रासायनिक कीटनाशकों की खोज से पहले फसलों में लगने वाले कीड़ों को खत्म करने के लिए किसान छोटे शिकारी जीवों पर निर्भर रहे हैं। वही प्रथा अब नए रूप में सामने आई है। दक्षिण पूर्व एशिया में जैव विविधता से समृद्ध जंगलों में लाखों किसान कसावा की खेती पर निर्भर हैं। इस नकदी फसल की खेती एक-दो हेक्टेयर जमीन वाले छोटे किसान भी करते हैं और हजारों हेक्टेयर वाले बड़े किसान भी।
एक मिलीमीटर का वो कीड़ा, जिसने एक देश की अर्थव्यवस्था बचा ली
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बीजिंग के पौध संरक्षण संस्थान में जैव नियंत्रण विशेषज्ञ क्रिस वाइकहायस का कहना है कि कुछ क्षेत्रों में जंगल की कटाई बहुत तेज हो गई। कंबोडिया में जंगल कटाई की दर सबसे ज्यादा है। मिलीबग कीड़ों ने कसावा किसानों की रोजी-रोटी के साथ-साथ इस क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाला। स्टार्च के वैकल्पिक स्रोतों, जैसे मक्का और आलू की कीमत बढ़ गई। थाईलैंड दुनिया में कसावा स्टार्च का नंबर एक निर्यातक है। वहां इसके दाम तीन गुणा बढ़ गए।
वाइकहाइस कहते हैं, "जब कोई कीड़ा पैदावार 60 से 80 फीसदी कम कर दे तो आपको बड़ा झटका लगेगा।" समाधान के तौर पर दक्षिण अमेरिका में मिलीबग के प्राकृतिक शत्रु, एक मिलीमीटर लंबे परजीवी ततैया (एनागायरस लोपेजी) की खोज करनी थी। यह छोटा ततैया कसावा मिलीबग पर ही अंडे देता है। 2009 के आखिर में इस ततैये को थाईलैंड के कसावा खेतों में छोड़ा गया और आते ही इसने काम शुरू कर दिया। इस बात की विस्तृत जानकारी नहीं है कि ततैये कितनी तेजी से मिलीबग की आबादी को साफ कर देते हैं। 2010 में पूरे थाईलैंड में हवाई जहाजों से लाखों ततैये छोड़े गए। जल्द ही उनका असर दिखने लगा।
एक मिलीमीटर के शिकारी
1980 के दशक में यही ततैये पश्चिम अफ्रीका में छोड़े गए थे। उन्होंने तुरंत ही मिलीबग की तादाद 80 से 90 फीसदी तक घटा दी थी। तीन साल से भी कम समय में ये ततैये दक्षिण-पश्चिमी नाइजीरिया के दो लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैल गए। वहां के कसावा खेतों में ये आसानी से मिल जाते हैं। इस तरह के हस्तक्षेप को जैव नियंत्रण कहा जाता है। आप एक प्राकृतिक शिकारी को ढूंढ़ते हैं और उसे कीड़ों को खाने के लिए खेतों में छोड़ देते हैं। इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 26 देशों के किसानों को सालाना 14.6 अरब डॉलर से लेकर 19.5 अरब डॉलर तक का फायदा हुआ। वाइकहाइस कहते हैं, "एक मिलीमीटर के ततैये ने वैश्विक स्टार्च बाजार की बड़ी समस्या सुलझा दी।"
किसानों को सही कीट होने के फायदे सदियों से पता हैं। कनाडा के ओंटारियो में वाइनलैंड रिसर्च एंड इनोवेशन सेंटर की वैज्ञानिक रोज ब्यूटेन्हस का कहना है कि जैव नियंत्रण हजारों साल से हो रहा है। इसे नया समझना मजाक है। सवाल है कि यदि जैव नियंत्रण इतना कारगर हो सकता है तो हानिकारक कीड़ों को खत्म करने में इसका इस्तेमाल क्यों नहीं होता? अगर यह काम न करे तो क्या होगा? और शोधकर्ता इसमें बदलाव पर जोर क्यों दे रहे हैं?
समाधान या समस्या?
पूर्व-कोलंबियाई मेसो-अमरीकी लोग केन टोड (दादुर या बड़े मेढक) को जीवन और मृत्यु के बीच का समझते थे। ये टोड एक जहर बनाते थे जो मतिभ्रम उत्पन्न करता था। मेसो-अमरीकी पुजारी इसका इस्तेमाल मृत पुरखों से संवाद करने में इस्तेमाल करते थे। माया सभ्यता के लोग सांप और चिड़ियों को पूजते थे जो मेसो-अमरीकी कला में भी दिखता है। माया और अन्य देसी समुदायों ने केन टोड को भी अपने शिल्प में जगह दी है। पानी और जमीन दोनों पर रहने वाले और बारिश में टर्र-टर्र करने वाले टोड फसलों की सेहत के लिए जरूरी थे।
अंडे से टैडपोल और टोडलेट्स का विकास बारिश का मौसम शुरू होने का संकेत देता था। पानी से उनका बाहर आना मानो पाताल से बाहर आने जैसा था। केन टोड फसलों में लगने वाले कीड़ों को दूर रखते थे। मक्के के खेतों और अनाज के भंडारों में वे कीट-पतंगों और छोटे कीड़ों को चट कर जाते। केन टोड का जहर शिकारी दुश्मनों से उनकी रक्षा करता है। वह जहर इतना तेज होता है कि लापरवाही बरतने पर इंसान की भी जान ले सकता है। मेसो-अमेरिका के स्वदेशी लोग कुदरत के इस दोहरेपन को समझते थे। वह यह भी जानते थे कि कुदरत से खिलवाड़ के गंभीर नतीजे हो सकते हैं।
ऑस्ट्रेलिया केन टोड से नफरत करता है। वहां 1935 में जैव नियंत्रण के लिए अमेरिका से इन्हें मंगाया गया था। उत्तर-पूर्वी प्रांतों के गन्ना खेतों में वे खूब फले-फूले। उन खेतों में टोड के मनपसंद कीड़ों (केन बीटल और अन्य ऑस्ट्रेलियाई कीड़े) की बहुतायत थी और टोड का शिकार करने वाले जीव कम थे। इससे उनकी संख्या का विस्फोट हो गया। 2007 में अनुमान लगाया गया कि केन टोड ऑस्ट्रेलिया के 12 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में छाए हुए हैं और उनकी तादाद 1.5 अरब हो गई है। जलवायु परिवर्तन से यह तादाद और बढ़ सकती है। नतीजा विनाशकारी था। देसी मेढकों का शिकार करने वाले जीव, जैसे कुओल और बड़ी छिपकलियां केन टोड के जहर से मरने लगे। ऑस्ट्रेलिया सरकार और स्थानीय लोग हर साल लाखों टोड मारते हैं।