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MP News: भारती चैतन्य बनीं रित प्रज्ञानंद गिरी, मंगलनाथ तट पर पिंडदान और शिखा त्याग के साथ लिया संन्यास
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Tue, 21 Apr 2026 09:26 PM IST
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सार
धर्मनगरी उज्जैन के मौनी तीर्थ आश्रम में भारती चैतन्य ने पंचायती निरंजनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी सुमनानंद गिरि के सानिध्य में संन्यास दीक्षा ग्रहण की। संन्यास की प्राचीन परंपरा के अनुसार उन्होंने शिखा और दंड का त्याग किया, मुंडन कराया और स्वयं का पिंडदान व श्राद्ध कर्म संपन्न कर संसार से विदा ली।
22 साल के ब्रह्मचर्य के बाद भारती चैतन्य ने लिया संन्यास
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
धर्म की नगरी उज्जैन के मंगलनाथ मार्ग स्थित मौनी तीर्थ आश्रम में आज आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा संगम देखने को मिला। पंचायती निरंजनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी सुमनानंद गिरि महाराज के सानिध्य में भारती चैतन्य ने संन्यास ग्रहण कर लिया। संन्यास की कठिन परंपराओं का निर्वहन करते हुए उन्होंने सबसे पहले शिखा और दंड त्याग की विधि को पूरा किया, जिसके बाद तर्पण, पिंडदान, मुंडन और स्वयं का श्राद्ध कर्म भी संपन्न कराया गया। इस दीक्षा के बाद अब उनका नया नाम 'रित प्रज्ञानंद गिरी' हो गया है।
बचपन से थी संन्यास की लौ, हरिद्वार में किया शास्त्रों का अध्ययन
महामंडलेश्वर स्वामी सुमनानंद गिरी ने बताया कि रित प्रज्ञानंद गिरी (पूर्व नाम भारती चैतन्य) की बचपन से ही संन्यास मार्ग पर चलने की गहरी रुचि थी। उन्होंने हरिद्वार में रहकर लंबे समय तक विद्याध्ययन किया है। वे न केवल संस्कृत में पारंगत हैं, बल्कि संस्कृत संभाषण और 'प्रस्थानत्रयी' जैसे कठिन शास्त्रों का भी गहन अध्ययन कर रही हैं। संन्यास से पूर्व के सभी अनिवार्य कर्म, जैसे प्रायश्चित कर्म, दशविधि स्नान और पिंडदान आदि विधान पूर्वक संपन्न किए गए, ताकि वे पूर्णतः सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर सनातन पथ पर आगे बढ़ सकें।
'मोक्ष ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य': रित प्रज्ञानंद
संन्यास दीक्षा के बाद रित प्रज्ञानंद गिरी ने अपने भाव साझा करते हुए कहा, "मैंने 22 साल पहले ही अपने माता-पिता और घर को छोड़ दिया था। उस समय मेरा उद्देश्य अच्छी शिक्षा प्राप्त करना था, लेकिन अब मैं समझ चुकी हूं कि जीवन का असली लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है।" उन्होंने आगे कहा कि साधु का कोई घर या विशेष स्थान नहीं होता, इसलिए वे अपनी पुरानी पहचान को पीछे छोड़ चुकी हैं। पिछले 22 वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद अब वे गुरु की शरण में रहकर शास्त्रों का अध्ययन करेंगी और अपना जीवन सामाजिक कार्यों व साधना में व्यतीत करेंगी।
रित प्रज्ञानंद ने स्पष्ट किया कि अब उनके जीवन का एक ही संकल्प है-सनातन धर्म की सेवा। उन्होंने कहा कि उनका नया नाम एक नई शुरुआत का प्रतीक है। अब वे अपना पूरा जीवन ईश्वर और अपने गुरुदेव के चरणों में समर्पित करते हुए धर्म का प्रचार-प्रसार करेंगी। स्वामी सुमनानंद गिरी ने भी विश्वास जताया कि रित प्रज्ञानंद अपनी साधना को और प्रखर बनाएंगी और समाज को सही दिशा दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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बचपन से थी संन्यास की लौ, हरिद्वार में किया शास्त्रों का अध्ययन
महामंडलेश्वर स्वामी सुमनानंद गिरी ने बताया कि रित प्रज्ञानंद गिरी (पूर्व नाम भारती चैतन्य) की बचपन से ही संन्यास मार्ग पर चलने की गहरी रुचि थी। उन्होंने हरिद्वार में रहकर लंबे समय तक विद्याध्ययन किया है। वे न केवल संस्कृत में पारंगत हैं, बल्कि संस्कृत संभाषण और 'प्रस्थानत्रयी' जैसे कठिन शास्त्रों का भी गहन अध्ययन कर रही हैं। संन्यास से पूर्व के सभी अनिवार्य कर्म, जैसे प्रायश्चित कर्म, दशविधि स्नान और पिंडदान आदि विधान पूर्वक संपन्न किए गए, ताकि वे पूर्णतः सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर सनातन पथ पर आगे बढ़ सकें।
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'मोक्ष ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य': रित प्रज्ञानंद
संन्यास दीक्षा के बाद रित प्रज्ञानंद गिरी ने अपने भाव साझा करते हुए कहा, "मैंने 22 साल पहले ही अपने माता-पिता और घर को छोड़ दिया था। उस समय मेरा उद्देश्य अच्छी शिक्षा प्राप्त करना था, लेकिन अब मैं समझ चुकी हूं कि जीवन का असली लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है।" उन्होंने आगे कहा कि साधु का कोई घर या विशेष स्थान नहीं होता, इसलिए वे अपनी पुरानी पहचान को पीछे छोड़ चुकी हैं। पिछले 22 वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद अब वे गुरु की शरण में रहकर शास्त्रों का अध्ययन करेंगी और अपना जीवन सामाजिक कार्यों व साधना में व्यतीत करेंगी।
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सनातन धर्म और ईश्वर को समर्पित नई पारीरित प्रज्ञानंद ने स्पष्ट किया कि अब उनके जीवन का एक ही संकल्प है-सनातन धर्म की सेवा। उन्होंने कहा कि उनका नया नाम एक नई शुरुआत का प्रतीक है। अब वे अपना पूरा जीवन ईश्वर और अपने गुरुदेव के चरणों में समर्पित करते हुए धर्म का प्रचार-प्रसार करेंगी। स्वामी सुमनानंद गिरी ने भी विश्वास जताया कि रित प्रज्ञानंद अपनी साधना को और प्रखर बनाएंगी और समाज को सही दिशा दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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