Satna News: पीएम मोदी के 'मन की बात' में सराहे गए किसान का अनोखा फैसला, जीते जी छपवा दिए अपनी तेरहवीं के कार्ड
सतना के किसान और जैव विविधता संरक्षक रामलोटन कुशवाहा अपने जीते जी स्वयं की तेरहवीं और बरसी का आयोजन कर रहे हैं। देहदान को लेकर मिले तानों के जवाब में उन्होंने यह अनोखा कदम उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनके जैव विविधता संरक्षण कार्य की सराहना कर चुके हैं।
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सतना जिले के उचेहरा क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने लोगों को हैरान भी किया है और सोचने पर मजबूर भी। अतरबेदिया गांव निवासी किसान और जैव विविधता संरक्षक रामलोटन कुशवाहा अपने जीते जी स्वयं की तेरहवीं और बरसी का आयोजन करने जा रहे हैं। इतना ही नहीं, इसके लिए उन्होंने बाकायदा शोक संदेश वाले निमंत्रण कार्ड भी छपवा दिए हैं, जिन्हें गांव और रिश्तेदारों के बीच बांटा जा रहा है। यह खबर सामने आते ही पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है। लोग इस आयोजन को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी वजह बेहद भावुक और सामाजिक संदेश देने वाली है।
कौन हैं रामलोटन कुशवाहा?
रामलोटन कुशवाहा कोई सामान्य किसान नहीं हैं। वे वर्षों से दुर्लभ और विलुप्त होती वनस्पतियों, औषधीय पौधों और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के संरक्षण का काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने घर और आसपास के परिसर में देशी पौधों का एक अनूठा संग्रह तैयार किया है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। उनके इस प्रयास की चर्चा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने लोकप्रिय कार्यक्रम मन की बात में रामलोटन कुशवाहा के कार्यों की सराहना की थी।
उन्होंने दहीमन, भटकटैया, लौकी समेत कई दुर्लभ और विलुप्त हो रही प्रजातियों को संरक्षित कर ग्रामीण स्तर पर जैव विविधता बचाने की अनूठी मिसाल पेश की है। यही वजह है कि उन्हें वर्ष 2024 में जैव विविधता प्रोत्साहन का प्रथम श्रेणी का राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिला था। राजधानी भोपाल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्हें ट्रॉफी और पुरस्कार राशि प्रदान की गई थी।
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देहदान के फैसले के बाद शुरू हुई चर्चा
जानकारी के मुताबिक कुछ समय पहले रामलोटन कुशवाहा ने शासकीय मेडिकल कॉलेज सतना में देहदान करने का संकल्प लिया था। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर भी समाज और चिकित्सा शिक्षा के काम आना चाहिए, लेकिन जैसे ही यह बात गांव और रिश्तेदारों तक पहुंची, लोगों ने तरह-तरह की बातें बनानी शुरू कर दीं। कुछ लोगों ने यहां तक कह दिया कि वे तेरहवीं और वर्षी का खर्च बचाने के लिए देहदान कर रहे हैं। लगातार मिल रहे तानों और कटाक्षों ने उन्हें भीतर तक आहत कर दिया। हालांकि उन्होंने इसका जवाब विवाद या नाराजगी से नहीं, बल्कि एक अनोखे सामाजिक संदेश के जरिए देने का फैसला किया।
“जब लोग तेरहवीं की बात कर रहे हैं, तो जीते जी ही कर लेते हैं”
रामलोटन कुशवाहा ने तय किया कि जब लोग उनकी तेरहवीं और बरसी को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो वे अपने जीते जी ही यह आयोजन करेंगे। उन्होंने शोक संदेश की शैली में कार्ड छपवाए और लोगों को निमंत्रण देना शुरू कर दिया। कार्ड में तेरहवीं और वर्षी के आयोजन की जानकारी दी गई है जिसे देखकर लोग हैरान रह गए। गांव में यह चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन चुका है। हालांकि रामलोटन का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देना है कि देहदान कोई गलत बात नहीं है। इसे अंधविश्वास और तानों से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
देहदान और सामाजिक सोच पर बड़ा संदेश
रामलोटन कुशवाहा का यह कदम अब सिर्फ एक अनोखा आयोजन नहीं रह गया है, बल्कि यह समाज में फैली सोच पर सवाल भी खड़ा कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी देहदान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और सामाजिक संकोच मौजूद हैं। ऐसे में एक किसान द्वारा खुले तौर पर देहदान का संकल्प लेना और फिर समाज के तानों का इस तरह जवाब देना लोगों के बीच नई चर्चा पैदा कर रहा है।
दूर-दूर से पहुंचते हैं लोग
रामलोटन कुशवाहा द्वारा तैयार किए गए देशी वनस्पति संग्रहालय को देखने के लिए प्रदेश के अलग-अलग जिलों से लोग पहुंचते हैं। कई छात्र, शोधकर्ता और प्रकृति प्रेमी उनके कार्यों को समझने के लिए उनके गांव आते हैं। ग्रामीण परिवेश में रहकर जैव विविधता संरक्षण का यह प्रयास आज कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुका है।



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