पंजाब के पठानकोट जिले के बधानी में स्थित स्कूल के अध्यापकों या प्रधानाचार्य को कोई अवार्ड भले ही नहीं मिला लेकिन यह स्कूल साढ़े तीन साल में स्मार्ट बन गया है। इसका श्रेय प्रधानाचार्या रघुवीर कौर को जाता है। कभी खंडहर नजर आने वाला बधानी स्कूल आज विद्यार्थियों के लिए हर सुख सुविधा, बढ़िया इमारत, खेल मैदान, शिक्षा में जिले भर के निजी स्कूलों को मात दे रहा है।
Teachers' Day: प्रधानाचार्या ने सरकारी स्कूल को बना दिया स्मार्ट, इसके आगे निजी स्कूल भी नहीं टिकते
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प्रधानाचार्या ने स्टाफ और समाज के सहयोग से स्कूल की इमारत को नया रूप ही नहीं दिया, बल्कि विद्यार्थियों ने शिक्षा और खेल क्षेत्र में कई आयाम भी स्थापित किए। हालात ऐसे थे कि साढ़े तीन में से दो साल ऐसे थे, जब सरकार ने स्कूल के सुधार के लिए फंड नहीं दिया। इस दौरान स्टाफ और समाजसेवियों ने स्कूल को जीवनदान दिया। अब हालात यह हैं कि बधानी स्कूल ‘मेरा पिंड मेरी शान’ योजना के तहत बेस्ट स्कूल का अवार्ड जीता और एक लाख रुपये की ग्रांट हासिल की। इसके बाद स्कूल को देखने शिक्षा सचिव रहे कृष्ण कुमार भी तीन बार यहां आ चुके हैं।
ऐसे नंबर-1 बना बधानी सरकारी स्कूल
2001 में मिडिल से सीनियर सेकेंडरी अपग्रेड हुआ बधानी का उक्त स्कूल खंडहर नजर आता था। 2015 में प्रधानाचार्या रघुवीर कौर ने पदभार संभाला। दो साल तक बिना सरकारी सहायता उन्होंने समाज और स्टाफ के सहयोग से स्कूल को नया जीवन दिया। 2015 से अब तक स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या दोगुना हो गई है। स्कूल के एक विद्यार्थी ने साइंस स्ट्रीम में निजी स्कूलों को भी पछाड़ कर जिले में पहला स्थान हासिल किया। एनसीसी का एक कैडेट दिल्ली के गणतंत्र दिवस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पायलट कर चुका है। वहीं, खेल की बात करें तो बधानी स्कूल की छात्रा ने देशभर में दूसरा स्थान हासिल किया है।
परिवार से ज्यादा स्कूल को दिया समय
प्रधानाचार्या रघुवीर कौर का कहना है कि जब स्कूल की हालत खस्ता थी तो उसे सुधारने में पूरा स्टाफ व्यस्त था। लगातार दो साल तक गर्मियों की छुट्टियों में रोजाना स्कूल आकर काम किया। स्थानीय लोगों और एसएमसी से मिलकर फंड जुटाए और इमारत में सुधार किया। इस दौरान उनके साथ-साथ स्टाफ के अधिकतर लोगों ने परिवार से ज्यादा स्कूल को अहमियत दी। 2015 में जब उन्होंने ज्वाइन किया तो स्कूल के अधिकतर कमरों की छतें टपकती थीं। कई बार बच्चों को एक ही कमरे में बैठाकर पढ़ाना पड़ा। आज सभी कमरों में सीलिंग हुई है। टपकना तो दूर किसी दीवार पर सीलन तक नहीं है।
पांच कमरों की ग्रांट में सात का निर्माण कराया
प्रधानाचार्या रघुवीर कौर ने बताया कि दो साल पहले उन्हें पांच कमरों की ग्रांट विभाग ने दी थी। हर कमरे के लिए 7 लाख 51 हजार रुपये ग्रांट आई। उन्होंने स्टाफ के साथ मिलकर योजना बनाई और 37 लाख 55 हजार रुपये में 5 की जगह 7 कमरे बनवा दिए। इस निर्माण में बचत और सरकारी मापदंडों का पूरा ख्याल रखा गया। हर कमरे को सरकार के तय मानकों में बनवाया और हर दो कमरों के पैसे बचाकर नए कमरे बनवा दिए।