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Karwa Chauth 2025: देश के तीसरे करवा माता मंदिर की कहानी भी चौंकाने वाली, राजा भोज को मिला था ये फल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायसेन
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Fri, 10 Oct 2025 03:31 PM IST
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सार
Karwa Chauth Mata Mandir Raisen : राजा भोज कालीन भोजपुर का चौथ माता मंदिर करवा चौथ की आस्था का प्रमुख केंद्र है। कहा जाता है कि राजा भोज की पत्नी ने यहां पति की लंबी आयु के लिए पूजा की थी। 500 वर्ष पुराने इस मंदिर में सुहागिनें आज भी निर्जला व्रत रखकर माता से अखंड सौभाग्य का वरदान मांगती हैं।
देश का तीसरा करवा चौथ माता का मंदिर रायसेन में है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Karwa Chauth Special Temple: मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के भोजपुर के पास स्थित चौथ माता मंदिर राजा भोज के समय से स्थापित माना जाता है। माना जाता है कि राजा भोज को कुष्ठ रोग (कोढ़) हो गया था, तब उनकी पत्नी ने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए चौथ माता की पूजा की थी। उसी स्थान पर यह प्राचीन मंदिर स्थापित हुआ, जो आज “करवा चौथ माता मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध है।
भारतवर्ष में चौथ माता के तीन प्रमुख मंदिर माने जाते हैं- पहला राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में, दूसरा मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में, और तीसरा रायसेन जिले के भोजपुर में स्थित यह मंदिर। भोजपुर का यह मंदिर राजा भोज की धार्मिक आस्था और जनकल्याण की भावना से जुड़ा हुआ है। भोजपुर शिवलिंग से लगभग 3 किलोमीटर दूर इमलिया ग्राम के जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर लगभग 500 वर्ष पुराना बताया जाता है। स्थानीय लोग चौथ माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं। यहां हर वर्ष करवा चौथ के दिन दूर-दूर से सुहागिन महिलाएं माता की पूजा करने आती हैं और अपनी मनोकामनाएं मांगती हैं। मान्यता है कि माता यहां हर मनोकामना पूरी करती हैं।
ये भी पढ़ें- साल में एक बार करवा चौथ के दिन ही खुलता है ये खास मंदिर, यहां के दर्शन और प्रसाद भी अनोखे
लोगों का दावा- शेर के पंजों के निशान दिखते हैं
मंदिर के पुजारियों और ग्रामीणों के अनुसार, आज भी सुबह 4 से 5 बजे के बीच एक शेर मंदिर के पास आता है और गर्जना करता है। कई बार लोगों ने मंदिर परिसर में शेर के पंजों के निशान देखे हैं। ग्रामीण इसे माता का वाहन मानते हैं। इमलिया गांव की एक महिला बताती हैं कि उनके पति कई वर्षों से बीमार थे, पर चौथ माता की कृपा से वे स्वस्थ हैं और काम कर रहे हैं।
ये भी पढ़ें- करवा चौथ आज; जानें मध्य प्रदेश के शहरों में कब दिखाई देगा चांद, इस बार ये बात रहेगी खास
पूरे वर्षभर खुला रहता है ये मंदिर
इतिहासकारों के अनुसार, राजा भोज ने अपने रोग के निवारण के लिए 9 नदियों और 99 नालों को जोड़कर एक विशाल बांध का निर्माण कराया था, जिसका जल भोजपुर के प्रसिद्ध शिवलिंग पर अभिषेक के लिए प्रयुक्त होता था। इसी बांध की जल निकासी (मोरी) के पास चौथ माता की स्थापना की गई थी। भोजपुर का यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। दो पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर शिवलिंग, पार्वती मंदिर और चौथ माता मंदिर जैसे पवित्र स्थलों के निकट है। विशेष बात यह है कि जहां उज्जैन का चौथ माता मंदिर वर्ष में केवल एक दिन खुलता है, वहीं भोजपुर का यह मंदिर पूरे वर्ष खुला रहता है।
ये भी पढ़ें- जब माता ने पति को दिया जीवनदान! अद्भुत है सती प्रथा रोकने से जुड़ी 'चौथ माता' की ये कथा
अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है
मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है। यहीं पर राजा भोज की पत्नी ने सबसे पहले करवा चौथ का व्रत और पूजा संपन्न की थी, तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।
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मंदिर के पुजारियों और ग्रामीणों के अनुसार, आज भी सुबह 4 से 5 बजे के बीच एक शेर मंदिर के पास आता है और गर्जना करता है। कई बार लोगों ने मंदिर परिसर में शेर के पंजों के निशान देखे हैं। ग्रामीण इसे माता का वाहन मानते हैं। इमलिया गांव की एक महिला बताती हैं कि उनके पति कई वर्षों से बीमार थे, पर चौथ माता की कृपा से वे स्वस्थ हैं और काम कर रहे हैं।
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पूरे वर्षभर खुला रहता है ये मंदिर
इतिहासकारों के अनुसार, राजा भोज ने अपने रोग के निवारण के लिए 9 नदियों और 99 नालों को जोड़कर एक विशाल बांध का निर्माण कराया था, जिसका जल भोजपुर के प्रसिद्ध शिवलिंग पर अभिषेक के लिए प्रयुक्त होता था। इसी बांध की जल निकासी (मोरी) के पास चौथ माता की स्थापना की गई थी। भोजपुर का यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। दो पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर शिवलिंग, पार्वती मंदिर और चौथ माता मंदिर जैसे पवित्र स्थलों के निकट है। विशेष बात यह है कि जहां उज्जैन का चौथ माता मंदिर वर्ष में केवल एक दिन खुलता है, वहीं भोजपुर का यह मंदिर पूरे वर्ष खुला रहता है।
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मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है। यहीं पर राजा भोज की पत्नी ने सबसे पहले करवा चौथ का व्रत और पूजा संपन्न की थी, तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

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