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Shahdol News: क्रिकेट से आगे निकला फुटबॉल का जुनून, शहडोल का ‘मिनी ब्राजील’ गढ़ रहा भविष्य के सितारे
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शहडोल
Published by: शहडोल ब्यूरो
Updated Sat, 13 Jun 2026 01:10 PM IST
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सार
शहडोल का विचारपुर गांव फुटबॉल के जुनून से अपनी अलग पहचान बना चुका है। “मिनी ब्राजील” के नाम से मशहूर यह गांव बच्चों और युवाओं के फुटबॉल के प्रति समर्पण और बड़े सपनों का केंद्र बन गया है, जहां हर दिन मैदान में भविष्य के सितारे तैयार हो रहे हैं।
विचारपुर मिनी ब्राज़ील फुटबॉल ग्राउंड।
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विस्तार
जहां देश के अधिकांश हिस्सों में क्रिकेट का खुमार सिर चढ़कर बोलता है, वहीं शहडोल का एक छोटा सा गांव फुटबॉल के सपनों को आकार दे रहा है। यहां बच्चे खिलौनों से ज्यादा फुटबॉल को पसंद करते हैं और युवाओं की ख्वाहिश सिर्फ मैच देखने तक सीमित नहीं, बल्कि एक दिन भारतीय टीम की जर्सी पहनकर फीफा विश्व कप के मैदान में उतरने की है।
फुटबॉल बना गांव की पहचान
शहडोल जिले का विचारपुर गांव आज पूरे प्रदेश में मिनी ब्राजील के नाम से पहचान बना चुका है। गांव की पहचान केवल फुटबॉल खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां खेल एक परंपरा का रूप ले चुका है। कई दशकों से गांव की पीढ़ियां फुटबॉल से जुड़ी रही हैं और लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर इस खेल में अपनी प्रतिभा दिखा चुका है।
सुबह से शाम तक मैदान में दौड़ते सपने
गांव में सुबह की शुरुआत ही फुटबॉल के साथ होती है। सूरज निकलते ही बच्चे और युवा मैदानों में पहुंच जाते हैं। कच्चे मैदानों पर घंटों अभ्यास करते ये खिलाड़ी बड़े सपने संजोए हुए हैं। उनके लिए फुटबॉल सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि भविष्य की राह है। युवाओं का कहना है कि वे एक दिन भारत को फीफा विश्व कप में खेलते देखना चाहते हैं और खुद उस सफर का हिस्सा बनना चाहते हैं।
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देश-दुनिया में पहुंची गांव की पहचान
विचारपुर की फुटबॉल संस्कृति ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। गांव के कई खिलाड़ी विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां के खिलाड़ियों से मुलाकात कर चुके हैं और अपने कार्यक्रम मन की बात में गांव के खेल प्रेम का उल्लेख कर चुके हैं। इससे स्थानीय खिलाड़ियों का उत्साह और बढ़ा है।
संसाधन कम, हौसले बुलंद
खिलाड़ियों और कोचों का कहना है कि प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन बेहतर सुविधाओं और आधुनिक प्रशिक्षण की जरूरत है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद युवा लगातार मेहनत कर रहे हैं। कई खिलाड़ी मोबाइल और इंटरनेट के जरिए अंतरराष्ट्रीय मुकाबले देखकर नई तकनीक सीख रहे हैं और अपने खेल को निखारने में जुटे हैं।
ये भी पढ़ें- मैहर में भाजपा का कार्यक्रम बना अखाड़ा: सांसद व पूर्व मंत्री की मौजूदगी में भिड़े नेता, फीकी पड़ी उपलब्धियां
फीफा तक पहुंचने का सपना
विचारपुर में फुटबॉल अब सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक आंदोलन की तरह है। यहां की मिट्टी से निकल रहे खिलाड़ी यह साबित कर रहे हैं कि बड़े सपने देखने के लिए बड़े शहरों की जरूरत नहीं होती। यदि इन्हें उचित संसाधन और अवसर मिले, तो आने वाले वर्षों में शहडोल का कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करता नजर आ सकता है।
सानिया कुंडे कहती हैं कि हम लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं। आज हम फीफा देखकर सीख रहे हैं, लेकिन हमारा सपना है कि एक दिन भारत भी फीफा वर्ल्ड कप में उतरे और दुनिया हमारे खिलाड़ियों को भी उसी तरह देखे, जैसे हम आज बड़े खिलाड़ियों को देखते हैं। वहीं, कोच लक्ष्मी का कहना है कि मैं बच्चों को ट्रेंड कर रही हूं, यहां के बच्चे भी फीफा खेले।
फुटबॉल बना गांव की पहचान
शहडोल जिले का विचारपुर गांव आज पूरे प्रदेश में मिनी ब्राजील के नाम से पहचान बना चुका है। गांव की पहचान केवल फुटबॉल खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां खेल एक परंपरा का रूप ले चुका है। कई दशकों से गांव की पीढ़ियां फुटबॉल से जुड़ी रही हैं और लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर इस खेल में अपनी प्रतिभा दिखा चुका है।
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सुबह से शाम तक मैदान में दौड़ते सपने
गांव में सुबह की शुरुआत ही फुटबॉल के साथ होती है। सूरज निकलते ही बच्चे और युवा मैदानों में पहुंच जाते हैं। कच्चे मैदानों पर घंटों अभ्यास करते ये खिलाड़ी बड़े सपने संजोए हुए हैं। उनके लिए फुटबॉल सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि भविष्य की राह है। युवाओं का कहना है कि वे एक दिन भारत को फीफा विश्व कप में खेलते देखना चाहते हैं और खुद उस सफर का हिस्सा बनना चाहते हैं।
देश-दुनिया में पहुंची गांव की पहचान
विचारपुर की फुटबॉल संस्कृति ने राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। गांव के कई खिलाड़ी विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां के खिलाड़ियों से मुलाकात कर चुके हैं और अपने कार्यक्रम मन की बात में गांव के खेल प्रेम का उल्लेख कर चुके हैं। इससे स्थानीय खिलाड़ियों का उत्साह और बढ़ा है।
संसाधन कम, हौसले बुलंद
खिलाड़ियों और कोचों का कहना है कि प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन बेहतर सुविधाओं और आधुनिक प्रशिक्षण की जरूरत है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद युवा लगातार मेहनत कर रहे हैं। कई खिलाड़ी मोबाइल और इंटरनेट के जरिए अंतरराष्ट्रीय मुकाबले देखकर नई तकनीक सीख रहे हैं और अपने खेल को निखारने में जुटे हैं।
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फीफा तक पहुंचने का सपना
विचारपुर में फुटबॉल अब सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक आंदोलन की तरह है। यहां की मिट्टी से निकल रहे खिलाड़ी यह साबित कर रहे हैं कि बड़े सपने देखने के लिए बड़े शहरों की जरूरत नहीं होती। यदि इन्हें उचित संसाधन और अवसर मिले, तो आने वाले वर्षों में शहडोल का कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करता नजर आ सकता है।
सानिया कुंडे कहती हैं कि हम लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं। आज हम फीफा देखकर सीख रहे हैं, लेकिन हमारा सपना है कि एक दिन भारत भी फीफा वर्ल्ड कप में उतरे और दुनिया हमारे खिलाड़ियों को भी उसी तरह देखे, जैसे हम आज बड़े खिलाड़ियों को देखते हैं। वहीं, कोच लक्ष्मी का कहना है कि मैं बच्चों को ट्रेंड कर रही हूं, यहां के बच्चे भी फीफा खेले।

विचारपुर मिनी ब्राज़ील फुटबॉल ग्राउंड।

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