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Mandsaur News: अफीम की फसल अपने यौवन पर, रात भर जागकर रखवाली करने को मजबूर किसान
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, मंदसौर
Published by: मंदसौर ब्यूरो
Updated Wed, 12 Feb 2025 10:38 PM IST
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सार
रबी की सीजन में बोई जाने वाली अफीम की फसल इन दिनों पूरे यौवन पर है। फूलों के बीच से डोड़े बाहर आने लगे हैं। इसके चलते अब किसानों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। किसान रात में जागकर अफीम फसल की रखवाली कर रहे हैं।
खेतों में खड़ी लहलहाती अफीम की फसल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मंदसौर जिले में अफीम फसल का पट्टा किसान के पास होना उसके संपन्न होने की निशानी है। लेकिन अफीम की खेती करने के लिए किसानों को अपना खून पसीना बहाना पड़ता है। अफीम की फसल जब अपने यौवन पर होती है, तब किसानों की रातों की नींद सिर्फ इस चिंता में समाप्त हो जाती है कि कहीं उनकी फसल कोई चुरा न ले जाए या जंगली जानवर आकर अफीम फसल को तबाह न कर दें।
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वर्तमान में अफीम की फसल अपने यौवन पर है, खेतों में सफेद, लाल और बैंगनी फूलों की बहार छाई हुई है, जिसकी हिफाजत के लिए किसान अब रात-रात भर जागकर अपनी अफीम फसल की चौकीदारी कर रहा है। वहीं, अफीम फसल की जानवरों से सुरक्षा के लिए फसल के चारो ओर जाली लगाई गई है।
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मध्यप्रदेश का मंदसौर और नीमच जिला उच्च गुणवत्ता की अफीम के लिए प्रसिद्ध है। अफीम को तस्करों की भाषा में काला सोना भी कहा जाता है। लाइसेंसधारी किसानों के खेतों में इन दिनों सफेद, लाल गुलाबी और बैंगनी फूलों की बहार छाई हुई है। इन फूलों से अब अफीम के डोड़े बाहर आने लगे हैं। फरवरी माह समाप्त होते-होते सभी फूल झड़ जाएंगे और इनमें से डोड़े बाहर निकल आएंगे। अफीम की फसल में डोड़े आने के साथ ही किसानों की चिंता भी बढ़ गई हैं।
अफीम की सुरक्षा के लिए हथियारों के साथ रतजगा
मौसम की अनुकूलता के कारण खेतों में अफीम की फसल पर डोड़ों की भरमार दिखाई दे रही है। जिसकी रखवाली के लिए किसान रात भर जागकर हथियारों के साथ अफीम फसल की रखवाली कर रहे हैं। कई किसानों ने अफीम फसल की रखवाली के लिए सीसीटीवी कैमरे भी लगा रखे हैं। कई किसानों ने तो खेतों में झोपड़ियां बनाकर वहीं डेरा डाल दिया है, उनकी दैनिक दिनचर्या का सारा काम खेतों में ही हो रहा है।
जानवरों से सुरक्षा के लिए खेत के चारों ओर लगाई लोहे जाली
अफीम किसानों को रात तो ठीक दिन में भी अपनी अफीम फसल की चौकीदारी करनी पड़ती है। दिन हो या रात किसानों को हमेशा जंगली जानवरों विशेषकर नील गाए से अफीम की फसल पर खतरा बना रहता है। जंगली जानवर खेतों में घुसकर बड़े क्षेत्र में फसल को बर्बाद कर देते हैं। किसानों ने जंगली जानवरों से अफीम फसल की सुरक्षा के लिए खेत के आसपास लोहे की जाली लगा रखी है, जिसके लिए किसानों को एक बड़ी राशि खर्च करना पड़ी।
अफीम की खेती के लिए केंद्र सरकार की नीतियों का करना होता है पालन
अफीम की खेती किसानों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए एक बेहतर विकल्प है। लेकिन अफीम की खेती करना किसानों के लिए इतना आसान नहीं है। किसानों को केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के तहत ही अफीम की खेती करना होती है। अफीम की खेती सिर्फ वही किसान कर सकता है, जिसको नारकोटिक्स विभाग ने लाइसेंस जारी किया हो। बिना लाइसेंस इसकी खेती करना एनडीपीएस एक्ट का उल्लंघन है, जिसके लिए उन्हें सालों जेल में बिताने पड़ सकते हैं।
केंद्रीय वित्त मंत्रालय और नारकोटिक्स विभाग तय करता है अफीम की खेती के नियम
अफीम की खेती का लाइसेंस देने से पहले केंद्रीय वित्त मंत्रालय और नारकोटिक्स विभाग के द्वारा एक नीति बनाई जाती है। किसान कितनी जमीन पर अफीम की खेती कर सकता है, यह भी सरकार ही तय करती है। देश भर में सबसे ज्यादा अफीम की पैदावार मध्यप्रदेश के मालवा के मंदसौर, नीमच, रतलाम जिले और राजस्थान मेवाड़ के प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, भीलवाड़ा जिलों में की जाति है। अफीम किसानों को अफीम की खेती के लिए पट्टे मिलते हैं, जितने एरिया के लिए किसानों को पट्टे आवंटित किए जाते हैं, किसानों को उतने ही एरिया में अफीम की बोवनी करनी पड़ती है। इसके लिए नारकोटिक्स विभाग की टीम खेतों में पहुंचकर जांच भी करती है।
