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ट्रेन में मेरे साथ भी हुआ बुरा बर्तावः माधुरी दीक्षित
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Fri, 21 Feb 2014 08:58 AM IST
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माधुरी दीक्षित को वह समय आज तक याद है जब वह कॉलेज जाने के लिए बस और ट्रेन से सफर करतीं थीं।
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अपनी नई पारी में माधुरी दीक्षित काम भी नए ढंग के कर रही हैं। ‘डेढ़ इश्किया’ में उन्हें दर्शकों ने बेगम पारा के रोल में पसंद किया। अब ‘गुलाब गैंग’ में वह धरती की बेटी रज्जो बन कर एक्शन से भरपूर किरदार निभा रही हैं। यहां जूही चावला से भी उनका मुकाबला है।
गुलाब गैंग को लेकर कंट्रोवर्सी हो रही है। संपत पाल और उनकी टीम इस फिल्म के बारे में कह रहे हैं कि उनके अभियान से यह पूरी फिल्म प्रेरित है?
अगर गुलाब गैंग और उनके अभियान में कोई समानता है तो वह अपने अधिकारों के लिए स्त्रियों के संघर्ष के विचार के साथ खत्म हो जाती है। निर्देशक सौमिक सेन ने खुद कहानी लिखी है और इसे अपने ढंग से विस्तार दिया है। फिल्म में अपने ढंग का सामाजिक ताना-बना और महिलाओं का संघर्ष है। फिल्म में राजनीति भी दिखाई गई है। रज्जो (माधुरी) की लड़ाई व्यक्तिगत नहीं है।
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आप खुद राजनीति में कितनी दिलचस्पी लेती हैं?
सच कहूं तो मुझे राजनीति की कोई समझ नहीं है। पहले दिलचस्पी भी नहीं थी। परंतु इस फिल्म को करने के बाद मुझे लगा कि हमें राजनीति को समझना चाहिए और दिलचस्पी लेनी चाहिए क्योंकि इससे हमारा और समाज का भविष्य तय होता है।
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आखिर वर्षों बाद आप और जूही चावला साथ में हैं। साथ आने में क्यों इतना वक्त लगा?
अगर यह वक्त न लगता तो शायद लोगों की इस फिल्म में इतनी रुचि नहीं होती। वैसे सच्चाई यह है कि हम लोग अपने-अपने कैरियर में व्यस्त थे। ऐसी फिल्में भी नहीं आईं कि हमें साथ में काम करने का मौका दिया गया हो। यह सही है कि हम लोग करीबी दोस्त नहीं थीं, लेकिन कहीं न कहीं एक-दूसरे से दुआ-सलाम तो हो ही जाती थी।
आप दोनों के ईगो और प्रतिद्वंद्विता की चर्चा होती रही है। इस फिल्म से पहले बातें कैसे सामान्य हुईं?
इस मामले में हमारे डायरेक्टर ने एक बड़ा अच्छा काम किया। हमें मालूम तो था कि साथ काम कर रहे हैं। सौमिक ने शूटिंग शुरू होने से एक दिन पहले हम दोनों को अपने ऑफिस में बुलाया। हैलो-हाय के बाद हम सौमिक के कमरे में बैठ गए। कुछ और लोग भी वहां बैठे थे।
फिर धीरे-धीरे कुछ देर में सब एक-एक कर वहां से खिसक गए और हम दोनों रह गए। अब दोनों वहां बैठे-बैठे क्या करते। इधर-उधर की बातें शुरू हुई और धीरे-धीरे फिर पता ही नहीं चला कि कब हम सहज हो गए। वैसे यह कहना गलत होगा कि हमारे बीच पहले कोई समस्या थी। जूही के साथ मुझे न पहले कोई समस्या थी और न आज है।
पहली बार साथ में काम करते हुए आपने जूही में क्या खास बातें देखी?
मुझे उन्हें हमेशा हंसते-खिलखिलाते देखने का मौका मिला। वैसे तो हमें एक-दूसरे के बारे में बहुत सारी बातें पहले से पता थीं क्योंकि कई कॉमन ऐक्टरों के साथ काम किया था। जूही की कई फिल्में भी मैंने पहले देखी थीं। मुझे उनकी ‘हम हैं राही प्यार के’ सबसे ज्यादा पसंद है।
‘गुलाब गैंग’ में महिलाओं पर अत्याचार और अन्याय की तस्वीर है। क्या निजी जिंदगी में महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं का आपने सामना किया है?
कोई बड़ी घटना तो नहीं हुई, लेकिन जब स्कूल-कॉलेज जाते थे और ट्रेन-बस में सफर करना पड़ता था तो जरूर कभी कभार कुछ लोगों की बदतमीजी का सामना करना पड़ता था। लेकिन जब बड़ी हुई तो सहेलियों का हमारा एक ग्रुप था, हम लोग जब रेल-बस में चढ़ते थे तो कागज का एक रोल बना लेते थे और पास आने की कोशिश करने वालों को उससे दूर ढकेल देते थे।
आपने फिल्म में ऐक्शन सीन किए हैं। घर में इस पर कैसी प्रतिक्रिया है?
बच्चे अब थोड़े समझदार हो गए हैं, उन्हें तो ये सीन देख कर मजा आ रहा है। डॉक्टर नेने (पति) भी मुझे अलग रोल में देख कर खुश हैं। हालांकि ट्रेलर देखने के बाद उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी अब तुमसे थोड़ा डरना पड़ेगा।
क्या आपके बेटे आपको स्टार के रूप में देखने लगे हैं?
अरे कहां! उनके लिए तो मां सिर्फ मां है। हां, वो कभी कभी जरूर स्कूल से आकर कहते हैं कि उनका कोई दोस्त कह रहा था कि तुम्हारी मम्मी माधुरी दीक्षित है, तुम कितने लकी हो। लेकिन उन्हें इस पर सिर्फ थोड़ी देर के लिए आश्चर्य होता है। फिर वे सामान्य हो जाते हैं।