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MP News: 'धोखाधड़ी किसी भी वैध कार्यवाही को कर देती है निरस्त', बोनस अंक के मामले में 13 हजार शिक्षकों को झटका

Wed, 19 Aug 2026 10:28 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Wed, 19 Aug 2026 10:28 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा चयन परीक्षा 2025 में गलत जानकारी देकर 5 प्रतिशत बोनस अंक हासिल करने वाले अभ्यर्थियों को राहत देने से इनकार कर दिया। युगलपीठ ने कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त लाभ के आधार पर समानता के सिद्धांत का सहारा नहीं लिया जा सकता। अदालत ने संशोधित मेरिट सूची के खिलाफ अपील खारिज कर दी। 

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Fraud invalidates any legitimate proceeding
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाईकोर्ट ने अपने अहम आदेश में कहा है कि धोखाधड़ी किसी भी वैध कार्रवाई को निरस्त कर देती है। धोखाधड़ी से प्राप्त लाभ के आधार पर बाद में समानता के सिद्धांत पर राहत नहीं मांगी जा सकती। हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद पाठक तथा जस्टिस बीपी शर्मा की युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ प्राथमिक शिक्षा चयन परीक्षा 2025 की संशोधित सूची जारी किए जाने के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।

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गौरतलब है कि नरसिंहपुर निवासी सोनम अगरैया एवं अन्य की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्राथमिक शिक्षा चयन परीक्षा 2025 में अपात्र अभ्यर्थियों को 5 प्रतिशत बोनस अंक दिए जाने को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि भर्ती नियम के तहत केवल भारतीय पुनर्वास परिषद से मान्यता प्राप्त विशेष शिक्षा डिप्लोमा धारक अभ्यर्थियों को बोनस अंक प्रदान करने का प्रावधान है। भर्ती के लिए जारी मेरिट सूची में 13,089 पदों के लिए लगभग 14,964 अभ्यर्थियों ने खुद को इस श्रेणी में दिखाकर बोनस अंक प्राप्त किए हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वास्तव में केवल लगभग 5,271 अभ्यर्थी ही इसकी योग्यता रखते थे।
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याचिका की सुनवाई के दौरान चयनित अभ्यर्थियों की ओर से कहा गया था कि उन्होंने भूलवश बोनस अंक के कॉलम में ‘हां’ का चयन कर लिया था। उनके अंकों से बोनस अंक हटा दिए जाएं। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा था कि बोर्ड द्वारा केवल ऑनलाइन आवेदन में ‘हां’ का विकल्प चुने जाने पर बिना दस्तावेज सत्यापन के बोनस अंक प्रदान कर दिए गए, जिससे वास्तविक और पात्र अभ्यर्थियों की मेरिट प्रभावित हुई। अभ्यर्थियों को अपनी गलती सुधारने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान किए गए थे। परिणाम आने के बाद उनकी ओर से अंक कम करने की मांग को लेकर आवेदन प्रस्तुत किया गया। इससे बेईमानी को बढ़ावा मिलेगा और ईमानदार अभ्यर्थी दंडित होंगे।
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एकलपीठ ने राज्य शासन को चयन सूची में संशोधन के निर्देश दिए थे। साथ ही, ‘हां’ का विकल्प चुनने वाले अभ्यर्थियों के लिए डीएलएड डिप्लोमा अपलोड करने के लिए 15 दिनों की अतिरिक्त विंडो खोलने के निर्देश दिए थे। प्रमाण पत्र अपलोड नहीं करने वाले अभ्यर्थियों के आवेदन निरस्त करते हुए तीन माह की अवधि में संशोधित मेरिट सूची तैयार कर नियुक्ति आदेश जारी करने के निर्देश दिए गए थे।


एकलपीठ के उक्त आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। अपीलार्थियों की ओर से तर्क दिया गया कि वे बोनस अंक की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि केवल वास्तविक अंकों के आधार पर चयन प्रक्रिया में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं। कुछ अपीलार्थियों ने स्वयं को दिव्यांग श्रेणी का बताते हुए सहानुभूतिपूर्वक विचार किए जाने का अनुरोध भी किया।

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि परिणाम घोषित होने के बाद जब अभ्यर्थियों को पता चला कि बोनस अंक हटाए जाने के बाद भी वे मेरिट में आ रहे हैं, तभी उन्होंने इसे भूलवश हुई गलती बताते हुए सुधार की मांग की, जो स्वीकार्य नहीं है। जानबूझकर गलत जानकारी देकर बोनस अंक प्राप्त करना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है और सर्वमान्य विधिक सिद्धांत के अनुसार धोखाधड़ी किसी भी वैध कार्रवाई को निरस्त कर देती है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ अपील को खारिज कर दिया। मामले में अधिवक्ता आलोक वागरेचा एवं अधिवक्ता विशाल बघेल ने पैरवी की।

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