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Who is Auqib Nabi?: कर्फ्यू में कुर्सी को बल्लेबाज मानकर करते थे अभ्यास; आकिब का बारामूला से टीम इंडिया तक सफर
Mon, 03 Aug 2026 02:50 PM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Mon, 03 Aug 2026 02:50 PM IST
सार
श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से शुरू होने वाली दो टेस्ट मैचों की सीरीज के लिए जसप्रीत बुमराह की जगह पहली बार भारतीय टीम में चुने गए आकिब नबी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। बारामूला की टूटी पिचों, कर्फ्यू में घर के आंगन और सीमित संसाधनों से शुरू हुआ सफर अब टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम तक पहुंच चुका है।
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आकिब नबी
- फोटो : BCCI
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श्रीलंका के खिलाफ 15 अगस्त से शुरू होने वाली दो टेस्ट मैचों की सीरीज के लिए जब भारतीय टीम का पहली बार एलान हुआ था, तो सबसे ज्यादा चर्चा एक नए नाम की थी- 29 साल के आकिब नबी को जगह क्यों नहीं मिली। जम्मू-कश्मीर के इस तेज गेंदबाज को दो शानदार घरेलू सत्र के बाद भी टीम में शामिल नहीं किया गया। काफी बातें हुईं और पूर्व क्रिकेटरों ने चयनकर्ताओं पर निशाना साधा। हालांकि, उनके लिए टीम का रास्ता तब खुला, जब चोटिल जसप्रीत बुमराह सीरीज से बाहर हो गए।
आकिब नबी
- फोटो : PTI
जहां सपने थे, लेकिन सुविधाएं नहीं थीं
बारामूला में पले-बढ़े आकिब नबी के लिए क्रिकेट खेलना आसान नहीं था। वहां न तो अच्छी पिचें थीं और न ही अभ्यास करने के लिए पर्याप्त सुविधाएं। कई बार कर्फ्यू के कारण मैदान तक पहुंचना भी संभव नहीं होता था। ऐसे माहौल में उन्होंने शिकायत करने के बजाय उपलब्ध संसाधनों से ही अपने सपनों को आकार दिया।
आकिब याद करते हैं, 'मुश्किल यह नहीं था कि क्रिकेट खेलना चाहता था, मुश्किल यह थी कि सुविधाएं नहीं थीं। कश्मीर और जम्मू में अभ्यास के लिए अच्छी विकेटें नहीं थीं। मेरे पास सही उपकरण भी नहीं थे। जो कुछ उपलब्ध था, उसी से अभ्यास किया और खुद को तैयार किया।'
बारामूला में पले-बढ़े आकिब नबी के लिए क्रिकेट खेलना आसान नहीं था। वहां न तो अच्छी पिचें थीं और न ही अभ्यास करने के लिए पर्याप्त सुविधाएं। कई बार कर्फ्यू के कारण मैदान तक पहुंचना भी संभव नहीं होता था। ऐसे माहौल में उन्होंने शिकायत करने के बजाय उपलब्ध संसाधनों से ही अपने सपनों को आकार दिया।
आकिब याद करते हैं, 'मुश्किल यह नहीं था कि क्रिकेट खेलना चाहता था, मुश्किल यह थी कि सुविधाएं नहीं थीं। कश्मीर और जम्मू में अभ्यास के लिए अच्छी विकेटें नहीं थीं। मेरे पास सही उपकरण भी नहीं थे। जो कुछ उपलब्ध था, उसी से अभ्यास किया और खुद को तैयार किया।'
आकिब नबी डार
- फोटो : file photo
जब आंगन में लगी नेट और कुर्सी बनी बल्लेबाज
