पन्ना की पद्मावती शक्तिपीठ: जहां मां के चरण गिरे, हर मनोकामना होती है पूरी; जानिए इसकी पूरी कहानी
पन्ना स्थित मां पद्मावती शक्तिपीठ बुंदेलखंड की प्रमुख आस्था है, जहां सती के चरण गिरने की मान्यता है। यहां भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, खासकर नवरात्र में भारी भीड़ उमड़ती है और महिलाएं विशेष श्रद्धा से पूजा करती हैं।
विस्तार
पन्ना जिले में स्थित मां पद्मावती देवी का मंदिर बुंदेलखंड के श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। यह एक प्राचीन शक्तिपीठ है, जहां देवी सती के चरण (दाहिना पैर) गिरने की मान्यता है। इसी कारण नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। दूर-दूर से लोग घंटों लाइन में लगकर माता के दर्शन कर धर्म लाभ प्राप्त करते हैं।
मंदिर का इतिहास
पन्ना नगर के उत्तर-पश्चिम छोर पर किलकिला नदी के समीप यह प्राचीन देवी मंदिर स्थित है। स्थानीय बोली में इसे "बड़ी देवी" या "बड़ी देवन" कहा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार प्राचीन काल में पद्मावत नाम के एक राजा यहां राज्य करते थे, जो शक्ति के उपासक थे। उन्होंने अपनी आराध्य मां दुर्गा को पद्मावती नाम से इस मंदिर में स्थापित किया।

कालांतर में इस क्षेत्र का नाम पद्मावतीपुरी पड़ा, जो बाद में परिवर्तित होकर पन्ना कहलाया। पद्मावती देवी का उल्लेख भविष्य पुराण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण में भी मिलता है। यह भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। जैसे मैहर में मां शारदा का विशेष महत्व है, वैसे ही पन्ना में मां पद्मावती का। बुंदेलखंड के लोग इसे "पन्ना की मैहर माता" भी कहते हैं। मंदिर के गर्भगृह में सात प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनमें मध्य में विराजित मां पद्मावती भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करती हैं।
मंदिर का धार्मिक महत्व
इस मंदिर का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में जब उनकी पुत्री सती का अपमान हुआ, तो उन्होंने यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया। इससे भगवान शिव क्रोधित होकर सती के शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे।
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तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे और वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। पन्ना में मां सती का दाहिना पैर गिरा था, इसलिए यह स्थान पद्मावती शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।इस मंदिर में विशेष रूप से महिलाओं की गहरी आस्था देखने को मिलती है। महिलाएं यहां माता का सोलह श्रृंगार करती हैं और संतान प्राप्ति, सुखी वैवाहिक जीवन तथा अन्य मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करती हैं।

मान्यता है कि यहां आने वाली कोई भी महिला खाली हाथ नहीं लौटती। जिनकी गोद सूनी होती है, उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है। कई लोग अपनी बेटियों के लिए योग्य वर की कामना लेकर भी यहां आते हैं।
ऐतिहासिक महत्व
पद्मावती देवी का यह मंदिर धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 925 में तुर्क यात्री इब्न-ए-कुरदान ने अपने यात्रा विवरण में इस स्थान का उल्लेख किया है। यहां एक प्राचीन शिलालेख भी पाया गया है, जो ब्राह्मी लिपि में है, हालांकि वह अब अपठनीय हो चुका है। नवरात्रि के दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां पद्मावती कई बार बालिका रूप में अपने भक्तों को दर्शन भी देती हैं और संकटों से उनकी रक्षा करती हैं।

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