{"_id":"5e47aeaa8ebc3ee60618b007","slug":"success-story-tashan-of-four-mothers-who-are-fulfilling-their-dreams-like-kangana-ranaut-panga","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"चार महिलाएं, जिन्होंने मां बनने के बाद कंगना रनौत की तरह लिया ‘पंगा’ और की शानदार वापसी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चार महिलाएं, जिन्होंने मां बनने के बाद कंगना रनौत की तरह लिया ‘पंगा’ और की शानदार वापसी
Sat, 15 Feb 2020 02:23 PM IST
खुशबू गोयल
संजीव पंगोत्रा, चंडीगढ़
संजीव पंगोत्रा, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 15 Feb 2020 02:23 PM IST
विज्ञापन
पंगा में कंगना रनौत
- फोटो : सोशल मीडिया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हम आपको मिला रहे हैं उन महिलाओं से, जिन्होंने मां बनने के बाद कंगना रनौत की तरह 'पंगा' लिया और मैदान में शानदार वापसी करके एक मुकाम हासिल किया।
पंगा में कंगना रनौत और ऋचा चड्ढा
- फोटो : सोशल मीडिया
‘मैं एक मां हूं और मां के कोई सपने नहीं होते’। कंगना रनौत की मूवी पंगा के इस डायलॉग से हर वो औरत खुद को जुड़ा महसूस करती है, जिसने परिवार व बच्चों के खातिर अपने सपने भुला दिए हों। बहुत कम महिलाएं होती हैं, जो शादी-बच्चे के बाद अपने सपने को दोबारा जी पाती हैं। खासकर खेल के मैदान में तो बहुत मुश्किलें आती हैं। तगड़ी प्रतियोगिता होती है। अपने अस्तित्व की जंग लड़ने के साथ खुद को श्रेष्ठ साबित कर पाने की जद्दोजहद से गुजरना आसान नहीं होता। लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी होती हैं, जिनकी जिद के आगे सारी मुश्किलें घुटने टेक देती हैं। ऐसी ही जिद्दी महिलाओं से रूबरू कराती एक रिपोर्ट, पढ़ें...
हैंडबॉल खिलाड़ी स्नेहलता
- फोटो : अमर उजाला
ऐसी वापसी हुई कि जिताया गोल्ड
हैंडबाल की खिलाड़ी स्नेहलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर का सफर तय किया है। जब वे अपने खेल में पूरे शबाब पर थीं, तभी उनकी शादी हो गई। पति सचिन चौधरी भी हैंडबॉल के इंटरनेशनल खिलाड़ी हैं। शादी के चार साल बाद उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। बेटी के जन्म के 40वें दिन ही स्नेहलता को अंडर17 व अंडर19 के कोच बनने का बुलावा आ गया। लेकिन बच्ची को जन्म देने के 40वें दिन मैदान में उतरना किसी मुश्किल से कम नहीं था, पर स्नेहलता ने हिम्मत नहीं हारी। शरीर जवाब दे रहा था, लेकिन खेलने की जिद ने उन्हें मैदान में टिके रहने पर मजबूर किया। वे कोच बनीं और उनके नेतृत्व में दोनों टीमों ने गोल्ड मेडल जीता। वे कहती हैं कि खेलने की जिद ने मेरे सारे दर्द भुला दिए। स्नेह लता ने पहाड़ काटकर अपनी अकादमी खोली है। इसमें वे युवा लड़कियों को नेशनल और इंटरनेशनल लेवल की खिलाड़ी बनाने में जुटी हुई हैं।
हैंडबाल की खिलाड़ी स्नेहलता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर का सफर तय किया है। जब वे अपने खेल में पूरे शबाब पर थीं, तभी उनकी शादी हो गई। पति सचिन चौधरी भी हैंडबॉल के इंटरनेशनल खिलाड़ी हैं। शादी के चार साल बाद उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। बेटी के जन्म के 40वें दिन ही स्नेहलता को अंडर17 व अंडर19 के कोच बनने का बुलावा आ गया। लेकिन बच्ची को जन्म देने के 40वें दिन मैदान में उतरना किसी मुश्किल से कम नहीं था, पर स्नेहलता ने हिम्मत नहीं हारी। शरीर जवाब दे रहा था, लेकिन खेलने की जिद ने उन्हें मैदान में टिके रहने पर मजबूर किया। वे कोच बनीं और उनके नेतृत्व में दोनों टीमों ने गोल्ड मेडल जीता। वे कहती हैं कि खेलने की जिद ने मेरे सारे दर्द भुला दिए। स्नेह लता ने पहाड़ काटकर अपनी अकादमी खोली है। इसमें वे युवा लड़कियों को नेशनल और इंटरनेशनल लेवल की खिलाड़ी बनाने में जुटी हुई हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
पैरा एथलीट पूनम
