हरियाणा के करनाल में स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) में साहिवाल गाय के पंचामृत पर किए गए अनुसंधान के आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए हैं। डेयरी केमिस्ट्री विभाग की प्रयोगशाला में कोशिकाओं के कल्चर पर किए गए प्रयोग में पाया गया कि इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उल्लेखनीय है कि विज्ञान जगत में पहले चरण में कोशिकाओं के कल्चर पर, द्वितीय चरण में चूहों व तृतीय चरण में यह जांच बड़े जानवरों पर की जाती है। एनडीआरआई में साढ़े तीन साल पहले पंचामृत पर शोध कार्य शुरू किया गया था। इसके तहत देसी गाय की साहिवाल नस्ल के दूध, घी, दही, शहद और चीनी को मिलाकर पंचामृत तैयार किया गया। उसके बाद पंचामृत की प्रयोगशाला में टेस्टिंग की गई।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है देसी गाय का पंचामृत, शोध में हुआ बड़ा खुलासा, हिंदू धर्म में भी खास महत्व
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प्रथम चरण की जांच में पाया गया है कि इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। संस्थान के निदेशक डॉ. मनमोहन सिंह चौहान का कहना है कि भारतीय देसी व साहिवाल गायों के पालन को बढ़ावा देने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। डॉ. चौहान ने कहा कि भारत सरकार देसी गायों पर शोध के लिए कई कार्यक्रम प्रोत्साहित कर रही है। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक पंचगव्य व पंचामृत पर काम कर रहे हैं। पंचगव्य पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों में इस्तेमाल किया जाने वाला मिश्रण है जो पांच सामग्रियों को मिलाकर तैयार किया जाता है।
तीन प्रत्यक्ष घटक गोबर, मूत्र व दूध हैं। दो व्युत्पन्न उत्पाद दही और घी हैं। प्राचीन ग्रंथ भेल संहिता, कश्यप संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, मद निग्रह व रस तंत्र सार मानव जीवन में पंचगव्य की दिव्यता और महत्व के बारे में अत्यधिक बात करते हैं। ऐसा माना जाता है कि पंचगव्य के सेवन से शरीर के साथ मानसिक विकार भी दूर होते हैं। उन्होंने कहा कि साहिवाल गाय भारत में सबसे अच्छी डेयरी नस्लों में से एक है। भारत व पाकिस्तान सीमा क्षेत्र इसका उद्गम स्थल है।
पंजाब के फिरोजपुर, अमृतसर जिले और राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में साहिवाल गायों के मूल स्थान हैं। सभी देसी नस्लों की तुलना में साहिवाल गाय अधिकतम दूध उत्पादक होती है और एक अच्छी तरह से विकसित स्तन ग्रंथी को प्रदर्शित करती है। उनकी गर्मी सहिष्णुता और उच्च दूध उत्पादन के कारण इन्हें अन्य एशियाई देशों के साथ-साथ अफ्रीका व कैरेबियन में निर्यात किया गया है। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में करीब 396 साहिवाल गायों का बड़ा झुंड रखा गया है। इन गायों में अधिकतम दूध का उत्पादन प्रतिदिन करीब 25 लीटर तक दर्ज की गई है।
दूल्हे को पंचामृत पिलाने की परंपरा प्राचीन
हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति के जिलाध्यक्ष जयप्रकाश शास्त्री ने बताया कि हिंदू धर्म में शादी के समय दूल्हे को पंचामृत पिलाने की परंपरा प्राचीन है और आज भी कायम है। इसकी वैज्ञानिक अवधारणा यह है कि यह मिश्रण एंटी बैक्टीरियल होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। दूल्हे को इसलिए पंचामृत पिलाने की परंपरा रही है ताकि वह हृष्टपुष्ट रहे।