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Vijaya Dashami: यहां अच्छे-अच्छे निशानेबाज हो जाते हैं फेल, गोफान से निकला पत्थर बदलता है दिशा; आखिर ऐसा क्यों

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, विदिशा Published by: उदित दीक्षित Updated Sat, 12 Oct 2024 03:14 PM IST
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सार

Vijayadashami: विदिशा जिले के कालादेव गांव में दशहरे पर राम-रावण युद्ध की परंपरा है। रावण की सेना राम की सेना पर गोफन से पत्थर बरसाती है। इस युद्ध में खास बात यह है कि राम की सेना को रावण की सेना द्वारा बरसाए गए पत्थर नहीं लगते हैं।

Vijayadashami: yuddh between Ram and Ravana sena in Vidisha Unique Dussehra Hindi News
श्रीराम और रावण की सेना में होता युद्ध। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

Unique Dussehra Hindi News: मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में दशहरा पर्व को अलग-अलग रूपों में मनाने की परंपरा है। कहीं, रावण जलाने पर पाबंदी, कहीं पूजा करने की परंपरा है तो कहीं पत्थरों से राम-रावण की सेना के बीच भी युद्ध होता है। 

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दरअसल, हम बात कर रहे हैं विदिशा जिले के कालादेव गांव की जहां दशहरे के अवसर पर राम-रावण युद्ध की परंपरा है। रावण की सेना राम की सेना पर गोफन से पत्थर बरसाती है। राम-रावण के इस युद्ध में खास बात यह है कि राम की सेना पर रावण की सेना द्वारा बरसाए गए पत्थर नहीं लगते। कहते हैं यहां अच्छे से अच्छे निशानेबाजों की एक नहीं चलती, अच्छे से अच्छे गोफन चलाने वाले निशानेबाज कालादेव में असहाय नजर आते हैं। यहां बंदूक से भी अचूक गोफन से निशाना लगाने वाले भील और बंजारा समाज के लोग रावण की सेना बनते हैं, जबकि कालादेव गांव के लोग राम की सेना बनते हैं। इस युद्ध के दौरान रावण की सेना द्वारा मारा गया पत्थर अपनी दिशा बदल लेता है और राम की सेना में शामिल लोगों को नहीं लगता है।
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गांव में रावण की प्रतिमा
विदिशा जिले में लटेरी तहसील के कालादेव गांव में मनाए जाने वाले इस आयोजन में दशानन रावण को जलाया नहीं जाता। गांव में रावण की एक विशालकाय प्रतिमा है। इसके सामने एक ध्वज लगाया जाता है। यह ध्वज राम और रावण के युद्ध का प्रतीक होती है। राम की सेना ध्वज की परिक्रमा लगाती है, तो दूसरी ओर रावण की सेना पत्थर बरसाती है।

परंपरा कितनी पुरानी किसी को जानकारी नहीं
इस युद्ध के दौरान एक तरफ कालादेव के लोग रामदल के रूप में आगे बढ़ते परिक्रमा लगाते हुए इस ध्वजा को छूने का प्रयास करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर रावण दल के लोग उन पर गोफन से पत्थरों की बरसात करते हैं। लेकिन, चमत्कार की बात यह है कि गोफन से निकले ये पत्थर रामदल के लोगों को नहीं लगते, बल्कि मैदान से अपनी दिशा बदलकर निकल जाते हैं। ऐसा क्यों होता है, इस सवाल पर लोग कहते हैं कि सब श्रीराम की महिमा है। कालादेव में दशहरे पर होने वाले इस युद्ध की परंपरा कब से चली आ रही है, इसके बारे में किसी को जानकारी नहीं है। 

कोई घायल ही नहीं होता 
सदियों पुरानी इस परंपरा में रावण की सेना का प्रतिनिधित्व आसपास के आदिवासी और बंजारा समाज के लोग करते हैं। आयोजन के प्रारंभ होने के पहले ही रावण की प्रतिमा के पास आदिवासियों द्वारा पत्थरों का ढेर लगाकर अपनी गोफन तैयार कर ली जाती है। पत्थरों के इस हमले में रामदल का कोई भी व्यक्ति घायल नहीं होता, वे राम की जय-जयकार कर अपने स्थान पर पहुंच जाते हैं। युद्ध में राम सेना के विजयी होने पर हजारों की संख्या में उपस्थित लोग जीत का जश्न मनाते हैं और एक-दूसरे को दशहरा की बधाई देते हैं।

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