Polar Bear Visits To Human Infrastructure: बर्फ से ढकी विशाल दुनिया के वासी और एक खतरनाक शिकारी 'पोलर बियर' जिसे ध्रुवीय भालू भी कहा जाता है इसी शांत माहौल में रहता है। लेकिन अब ये ध्रुवीय भालू धीरे-धीरे इंसानी इलाकों के पास दिखने लगा है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या ये सिर्फ भूख की वजह से है, या इसके पीछे कोई और बड़ी कहानी छिपी है? ध्रुवीय भालू स्वभाव से बेहद जिज्ञासु होते हैं। यही जिज्ञासा कई बार उन्हें इंसानों के करीब ले आती है, जिससे दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है।
आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गर्मी के कारण समुद्री बर्फ तेजी से पिघल रही है। यही बर्फ ध्रुवीय भालुओं के लिए शिकार का मुख्य आधार होती है, क्योंकि वे इसी पर रहकर सील का शिकार करते हैं। लेकिन बर्फ कम होने से अब कई भालू ज्यादा समय जमीन पर बिताने लगे हैं।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या भोजन की कमी उन्हें इंसानों के करीब आने के लिए मजबूर कर रही है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए वैज्ञानिकों ने 2011 से 2021 के बीच कनाडा के एक इलाके में अध्ययन किया। शोध के दौरान अलग-अलग कैंपों में कैमरे लगाए गए, ताकि यह देखा जा सके कि भालू कितनी बार वहां आते हैं। ये कैंप समुद्र से दूर बनाए गए थे, ताकि भालुओं से सामना कम हो। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि वहां भी भालू बड़ी संख्या में पहुंचे।
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पोलर बियर इंसानों के करीब क्यों आ रहे हैं?
- फोटो : adobestock
इंसानों की मौजूदगी नहीं है वजह
अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई कि क्या इंसानी गतिविधियां या साल में बर्फ न होने की अवधि (आइस-फ्री सीजन) भालुओं के व्यवहार को प्रभावित करती है। करीब 580 बार भालू कैमरों में नजर आए, खासकर जुलाई से नवंबर के बीच। परिणाम चौंकाने वाले थे, इंसानों की मौजूदगी का भालुओं के आने पर कोई खास असर नहीं पड़ा। लेकिन एक चीज का असर साफ दिखा, जितना ज्यादा समय समुद्र में बर्फ नहीं रही, उतनी ही बार भालू इन जगहों पर पहुंचे।
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इस वजह से इंसानी इलाकों की ओर आते हैं भालू
पहले माना जाता था कि भूखे और कमजोर भालू ही ज्यादा जोखिम उठाते हैं और इंसानों के पास आते हैं। लेकिन इस अध्ययन में पाया गया कि भालू चाहे स्वस्थ हों या कमजोर, जब वे लंबे समय तक बर्फ से दूर रहते हैं, तो सभी इंसानी इलाकों की ओर आकर्षित होते हैं। हालांकि, भालू की सेहत का असर पूरी तरह खत्म नहीं होता। शोध से पता चला कि अगर कोई भालू पहले से इंसानों के संपर्क में आ गया है, तो दुबला और भूखा भालू ज्यादा आक्रामक हो सकता है। यानी टकराव की गंभीरता भालू की स्थिति पर निर्भर कर सकती है।
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एक और दिलचस्प बात यह रही कि कम उम्र के भालू, जो आमतौर पर ज्यादा जोखिम लेते हैं, इस अध्ययन में कम दिखाई दिए। इसका कारण यह हो सकता है कि बदलते पर्यावरण के कारण उनकी संख्या घट रही है। यह शोध एक और महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा करता है। लंबे समय से वैज्ञानिक मानते रहे हैं कि कमजोर भालू ही इंसानी बस्तियों में आते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुभव इससे अलग हैं। उनके अनुसार, हर बार ऐसा नहीं होता। इस अध्ययन के नतीजे स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान के ज्यादा करीब हैं। यह दिखाता है कि कई बार बिना पूरी जांच के बनी धारणाएं समय के साथ “सच” मानी जाने लगती हैं।
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यह स्पष्ट है कि ध्रुवीय भालुओं का इंसानी इलाकों की ओर आना एक जटिल समस्या है। सिर्फ भूख या कमजोरी ही इसका कारण नहीं है, बल्कि बदलता पर्यावरण भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है। इसलिए इस विषय को गहराई से समझना जरूरी है, ताकि इंसान और भालू दोनों सुरक्षित रह सकें।
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