केपीएस गिल, ये नाम देश कभी भूला नहीं पाएगा। कंवर पाल सिंह गिल का 82 साल की उम्र में निधन हो गया। गिल पंजाब के दो बार डीजीपी रह चुके हैं। इन्होंने सबसे बड़ा कामयाब ऑपरेशन अंजाम दिया था।
80 के दशक में पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। खालिस्तान की मांग जोरों पर थी और उसकी आड़ में दहशत का खुला खेल खेला जाता था। धार्मिक स्थलों में शरण लेने का चलन भी ज़ोरों पर था। 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार कौन भुल पाया है। जिसकी वजह से देश ने एक प्रधानमंत्री को खो दिया।
इसके बाद 1988 में अमृतसर के स्वर्णमंदिर में ही एनएसजी ने दो और ऑपरेशन किए थे। ऑपरेशन ब्लैक थंडर और ऑपरेशन ब्लैक थंडर – 2। 9 मई 1988 को शुरू हुआ ये ऑपरेशन 18 मई 1988 तक चला. इसमें 41 आतंकवादी मारे गए। ख़ास बात ये कि सुरक्षाबलों में से एक की भी जान नहीं गई. ना ही किसी सिविलियन की मौत हुई, और तो और, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जिस तरह विरोध के स्वर पूरे पंजाब भर में मुखर हुए थे, वैसा कुछ इस बार नहीं हुआ। ये ऑपरेशन इस मामले में भी अनोखा था कि प्रेस को इसे कवर करने के लिए पूरी छूट दी गई. इसलिए अफवाहों का बाज़ार भी गर्म न हो सका।
खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के स्वयंभू लेफ्टिनेंट जनरल मलकियत सिंह ने धमकी जारी की थी कि स्वर्णमंदिर में घुसने के पहले हजारों सैनिकों को भूनकर रख दिया जाएगा। उसके शब्द थे, “रिबेरो से कह दो अपने लोगों की लाशें उठवाने के लिए ट्रक मंगा ले, हज़ारों लाशें उठानी होंगी.” लेकिन ऑपरेशन ख़त्म होने के बाद का नज़ारा कुछ और ही था।
इस ऑपरेशन की कामयाबी का सेहरा पंजाब के तत्कालीन डीजीपी के पी एस गिल के सर बांधा जाता है। उन्होंने इसके लिए करीब दो महीने तक तैयारियां की थीं। जवानों को मुकम्मल तैयारी के बावजूद सब्र रखने को कहा गया था। मानेसर में एनएसजी के मुख्यालय में कमांडोज को विशेष प्रशिक्षण दिया गया. हेलिकॉप्टर से कूदकर मकानों से कब्ज़ा हटाने का अभ्यास कराया गया। एक बार ऑपरेशन को हरी झंडी मिलते ही एनएसजी हरकत में आ गई. विमानों से लगभग 1000 कमांडोज को अमृतसर पहुंचाया गया।