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Mother's Day: दिव्यांग मां ने नहीं टूटने दिए बच्चों के सपने, बेटी बनी स्वास्थ्य अधिकारी और बेटा IIT पासआउट

न्यूज डेस्क,अमर उजाला, खरगोन Published by: खरगोन ब्यूरो Updated Sun, 10 May 2026 06:00 AM IST
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सार

Mother’s Day Inspirational Story: खरगोन की दिव्यांग मां सकुबाई ने आर्थिक तंगी और पारिवारिक कठिनाइयों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। उनकी बेटियां स्वास्थ्य क्षेत्र में आगे बढ़ीं, जबकि बेटे विकास ने आईआईटी वाराणसी से पढ़ाई कर एआई इनोवेशन के क्षेत्र में सफलता हासिल की।

Mother’s Day 2026 Inspiration Story: Differently-Abled Mother Raised Officer Daughters and IIT Graduate Son
अपने बच्चों के साथ सकुबाई - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मदर्स डे के अवसर पर खरगोन जिले के अघावन गांव की सकुबाई की कहानी संघर्ष, त्याग और मातृत्व की ऐसी मिसाल बनकर सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र में लोगों को प्रेरित किया है। साधारण किसान परिवार में जन्मी सकुबाई ने जीवनभर आर्थिक तंगी, पारिवारिक जिम्मेदारियों और शारीरिक चुनौतियों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। स्वयं दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार और बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए लगातार संघर्ष किया।

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परिवार की जिम्मेदारियों को मजबूती से संभाला
सकुबाई के परिवार में तीन बेटियां, एक बेटा, वृद्ध सास और अविवाहित देवर की जिम्मेदारी थी। उनके पति कृष्णलाल लंबे समय तक अस्वस्थ रहे, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई। गांव के छोटे से घर में सुबह सबसे पहले उठना और रात में सबसे आखिर में सोना उनकी दिनचर्या बन गई थी। घर के कामकाज से लेकर बच्चों की पढ़ाई और परिवार की हर चिंता उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ संभाली।
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बच्चों के सपनों को नहीं टूटने दिया
आर्थिक तंगी कई बार इतनी बढ़ गई कि बच्चों की पढ़ाई रुकने की नौबत आ गई, लेकिन सकुबाई ने कभी हिम्मत नहीं हारी। वह हमेशा अपने बच्चों से कहती थीं कि हम गरीब हो सकते हैं, लेकिन बच्चों के सपने गरीब नहीं होने चाहिए। यही सोच उनके संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत बन गई। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दी और हर हाल में उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

बच्चों के साथ सकुबाई।
 
पति के निधन के बाद और बढ़ीं चुनौतियां
पति कृष्णलाल के निधन के बाद सकुबाई के सामने जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। सीमित साधनों और सामाजिक चुनौतियों के बीच चार बच्चों का भविष्य संवारना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने धैर्य और साहस के साथ परिवार को संभाले रखा। जिस तरह लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने विपरीत परिस्थितियों में समाज और परिवार को संभाला था, उसी तरह सकुबाई ने भी अपने साहस और ममता से परिवार को टूटने नहीं दिया।

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बच्चों की सफलता बनी संघर्ष का परिणाम
सकुबाई की मेहनत और त्याग का परिणाम आज उनके बच्चों की सफलता में दिखाई देता है। उनकी बड़ी बेटी ने संस्कृत विषय से एमए किया। दूसरी बेटी ने एमएससी नर्सिंग कर सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी के रूप में सेवा शुरू की। तीसरी बेटी ने बीएससी नर्सिंग की शिक्षा प्राप्त की। वहीं पुत्र विकास ने कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करते हुए आईआईटी वाराणसी से मैथमैटिक्स एवं कम्प्यूटिंग में बीटेक एवं एमटेक किया और वर्तमान में एआई इनोवेशन के क्षेत्र में कार्यरत है।


 
समाज के लिए प्रेरणा बनीं सकुबाई
शिक्षक रमेश पाटीदार ने सकुबाई के संघर्ष को प्रेरणादायक बताते हुए कहा कि आज के समय में ऐसी माताएं समाज के लिए उदाहरण हैं। उन्होंने साबित किया है कि संसाधनों की कमी कभी भी बच्चों के भविष्य की राह नहीं रोक सकती। उनका जीवन त्याग, शिक्षा और संस्कारों की सबसे बड़ी सीख देता है।

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