- फोटो : अमर उजाला
संघर्ष की ऐसी दास्तां, शब्द पड़ जाएंगे छोटे
मनीमाजरा की रहने वाली पूनम के संघर्ष की कहानी बयां करने में शब्द छोटे पड़ सकते हैं। बचपन में एक पांव खराब हो गया। चाहतीं तो इस मजबूरी का सहारा लेकर वे आसानी से कोई नौकरी कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी कमजोरी को मजबूती में बदला। साल 2009 में शादी हुई। पति भी दिव्यांग हैं। शादी के बाद उनके लिए खेल में वापसी करना बहुत मुश्किल था। बच्चे को संभाले या खेल पर ध्यान दें। दोनों ने तय किया एक बच्चे के साथ रहेगा तो दूसरा मैदान में प्रैक्टिस करेगा। जब बच्चा ज्यादा तंग करेगा तो बच्चा भी मैदान में रहेगा। यह कोशिश रंग लाई और उन्होंने मैदान में ऐसी वापसी की कि टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए पैरा टेबल टेनिस में क्वालीफाई कर लिया। उनका बेटा भी टेबल टेनिस की प्रैक्टिस कर रहा है।
मनीमाजरा की रहने वाली पूनम के संघर्ष की कहानी बयां करने में शब्द छोटे पड़ सकते हैं। बचपन में एक पांव खराब हो गया। चाहतीं तो इस मजबूरी का सहारा लेकर वे आसानी से कोई नौकरी कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी कमजोरी को मजबूती में बदला। साल 2009 में शादी हुई। पति भी दिव्यांग हैं। शादी के बाद उनके लिए खेल में वापसी करना बहुत मुश्किल था। बच्चे को संभाले या खेल पर ध्यान दें। दोनों ने तय किया एक बच्चे के साथ रहेगा तो दूसरा मैदान में प्रैक्टिस करेगा। जब बच्चा ज्यादा तंग करेगा तो बच्चा भी मैदान में रहेगा। यह कोशिश रंग लाई और उन्होंने मैदान में ऐसी वापसी की कि टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए पैरा टेबल टेनिस में क्वालीफाई कर लिया। उनका बेटा भी टेबल टेनिस की प्रैक्टिस कर रहा है।
विज्ञापन
वॉलीबॉल खिलाड़ी वंदना
- फोटो : अमर उजाला
मैदान के साथ जिंदगी में वापसी करना असंभव था
चंडीगढ़ की रहने वाली वंदना को मैदान में वापसी करने के लिए दो बार संघर्ष करना पड़ा है। वालीबॉल खिलाड़ी वंदना की साल 2013 में शादी हुई और एक साल बाद उन्होंने बेटी को जन्म दिया। बेटी की परवरिश के साथ उन्हें खेल में वापसी करनी थी। इसके लिए उन्होंने पूरी ताकत लगाई और वापसी करके कोच की नौकरी पाई। इस दौरान एक समय ऐसा आया कि उनकी असल जिंदगी में ही वापसी असंभव लग रही थी। एक दिन जब वे कोचिंग देने जा रही थीं, तभी उनका एक्सीडेंट हो गया और वे कोमा में चली गई। हालांकि कुछ दिनों बाद वे इस सदमे से बाहर आ गईं, लेकिन मैदान में वापस आना उनके लिए आसान नहीं था। क्योंकि दिमाग में चोट लगने के साथ उनका शरीर भी जवाब दे रहा था। कई बार तो प्रैक्टिस करते वक्त वे मैदान में गिर जाती थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और डटी रहीं। इस समय वे मोहाली स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में वालीबॉल कोच की भूमिका निभा रही हैं।
चंडीगढ़ की रहने वाली वंदना को मैदान में वापसी करने के लिए दो बार संघर्ष करना पड़ा है। वालीबॉल खिलाड़ी वंदना की साल 2013 में शादी हुई और एक साल बाद उन्होंने बेटी को जन्म दिया। बेटी की परवरिश के साथ उन्हें खेल में वापसी करनी थी। इसके लिए उन्होंने पूरी ताकत लगाई और वापसी करके कोच की नौकरी पाई। इस दौरान एक समय ऐसा आया कि उनकी असल जिंदगी में ही वापसी असंभव लग रही थी। एक दिन जब वे कोचिंग देने जा रही थीं, तभी उनका एक्सीडेंट हो गया और वे कोमा में चली गई। हालांकि कुछ दिनों बाद वे इस सदमे से बाहर आ गईं, लेकिन मैदान में वापस आना उनके लिए आसान नहीं था। क्योंकि दिमाग में चोट लगने के साथ उनका शरीर भी जवाब दे रहा था। कई बार तो प्रैक्टिस करते वक्त वे मैदान में गिर जाती थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और डटी रहीं। इस समय वे मोहाली स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में वालीबॉल कोच की भूमिका निभा रही हैं।