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301वीं जयंती विशेष: अहिल्याबाई के सिक्के बताते हैं प्रशासन और सैन्य शक्ति की कहानी, दिखता है दूरदर्शी शासन

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खरगोन Published by: खरगोन ब्यूरो Updated Sun, 31 May 2026 04:08 PM IST
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सार

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 301वीं जयंती पर उनके शासनकाल के सिक्कों से जुड़ी विशेष जानकारी सामने आई है। इन सिक्कों पर धार्मिक, सैन्य और वानस्पतिक प्रतीक अंकित हैं, जो उनके कुशल प्रशासन, सादगी, सांस्कृतिक दृष्टि और जनकल्याणकारी शासन को दर्शाते हैं।

Special on the 301st birth anniversary of Ahilyabai Holkar
होलकर रियासत के प्राचीन सिक्के। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की 301वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए एक मुद्रा शोधार्थी ने उनके शासनकाल में जारी सिक्कों से जुड़े कई महत्वपूर्ण और कम चर्चित तथ्य सामने रखे हैं। जनकल्याण, धर्मार्थ कार्यों और न्यायप्रिय शासन के लिए प्रसिद्ध अहिल्याबाई ने न केवल सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी, बल्कि उनकी मुद्रा नीति भी उनके व्यक्तित्व और प्रशासनिक दृष्टि को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

मुद्रा संग्राहक मिलन महाजन ने बताया कि शोध के अनुसार अहिल्याबाई को मल्हार राव होलकर से आर्थिक रूप से समृद्ध इंदौर रियासत विरासत में मिली थी। राजकीय आय के अलावा उन्हें खासगी ट्रस्ट से भी पर्याप्त आर्थिक संसाधन प्राप्त होते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी सोने की मोहर या नजराना सिक्के जारी नहीं किए। उस दौर में अधिकांश शासक अपनी प्रतिष्ठा और वैभव के प्रदर्शन के लिए स्वर्ण मुद्राएं जारी करते थे, लेकिन सादगी और लोककल्याण को सर्वोपरि मानने वाली अहिल्याबाई ने इस परंपरा से अलग राह चुनी।

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उन्होंने मल्हार राव होलकर द्वारा प्रचलित चांदी के सिक्कों को जारी रखा, जिन पर सूर्य, शिवलिंग और बेलपत्र जैसे धार्मिक प्रतीक अंकित थे। इसके साथ ही उन्होंने बड़ी संख्या में तांबे के सिक्के भी प्रचलन में लाए। खास बात यह रही कि अपने शासनकाल में स्थापित विभिन्न टकसालों का नाम उन्होंने ‘मल्हार नगर’ रखा। यह उनके ससुर और मार्गदर्शक मल्हार राव के प्रति सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।

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अहिल्याबाई के सिक्कों पर धार्मिक प्रतीकों के साथ भाला, खंडा, कटार, फरसा, त्रिशूल और धनुष-बाण जैसे सैन्य चिह्न भी अंकित मिलते हैं। वहीं गेहूं की बाली, कपास का फूल, अफीम का डोडा, ज्वार की बाली, बेलपत्र तथा विभिन्न प्रकार के पुष्प-पत्तों जैसे वानस्पतिक प्रतीकों का भी उपयोग किया गया। कुछ सिक्कों पर देवनागरी लिपि में ‘श्री’ और ‘स’ जैसे अक्षर अंकित हैं, जबकि कुछ पर फ़ारसी लिपि के चिह्न भी मिलते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक शासक के सिक्कों पर इतने विविध प्रतीकों का मिलना उनकी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य संगठन और सांस्कृतिक दृष्टिकोण का प्रमाण है। हालांकि सिक्कों पर अंकित कुछ चिह्नों, विशेष रूप से देवनागरी अक्षर ‘स’ और फ़ारसी अक्षरों के उपयोग का उद्देश्य आज भी शोध का विषय बना हुआ है। इन रहस्यमयी प्रतीकों के पीछे छिपे ऐतिहासिक और प्रशासनिक कारणों की खोज भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण विषय है। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के सिक्के आज भी भारतीय मुद्रा इतिहास के अध्ययन में विशेष स्थान रखते हैं और उनके दूरदर्शी, न्यायपूर्ण एवं धर्मनिष्ठ शासन की गवाही देते हैं।

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