भारतीय सशस्त्र सेनाओं में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत कोई व्यक्ति वायुसेना में सेवा देने के बाद नौसेना में चला जाए और वहां से थल सेना। पूरे भारत में इसका सिर्फ एक ही उदाहरण मौजूद है और वह हैं चंडीगढ़ के रहने वाले (रिटा.) कर्नल पृथीपाल सिंह गिल। सेक्टर-35 में रहने वाले कर्नल गिल देश के इकलौते ऐसे सैन्य अधिकारी हैं, जिन्होंने तीनों सेनाओं और पैरामिलिट्री फोर्स में अपना शौर्य दिखाया है।
तीनों सेनाओं में शौर्य दिखाने वाले इकलौते कर्नल की कहानी, जानें- पिता ने क्यों ज्वॉइन करवाई थी नेवी
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शुक्रवार को उन्होंने अपने जीवन के 100 साल पूरे कर लिए हैं। इस मौके पर उनकी पत्नी परमिंदर कौर (93) और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनका 100वां जन्मदिन मनाया। शुक्रवार को इंटरनेट की दुनिया में भी वे छा गए। पश्चिमी कमान के पूर्व कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल केजे सिंह ने जब उनकी एक शानदार फोटो ट्वीट की तो बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया।
कराची में फ्लाइट कैडेट थे, डर से पिता ने नेवी ज्वॉइन कराया
(रिटा.) कर्नल पृथीपाल सिंह गिल ने अपने सैन्य कैरियर की शुरुआत साल 1942 में रॉयल इंडियन एयरफोर्स में बतौर पायलट ऑफिसर के तौर पर शुरू किया। वे कराची में तैनात थे। कुछ समय बीतने के बाद उनके पिता को डर लगा कि कहीं पृथीपाल एयरक्रैश का शिकार न हो जाएं। उस समय उनके पिता की पहचान सेना के एक जनरल से थी। उनसे बात कर पृथीपाल को नौसेना में ज्वाइन करवा दिया। यहां भी उनका कैरियर शानदार रहा।
माइन स्वीपिंग शिप व आईएनएस में अपनी सेवाएं दीं। इसके साथ ही वे नेवल गन के एक्सपर्ट बन गए। इसी दौरान उनका चयन महाराष्ट्र के देवलाली स्थित लॉंग गननेरी स्टाफ कोर्स में हो गया। यह बहुत ही मुश्किल कोर्स होती है लेकिन इस कोर्स में भी वे अव्वल रहे। यहीं से उनके लिए भारतीय सेना के दरवाजे खुल गए और भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट में नियुक्ति पा ली। कर्नल पृथीपाल सिंह ने ऐसे ही 100 साल के बसंत नहीं देखे हैं। वे अपने सैन्य जीवन के दौरान बहुत ही बहादुर अफसर रहे हैं।
साल 1965 में भारत-पाक के बीच हुई जंग के दौरान वे 71 मीडियम रेजिमेंट का नेतृत्व कर रहे थे। जंग के दौरान पाकिस्तानी सेना ने उनके कुछ साथियों और उनके गन की बैटरी चुरा ली। जब उन्हें पता चला तो वे अपने साथियों के साथ पाकिस्तानी इलाके में गए और वहां से गन की बैटरी छुड़ा लाए थे। उनके कदम यहीं नहीं रुके। सेना के तीनों अंगों में काम करने के बाद उन्होंने पैरामिलिट्री फोर्स असम राइफल्स की उखरुल सेक्टर में कमांडर के तौर नियुक्त रहे। उनकी जिंदादिली का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब वे 98 साल के थे तो वे एक मामले में चंडीगढ़ प्रशासन को हाईकोर्ट ले गए।