नारकोटिक्स विभाग में जमा करवानी पड़ती है अफीम
केंद्र सरकार द्वारा अक्तूबर-नवंबर माह में किसानों को अफीम लाइसेंस जारी किया जाता है। लाइसेंस जारी होने के बाद किसान खेतों में अफीम के बीज डालना शुरू कर देते हैं। करीब चार माह इन्तजार के बाद मार्च में अफीम की फसल पूरी तरह से तैयार होती है। अफीम की फसल पर डोडे आने के बाद किसान उनमें चीरा लगाना शुरू कर देते हैं। चीरा लगे डोडे को रात भर छोड़ दिया जाता है। दूसरे दिन किसान खेतों में जाकर डोड़ों से निकला पदार्थ इकट्ठा करते हैं।
यह प्रक्रिया तीन बार की जाती है, जिसके बाद एकत्रित की गई अफीम को नारकोटिक्स कार्यालय में जमा करवाना पड़ता है। अगर किसी किसान के पास अफीम की मात्रा कम होती है तो अपने गांव के लोगों से अफीम खरीदकर औसत मात्रा पूरी करता है। क्योंकि अगर किसान तय मात्र से कम अफीम जमा करवाता है तो उसका लाइसेंस नारकोटिक्स विभाग द्वारा समाप्त कर दिया जाता है।
अफीम की फसल तैयार होने के लगते हैं चार माह
रबी की सीजन में की जाने वाली अफीम की खेती में किसान को बुवाई से लेकर उसके दाने निकालने तक करीब पांच माह का समय लगता है। अफीम फसल की बुवाई के तीन से चार महीने के बाद इसके पौधों में फूल आने लगते हैं। फूलों के खिलने के साथ ही पौधों पर डोडे बनना शुरू हो जाते है। फूल पूरी तरह से झड़ने के साथ ही अफीम के लिए डोडे तैयार हो जाते हैं। इसके लिए इन डोडों पर चीरा लगाकर रात भर के लिए छोड़ दिया जाता है और अगले दिन सुबह उसमें से निकले तरल पदार्थ को इकठ्ठा कर लिया जाता है, जिसे अफीम कहते हैं।
जब डोड़ो से तरल पदार्थ निकलना बंद हो जाता है, उसके बाद उन्हें सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। फसल सूखने के बाद उसके डोडे तोड़कर उससे बीज निकाल लिए जाते हैं। इसके बीज को पोस्ता दाना या खसखस कहा जाता है। इसके बाद अप्रैल माह में किसान अफीम को नारकोटिक्स विभाग में तुलवा देते हैं। इसके बदले में एक तय राशि किसानों को अफीम की ग्रेड के हिसाब से दी जाती है।
कई किसानों के कटे अफीम पट्टे
मौसम अगर अनुकूल रहता है तो खेतों में अफीम की अच्छी पैदावार होती है। तोल करवाने के बाद जो अफीम बच जाती है किसान उसे डेढ़ से दो लाख रुपये किलो में तस्करों को बेच देता है। तस्कर जब पकड़ा जाता है और किसान का नाम सामने आता है उसके बाद नारकोटिक्स विभाग संबंधित किसान का अफीम लाइसेंस रद्द कर देता है। वहीं कई किसान अफीम की औसत पूरी नहीं कर पाने के कारण भी अपना लाइसेंस गवां देते हैं, जिसके चलते अब अफीम की पैदावार करने वालों किसानों की संख्या पहले से कम हुई है।
केंद्र सरकार द्वारा पिछले तीन चार वर्षों से जारी किए जा रहे सीपीएम पद्धति के पट्टे
कई किसानों के अफीम पट्टे कटने या अफीम की औसत पूरी नहीं करने के कारण कटे अफीम पट्टो को लेकर किसानों ने आंदोलन किए और केंद्र सरकार से अफीम पट्टे दोबारा जारी करने की मांग की, जिसके चलते केंद्र सरकार ने पिछले तीन चार वर्षों से नया रास्ता निकाला है। नारकोटिक्स विभाग ने किसानों को सीपीएस पद्धति से अफीम पट्टे जारी किए हैं। सीपीएस पद्धति में किसान को डोड़ो से अफीम निकालने का अधिकार नहीं होता है। किसान को सिर्फ पोस्ता दाना निकालने का अधिकार दिया गया है। पोस्तदाना निकलने के बाद बिना अफीम निकले पौधे को नारकोटिक्स कार्यालय में जमा करवाना पड़ता है, जिसकी एवज में किसान को तय राशि प्रदान की जाती है।
डोड़ो की चोरी से लेकर अफीम के लिए हत्या की हो चुकी है वारदात
मंदसौर-नीमच जिला अफीम उत्पादक क्षेत्र है। यहां बड़ी मात्रा में अफीम की पैदावार होती है। बदमाश खेतों में खड़ी अफीम की फसल मैसे डोड़े चुराकर ले जाते है। पिछले वर्ष ही जिले के लसुड़िया राठौर गांव में अफीम लूटने आए बदमाशों ने एक वृद्धा की हत्या कर अफीम लूट की वारदात को अंजाम दिया था। इसके पहले भी बदमाशों द्वारा किसानों के साथ मारपीट कर उन्हें बंधक बनाकर अफीम लूटने के मामले सामने आ चुके हैं।
अफीम पट्टाधारी को समाज में मिलता है सम्मान
अफीम की खेती किसानों के लिए प्रतिष्ठा की पहचान भी है, जिन किसानों के पास अफीम की खेती के लाइसेंस होते हैं समाज व गांव में उन किसानों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। अफीम की खेती करने वाले किसानों के परिवारों में लड़के लड़कियों की शादी के लिए रिश्ते भी आगे चलकर आते हैं।

अफीम की फसल

खेतों में खड़ी लहलहाती अफीम की फसल

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