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MP News: कर्मचारी न मानते हुए पेंशन का लाभ देने से किया इंकार, हाईकोर्ट ने कृषि विवि पर लगाई 50 हजार की कॉस्ट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Wed, 15 Oct 2025 10:08 PM IST
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सार
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ने सेवानिवृत्त कर्मचारी को पेंशन देने से इंकार किया था। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के रवैये को मनमाना व अनुचित मानते हुए 50 हजार रुपये की कॉस्ट लगाई और 15 दिन में भुगतान का आदेश दिया। अदालत ने विश्वविद्यालय को पेंशन देने के निर्देश भी दिए।
कर्मचारी नही मानते हुए पेंशन का लाभ देने से किया इंकार
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विस्तार
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय (आरवीएसकेवीवी) ने अपने ही सेवानिवृत्त कर्मचारी को कर्मचारी मानने से इनकार करते हुए पेंशन देने से मना कर दिया था। विश्वविद्यालय ने कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव के आदेशों को भी नजरअंदाज कर दिया।
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इस पर हाईकोर्ट की जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने विश्वविद्यालय के रवैये को मनमाना और अनुचित बताते हुए 50 हजार रुपये की कॉस्ट लगाई है। अदालत ने यह राशि 15 दिनों में याचिकाकर्ता को अदा करने के आदेश दिए हैं। साथ ही विश्वविद्यालय को निर्देशित किया गया है कि याचिकाकर्ता को पेंशन का भुगतान किया जाए।
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याचिकाकर्ता डॉ. एस.बी.एस. भदौरिया की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि विश्वविद्यालय ने उनके सेवानिवृत्त होने के आदेश जारी किए थे, लेकिन बाद में एक और आदेश निकालकर अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि वे उनसे पेंशन संबंधी दस्तावेज न लें। इतना ही नहीं, सेवानिवृत्ति का आदेश भी निरस्त कर दिया गया था।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि डॉ. भदौरिया की नियुक्ति वर्ष 1988 में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (जेएनकेवीवी) में हुई थी। वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश विधानमंडल द्वारा राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय और नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। इससे पहले तक राज्य के कृषि और पशु चिकित्सा महाविद्यालय जेएनकेवीवी के अधीन थे।
वर्ष 2009 में जेएनकेवीवी के विभाजन के बाद डॉ. भदौरिया की सेवाएं वर्ष 2010 में आरवीएसकेवीवी को सौंप दी गईं। विश्वविद्यालय ने वर्ष 2012 में उन्हें मध्य प्रदेश राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम में प्रतिनियुक्ति की अनुमति दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि प्रमुख सचिव, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने विश्वविद्यालय को पेंशन का लाभ देने के निर्देश जारी किए थे। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने आदेश नहीं माना।
विश्वविद्यालय की ओर से यह तर्क दिया गया कि वह स्वायत्त संस्थान है और राज्य सरकार का हस्तक्षेप उसकी स्वायत्तता का उल्लंघन करता है। इस पर अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय का अस्तित्व राज्य सरकार पर निर्भर है और उसने जो रवैया अपनाया, वह मनमाना और अनुचित है। अंत में अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए विश्वविद्यालय को पेंशन भुगतान का आदेश और 50 हजार रुपये की कॉस्ट जमा करने के निर्देश जारी किए।

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