जब हम कोई कार या बाइक खरीदते हैं, तो हममें से ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि यह पूरी तरह से हमारा निजी फैसला है। हमें लगता है कि सड़कों पर एसयूवी (SUV) का दबदबा इसलिए है क्योंकि लोग उन्हें पसंद करते हैं, या छोटे टर्बो इंजन तकनीकी सुधारों की वजह से आए हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारतीय ऑटो बाजार को ग्राहकों की पसंद से कहीं ज्यादा सरकारी नीतियों ने आकार दिया है। कराधान (टैक्सेशन), ईंधन की कीमतें, उत्सर्जन मानक (एमिशन नॉर्म्स) और सुरक्षा नियम ही यह तय करते हैं कि कंपनियां क्या बनाएंगी और उनकी कीमतें क्या होंगी।
Car Buying Trends: शोरूम नहीं, सरकारी नीतियां तय करती हैं कि आप कौन सी कार खरीदेंगे; जानें अंदर की बात
भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार को लेकर अधिकांश लोग यही मानते हैं कि सड़कों पर दिखने वाली गाड़ियां और उनके इंजन पूरी तरह से ग्राहकों की पसंद का नतीजा हैं। हालांकि, असल सच्चाई इसके उलट है। गाड़ियों के डिजाइन से लेकर उनके इंजन के साइज तक की पूरी रूपरेखा वास्तव में शोरूम के बजाय वर्षों पहले सरकारी नीतिगत कमरों में तय कर दी जाती है। टैक्स नियम, कड़े उत्सर्जन मानक और सुरक्षा कानून किस तरह चुपचाप आपकी पसंदीदा कार को आकार दे रहे हैं, इसी का एक विस्तृत और आंखें खोलने वाला विश्लेषण इस रिपोर्ट में पेश किया गया है।
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सब-4-मीटर (Sub-4-metre) नियम ने कारों के डिजाइन को कैसे बदला?
भारत के टैक्स ढांचे में शामिल इस छोटे से नियम ने भारतीय सड़कों का पूरा नक्शा ही बदल दिया:
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टैक्स की शर्तें: इस नियम के तहत 4 मीटर से कम लंबाई वाली उन कारों पर कम टैक्स लगाया गया, जिनमें पेट्रोल इंजन 1.2 लीटर से कम और डीजल इंजन 1.5 लीटर से कम का हो।
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डिजाइन में बदलाव: वित्तीय लाभ उठाने के लिए वाहन निर्माताओं ने कारों के बूट (डिक्की) को छोटा कर दिया, अनुपात बदल दिए और पूरी तरह से नए प्लेटफॉर्म तैयार किए।
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नए सेगमेंट्स का उदय: इसी टैक्स नीति के कारण मारुति सुजुकी डिजायर, ह्यूंदै वेन्यू और टाटा नेक्सन जैसी कॉम्पैक्ट सेडान और सब-कॉम्पैक्ट एसयूवी का जन्म हुआ। आज जिसे लोग ग्राहकों की स्वाभाविक पसंद मानते हैं, वह वास्तव में इस टैक्स नीति का नतीजा है।
BS6 उत्सर्जन मानकों ने डीजल कारों के बाजार को कैसे खत्म किया?
एक समय भारतीय बाजार में डीजल गाड़ियों का दबदबा था, लेकिन एक कड़े नियम ने इस पूरे परिदृश्य को उलट दिया:
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लागत में भारी वृद्धि: साल 2020 में भारत ने सीधे BS4 से कड़े BS6 मानकों को अपनाया। इसके कारण छोटी गाड़ियों के लिए डीजल इंजन को नियमों के अनुकूल बनाना बेहद महंगा हो गया।
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मैन्युफैक्चरर्स का पीछे हटना: बढ़ती लागत के कारण कई निर्माताओं ने किफायती कारों में डीजल इंजन देना ही बंद कर दिया। इसके बाद ग्राहक मजबूरन पेट्रोल, हाइब्रिड और टर्बो-पेट्रोल की तरफ शिफ्ट हो गए। जो बाहर से देखने पर ग्राहकों की प्राकृतिक पसंद जैसा लगा।
CAFE नियमों ने आधुनिक इंजनों को चुपचाप कैसे बदल दिया?
'कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी' (CAFE) एक ऐसा नियम है जिसके बारे में आम ग्राहकों ने शायद ही सुना हो, लेकिन यह आपकी गाड़ी के इंजन को सीधा प्रभावित करता है:
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पूरी फ्लीट की दक्षता पर नजर: यह नियम किसी एक कार के बजाय एक निर्माता द्वारा बेचे जाने वाले सभी वाहनों की 'औसत ईंधन दक्षता' (एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी) को नियंत्रित करता है।
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इंजन डाउनसाइजिंग और टर्बो तकनीक: कंपनियों पर अपनी पूरी लाइनअप का माइलेज सुधारने का लगातार दबाव रहता है। यही कारण है कि बड़े इंजनों की जगह अब बड़ी एसयूवी में भी 1.0-लीटर या 1.5-लीटर के छोटे टर्बो-पेट्रोल इंजन मिलने लगे हैं।
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अतिरिक्त फीचर्स की मजबूरी: गाड़ियों में मिलने वाले ऑटो स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम, माइल्ड हाइब्रिड और रीजनेरेटिव ब्रेकिंग जैसी प्रौद्योगिकियां भी इसीलिए लोकप्रिय हुईं क्योंकि प्रत्येक छोटी बचत निर्माताओं को इन सरकारी नियमों को पूरा करने में मदद करती है।
सुरक्षा नियमों ने कारों को कितना बेहतर और महंगा बनाया?
सुरक्षा मानकों के कड़े होने से गाड़ियों की गुणवत्ता में तो सुधार हुआ, लेकिन इसका असर ग्राहकों की जेब पर भी पड़ा:
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अनिवार्य सुरक्षा उपकरण: एयरबैग, एबीएस (ABS), रिवर्स पार्किंग सेंसर, क्रैश सेफ्टी नॉर्म्स और भारत एनसीपी (Bharat NCAP) टेस्टिंग जैसे नियमों ने कारों को पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित बना दिया है।
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बजट कारों की विदाई: इन नियमों के कारण गाड़ियों की विकास लागत बढ़ गई। कई पुरानी बजट कारें इस लागत के कारण अपडेट नहीं हो सकीं और बाजार से गायब हो गईं। इसके चलते एंट्री-लेवल कारें महंगी हो गईं और ग्राहक उच्च सेगमेंट्स की ओर बढ़ने को मजबूर हुए।