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Mohan Bhagwat: 'भारत में मनुष्य के अंदर की खोज की यात्रा प्रारंभ हुई', भागवत ने राष्ट्र निर्माण पर कही ये बात
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खरगोन
Published by: खरगोन ब्यूरो
Updated Wed, 04 Feb 2026 07:51 PM IST
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सार
नर्मदा तट ग्राम लेपा में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मनुष्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने सेवा, अध्यात्म, शिक्षा, संवेदना और भारतीय स्वभाव को राष्ट्र उन्नति का आधार बताया।
मंच पर बैठे मोहन भागवत
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नर्मदा तट स्थित ग्राम लेपा में निमाड़ अभ्युदय रूरल मैनेजमेंट एंड डेवलेपमेंट एसोसिएशन एवं श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन द्वारा आयोजित विचार-प्रेरक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत शामिल हुए। उन्होंने मनुष्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण विषय पर उद्बोधन दिया।
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भागवत ने कहा कि सभी परमेश्वर के स्वरूप है, अत: उपकार नहीं, सेवा करना हमारा धर्म है। हमारे यहां चैरिटी नहीं, अपितु सेवा है। जीवन में सेवा के जो भी अवसर मिलें, सेवा करना चाहिए। सेवा से हमारी शुद्धि होती है, जिसके पास जो हो, वो देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य देखकर ही सीखता है, सुनकर या बोलकर नहीं। भारत की यात्रा में यह सत्य सिद्ध हुआ कि सुख बाहर नहीं, अपितु मनुष्य के अंदर ही है। भारत में मनुष्य के अंदर की खोज की यात्रा प्रारंभ हुई। मनुष्य के अंदर की यात्रा से हमें शाश्वत सुख प्राप्त होता है।
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माया का आधार अध्यात्म ही होना चाहिए
भागवत ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने अनुभव के आधार पर बताया कि माया का आधार अध्यात्म ही होना चाहिए। ईश्वर ने मनुष्य को संवेदना दी है। मनुष्य की संवेदना दूसरे के सुख-दुख को जानती है। किसी की उपेक्षा करके सुख भोगना, मनुष्य की संवेदना में नहीं है। जीवन मूल्यों के लिए जीवन में शिक्षा और शुचिता का आवश्यक है। मनुष्य को शिक्षा इसीलिए चाहिए कि मुझे स्वयं का दुख दूर तो करना ही है, किंतु समाज और देश का भी दुख दूर करना है, यह स्वभाव भारत का स्वभाव है। ऐसा धर्म जब हमने दुनिया को दिया, तब भारत बना। परतंत्रता में भी हमारा स्वाभाव नहीं बदला।
भारत का अर्थ केवल भूगोल नहीं, अपितु स्वभाव है
भारतीय संदर्भों में शिक्षा के बारे में भागवत ने कहा कि जन्मांतर का ज्ञान मनुष्य के मस्तिष्क में है, इसीलिए जो ज्ञान अंदर है, उसे बाहर निकालना चाहिए। टंट्या मामा और गाडगे महाराज जैसे महापुरुषों में कोई औपचारिक शिक्षा ली थी, किंतु आज भी उनका सम्मान है। हमारे अंदर दैवीय गुण निहित है, उन्हें बाहर निकालना होगा उसका ज्ञान प्राप्त करना होगा।
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मनुष्य को विश्व मानवता का ज्ञान दिलाने वाली शिक्षा, आत्मनिर्भर बनाने वाली शिक्षा, श्रम की प्रतिष्ठा वाली शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है। व्यक्ति की बजाय कर्म की मान्यता और परिणाम की बजाय प्रामाणिक और उत्कृष्ट कार्य करना, भारत का स्वभाव है। भारत का अर्थ केवल भूगोल नहीं, अपितु स्वभाव है। भारत की उन्नति का मतलब जल, जंगल, नदी, पहाड़, जानवर और मनुष्य सभी की उन्नति है।
उल्लेखनीय है कि अपनी नर्मदा परिक्रमा में वनवासी बच्चों का शिक्षा का संकल्प करने पर भारती ठाकुर ने यह संस्थान प्रारंभ किया। रक्षा मंत्रालय की नौकरी छोड़ कर भारती ठाकुर ने यह प्रकल्प प्रारंभ किया। यहां शिक्षालय, गोशाला सहित अन्य प्रकल्प चल रहे हैं।

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