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रोड ऑफ बोन्स: दुनिया की एक ऐसी सड़क, जिसे बनाने में 10 लाख लोगों ने गंवाई थी जान
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सोनू शर्मा
Updated Thu, 11 Mar 2021 03:36 PM IST
दुनिया में ऐसी बहुत सी सड़कें हैं, जो किसी न किसी वजह से खास हैं। जैसे- कोई दुनिया की सबसे लंबी सड़क है, तो कोई दुनिया की सबसे छोटी, तो कोई सबसे चौड़ी। वैसे आमतौर पर सड़क बनाने में ईंट, पत्थर से लेकर सीमेंट और डामर का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में एक ऐसी भी सड़क है, जिसे बनाने में इन चीजों के अलावा इंसानी हड्डियों का भी इस्तेमाल किया गया है? यह जानकर यकीनन आपको हैरानी तो हो रही होगी, लेकिन ये बिल्कुल सच है और इसी वजह से इस सड़क को 'रोड ऑफ बोन्स' यानी 'हड्डियों की सड़क' के नाम से जाना जाता है।
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कोलयमा हाइवे
- फोटो : Facebook/Vincent Quezada
असल में यह सड़क एक हाइवे है, जो रूस के सुदूरवर्ती पूर्वी इलाके में स्थित है। इसका असली नाम कोलयमा हाइवे है, जो 2,025 किलोमीटर लंबा है। इस हाइवे पर अक्सर इंसानी हड्डियां और कंकाल मिलते रहते हैं। पिछले साल नवंबर में भी इरकुटस्क इलाके में इंसानी हड्डियां मिली थीं। वहां के स्थानीय सांसद निकोलय त्रूफनोव ने बताया था कि सड़क पर हर जगह पर बालू के साथ इंसान की हड्डियां बिखरी पड़ी हुई थीं, वह नजारा बहुत ही भयावह था।
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कोलयमा हाइवे
- फोटो : Facebook/Raja Dhar
दरअसल, 'रोड ऑफ बोन्स' के नाम से मशहूर इस हाइवे की कहानी दिल दहला देने वाली है। चूंकि ठंड के मौसम में इस इलाके में काफी बर्फ गिरती है, जिससे सड़कें भी ढक जाती हैं। बताया जाता है कि बर्फ की वजह से गाड़ियां सड़क पर न फिसलें, इसलिए सड़क निर्माण में बालू के साथ इंसानी हड्डियों को भी मिलाया गया था।
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कोलयमा हाइवे के बनने की कहानी
- फोटो : Facebook/Vladimir Rodimov
इस हाइवे का निर्माण सोवियत संघ के तानाशाह कहे जाने वाले जोसेफ स्टालिन के समय में किया गया था। कहा जाता है कि इसे बनाने में ढाई से 10 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसके पीछे की कहानी कुछ इस तरह है कि 1930 के दशक में इस हाइवे का निर्माण शुरू हुआ और इस काम में बंधुआ मजदूरों और कैदियों को लगाया गया। उन्हें कोलयमा कैंप में कैदी बनाकर रखा गया था।
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कोलयमा हाइवे
- फोटो : Facebook/Xavier Jubier
कहा जाता है कि कोलयमा कैंप में अगर कोई कैदी एक बार चला जाता था, तो उसका वहां से वापस लौटना नामुमकिन सा हो जाता था। जो लोग यहां से भागने की कोशिश करते थे, वो ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह पाते थे, क्योंकि या तो वो भालुओं का शिकार हो जाते थे या भयंकर ठंड से मर जाते थे या फिर भूख से। कहते हैं कि जो कैदी मर जाते थे, उन्हें वहीं सड़क के अंदर ही दफ्न कर दिया जाता था।
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