बेसिल जाहरॉफ को 'मौत का सौदागर' कहा जाता था। लोग उन्हें अपने वक्त के सबसे ताकतवर लोगों में से शुमार करते थे। लेकिन दुनिया को अब तक 1900 की शुरुआत में दुनिया के सबसे बड़े हथियारों के सौदागर रहे बेसिल जाहरॉफ के जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। जाहरॉफ अपने वक्त के सबसे धनी लोगों में शुमार थे, लेकिन उनका जीवन इतना रहस्यमय था कि अब तक ये भी निश्चित तौर पर नहीं पता कि वो असल में किस देश के नागरिक थे। उनके बारे में जो व्यापक धारणा मौजूद है, उसके अनुसार जाहरॉफ यूनान के थे।
कुस्तुनतुनिया का वो 'मौत का सौदागर,' जिसे ब्रिटेन ने दी थी नाइट की उपाधि
बेसिल का पहले काम
परिवार के बारे में अब तक जितनी जानकारी उपलब्ध है उन सबसे अनुसार ये एक बेहद गरीब परिवार था। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेसिल जाहरॉफ को वो काम करने पड़ते थे, जो उस वक्त बच्चों के लिए सही नहीं माने जाते थे। कम उम्र में ही अपनी हरकतों के लिए बेसिल विवादों में रहने लगे। जो पहला काम बेसिल ने किया उनसें से एक था पर्यटकों को कुस्तुन्तुनिया के रेड लाइट एरिया यानी वैश्याओं के इलाके में ले कर जाना। यहां पर्यटक वेश्या की तलाश करने आते थे। इसके बाद वो अग्निशमन कर्मचारी बन गए।
लेकिन उनकी जीवनी लिखने वालों में से एक रिचर्ड डेवनपोर्ट-हाइन्स के अनुसार बेसिल आग लगाने का काम करते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि उस दौर में आग लगने के मामलों में धनी लोग अपनी मूल्यवान वस्तुएं बचाने के लिए अग्निशमन कर्मचारियों को पैसे देते थे। इसके बाद वे मुद्रा विनिमय का काम करने लगे और देश से बाहर जाने वालों के लिए वो दूसरे देश की मुद्रा की व्यवस्था करने लगे। इस बात की अब तक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन कहा जाता है कि वो कुस्तुन्तुनिया से बाहर जाने वालों और पर्यटकों को जाली पैसे दे देते थे। ब्रिटानिया एन्साइक्लोपीडिया के अनुसार अपने परिवार के बीच भी जाहरॉफ को लेकर एक बार विवाद पैदा हो गया था। बेसिल उस वक्त 21 साल के थे और इंग्लैंड में अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस आए थे। वापस आने के बाद वो अपने चाचा के साथ काम करने लगे।
हथियारों का व्यापार
इस्तांबुल में उनके चाचा का कपड़ों का बड़ा व्यवसाय था। उन्होंने बेसिल को लंदन में अपनी कंपनी का प्रतिनिधि बना कर भेजा। लेकिन, दो साल बाद बेसिल के चाचा ने उन पर गबन करने का आरोप लगाया। विवाद बढ़ा, बेसिल गिरफ्तार हुए और मामला मुकदमे तक पहुंच गया। उस दौर के यूनानी समुदाय का मानना था कि परिवार के भीतर हुए विवाद को अंग्रेजों के कोर्ट तक नहीं ले जाना चाहिए। ऐसे में बेसिल को इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वह अदालत के अधिकार क्षेत्र में रहें और गबन की रकम का भुगतान करते रहें।
लेकिन आजाद होते ही जाहरॉफ ने अपना नाम बदला और भागकर यूनान की राजधानी एथेंस आ गए। हथियार बेचने के कारोबार में उनका कदम रखना एक संयोग ही था। राजधानी एथेंस में बेसिल की मुलाकात स्थानीय फाइनेंसर और राजनयिक स्टेफानोस स्कोलोडिस से हुई। दोनों में गहरी दोस्ती हो गई। स्कोलोडिस के एक स्वीडिश मित्र थे जो स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी थॉर्स्टन नॉर्दनफेल्ट में काम करते थे। वो नौकरी छोड़ कर जाना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपनी जगह पर काम के लिए जाहरॉफ की शिफारिश की। इस तरह हथियार बनाने की कंपनी में उन्होंने काम करना शुरू किया।
साल 1877 में वो यूनानी-रूसी व्यक्ति बाल्कान क्षेत्र के लिए थॉर्स्टन नॉर्दनफेल्ट के एजेंट बन गए। जैसे-जैसे कंपनी बड़ी होती गई जाहरॉफ का दबदबा भी बढ़ता गया। साल 1888 में हीरम स्टीवन्स मैक्सिम (ऑटोमैटिक मशीन गन के आविष्कारक) ने अपनी कंपनी मैक्सिम गन कंपनी का विलय नॉर्दनफेल्ट के साथ कर दिया। जाहरॉफ का भी रुतबा बढ़ा और नई मैक्सिम नॉर्दनफेल्ट गन्स एंड एम्यूनिशन कंपनी लिमिटेड में पूर्वी यूरोप और रूस के लिए वो कंपनी के प्रतिनिधि बन गए।
उस दौर में बाल्कान देशों, तुर्की और रूस के बीच राजनीतिक और सैन्य तनाव अपने चरम पर था। सभी देश अपने पड़ोसी के हमले से बचने के लिए अपनी सुरक्षा बढ़ाना चाहते थे। ऐसी स्थिति में बेसिल को हथियारों बिक्री बढ़ाने का सुनहरा मौका मिला, जिसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया। साल 1897 में ब्रितानी कंपनी विकर्स सन्स एंड कंपनी ने मैक्सिम नॉर्दनफेल्ट को खरीद लिया और इसके साथ ही बेसिल के काम का दायरा बढ़ा और साथ ही उनके प्रभुत्व का दायरा भी और बढ़ गया।
गलत तरीकों का इस्तेमाल
कारोबार के क्षेत्र में नई कंपनी विकर्स सन्स एंड मैक्सिम (1911 में कंपनी का नाम बदल कर विकर्स लिमिटेड कर दिया गया) को सफल बनाने में बेसिल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साल 1927 तक उन्होंने कंपनी में काम किया। हथियार बेचने की उनकी एक पॉपुलर तरकीब थी तनावपूर्ण संबंधों वाले दो देशों के बीच की दुश्मनी को बढ़ाना और फिर दोनों को सैन्य साजोसामान और सेना की गाड़ियां बेचना। एक जानामाना उदाहरण है नॉर्दनफेल्ट पनडुब्बी का।
उदार भुगतान की शर्तों के वादे के साथ जाहरॉफ यूनानियों को इसका पहला मॉडल बेचने में कामयाब रहे। इसके बाद उन्होंने तुर्की से कहा कि यूनान के पास जो पनडुब्बी है उससे उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है। उन्होंने तुर्की को दो पनडुब्बियां खरीदने के लिए मना लिया। इसके बाद उन्होंने रूसियों को मनाया कि तीन पनडुब्बियों से काले सागर के इलाके में सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इस तरह उन्होंने रूस को दो और पनडुब्बियां बेचीं। इनमें से कोई भी पनडुब्बी कभी इस्तेमाल में नहीं लाई जा सकी, लेकिन इन्हें तैनात जरूर किया गया। हालांकि, जानकार मानते हैं कि पनडुब्बी का ये मॉडल डिफेक्टिव था।