शहर में एक ऑटो चालक द्वारा न्याय न मिलने पर अनोखे और भावनात्मक विरोध का मामला सामने आया है। वर्षों से मेहनत कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे संतोष मूले ने सिस्टम से निराश होकर मुक्तिधाम पहुंचकर अपना मुंडन कराया और इसे अपने आत्मसम्मान व पीड़ा का प्रतीक बताया।
घटना की शुरुआत 7 मार्च की सुबह हुई, जब संतोष अपने ऑटो से एक महिला को मेडिकल कॉलेज छोड़ने पहुंचे। संबंधित महिला वहां आउटसोर्स कर्मचारी के रूप में कार्यरत बताई जा रही है। संतोष के अनुसार, मेडिकल कॉलेज के मुख्य गेट पर उस समय एंबुलेंस और अन्य वाहनों की भीड़ थी, जिससे अंदर तक वाहन ले जाना संभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने महिला को गेट के पास ही उतार दिया। इसी बात पर महिला नाराज हो गई और आरोप है कि उसने अन्य कर्मचारियों को बुलाकर संतोष के साथ मारपीट की तथा अभद्र व्यवहार किया।
संतोष का कहना है कि घटना के बाद उन्होंने मेडिकल कॉलेज परिसर में ही अन्य कर्मचारियों से शिकायत की, लेकिन वहां भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। उल्टा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की गई, जिससे वह और अधिक आहत हो गए। इसके बाद उन्होंने कोतवाली थाने में जाकर लिखित शिकायत दर्ज कराई, जहां उनका मेडिकल परीक्षण भी कराया गया। बावजूद इसके, संतोष का आरोप है कि कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ और उन्हें न्याय नहीं मिला।
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उन्होंने मेडिकल कॉलेज के डीन से भी इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की, लेकिन वहां से भी निराशा ही हाथ लगी। लगातार दर-दर भटकने और सुनवाई न होने से संतोष मानसिक रूप से टूट गए। इसी निराशा के चलते उन्होंने समाज के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए एक अनोखा और प्रतीकात्मक रास्ता चुना।
संतोष ने मुक्तिधाम पहुंचकर अपना मुंडन कराया और इसे अपनी “प्रतीकात्मक मृत्यु” बताया। उन्होंने कहा कि जब एक जीवित व्यक्ति की कहीं सुनवाई नहीं होती, तो वह खुद को मृत समान महसूस करता है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वे 13 दिनों तक मृत्यु संस्कार से जुड़ी सभी रस्में निभाएंगे, ताकि समाज और प्रशासन उनकी पीड़ा को समझ सके।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच संतोष ने एक महत्वपूर्ण मांग भी उठाई है। उन्होंने कहा कि आउटसोर्स कर्मचारियों को केवल उनके कार्यस्थल तक ही वर्दी पहनने की अनुमति होनी चाहिए, ताकि वे सार्वजनिक स्थानों पर अपने पद का दुरुपयोग न कर सकें।