है, पर मोदी न जाने क्यों उनसे उखड़े-उखड़े से रहते हैं। इसी का नुकसान विजयवर्गीय को हमेशा उठाना पड़ता है और फायदा उठाने वालों के लिए यह एक हथियार है। 

पुछल्ला
कहा यह गया था कि भाजपा के संगठन चुनाव में विधायकों की दादागिरी खत्म हो जाएगी और उन लोगों को तवज्जो मिलेगी जो संगठन के काम में रम जाते हैं। बात तो खूब हुई, लेकिन मामला फुस्स निकला। रायशुमारी एक ओर धरी रह गई और जैसा विधायक चाहते थे, वैसा ही हुआ। इंदौर में तो नाराज नेता अब प्रदेश नेतृत्व को कोस रहे हैं, जिसके कहने पर उन्होंने विधायकों के खिलाफ मोर्चा खोला था। 
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