उनकी जिंदगी की सबसे भावुक याद उन दिनों की है, जब बारामूला में कर्फ्यू लगा हुआ था। मैदान बंद थे, लेकिन उनका सपना नहीं रुका। उनके पिता ने घर के आंगन में अस्थायी नेट लगाई और एक कुर्सी को बल्लेबाज मानकर आकिब घंटों गेंदबाजी करते रहे। ढलती शाम तक वह अपनी लेंथ और लाइन सुधारते रहते। आकिब बताते हैं, 'उन दिनों विकेटें बहुत कम थीं। जो था, उसी में काम चलाना पड़ता था।' बेहतर सुविधाओं की तलाश में उन्हें रोज करीब 60 किलोमीटर दूर श्रीनगर तक जाकर अभ्यास करना पड़ता था।
उनकी जिंदगी की सबसे भावुक याद उन दिनों की है, जब बारामूला में कर्फ्यू लगा हुआ था। मैदान बंद थे, लेकिन उनका सपना नहीं रुका। उनके पिता ने घर के आंगन में अस्थायी नेट लगाई और एक कुर्सी को बल्लेबाज मानकर आकिब घंटों गेंदबाजी करते रहे। ढलती शाम तक वह अपनी लेंथ और लाइन सुधारते रहते। आकिब बताते हैं, 'उन दिनों विकेटें बहुत कम थीं। जो था, उसी में काम चलाना पड़ता था।' बेहतर सुविधाओं की तलाश में उन्हें रोज करीब 60 किलोमीटर दूर श्रीनगर तक जाकर अभ्यास करना पड़ता था।
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आकिब नबी
- फोटो : ANI/PTI
पिता डॉक्टर बनाना चाहते थे, बेटे ने चुना क्रिकेट
आकिब के पिता चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर बने, क्योंकि उसमें सुरक्षित भविष्य दिखाई देता था, लेकिन आकिब के लिए क्रिकेट ही सब कुछ था। सुबह और शाम सिर्फ गेंद और बल्ले के बीच गुजरती थी। आखिरकार उनके जुनून ने परिवार को भी विश्वास दिला दिया।
अंडर-19 से शुरू हुआ सफर, लगातार मेहनत से मिली पहचान
आकिब नबी की मेहनत का असर पहली बार 2015 में दिखा, जब उन्होंने जम्मू-कश्मीर की अंडर-19 टीम से डेब्यू किया। इसके बाद वह अंडर-23 टीम तक पहुंचे। इस दौरान सी.के. नायडू ट्रॉफी में केरल के खिलाफ पांच विकेट लेकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का दमदार परिचय दिया।
इसके बाद 2018 में उन्होंने लिस्ट-ए क्रिकेट में और दो साल बाद प्रथम श्रेणी (फर्स्ट क्लास) क्रिकेट में डेब्यू किया। शुरुआती प्रदर्शन शानदार रहा। पहले दो लिस्ट-ए सीजन में उन्होंने 18 मैचों में 22.55 की औसत से 34 विकेट लिए, जबकि अपने पहले फर्स्ट क्लास सीजन में 18.50 की औसत से 24 विकेट झटके।
आकिब के पिता चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर बने, क्योंकि उसमें सुरक्षित भविष्य दिखाई देता था, लेकिन आकिब के लिए क्रिकेट ही सब कुछ था। सुबह और शाम सिर्फ गेंद और बल्ले के बीच गुजरती थी। आखिरकार उनके जुनून ने परिवार को भी विश्वास दिला दिया।
अंडर-19 से शुरू हुआ सफर, लगातार मेहनत से मिली पहचान
आकिब नबी की मेहनत का असर पहली बार 2015 में दिखा, जब उन्होंने जम्मू-कश्मीर की अंडर-19 टीम से डेब्यू किया। इसके बाद वह अंडर-23 टीम तक पहुंचे। इस दौरान सी.के. नायडू ट्रॉफी में केरल के खिलाफ पांच विकेट लेकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का दमदार परिचय दिया।
इसके बाद 2018 में उन्होंने लिस्ट-ए क्रिकेट में और दो साल बाद प्रथम श्रेणी (फर्स्ट क्लास) क्रिकेट में डेब्यू किया। शुरुआती प्रदर्शन शानदार रहा। पहले दो लिस्ट-ए सीजन में उन्होंने 18 मैचों में 22.55 की औसत से 34 विकेट लिए, जबकि अपने पहले फर्स्ट क्लास सीजन में 18.50 की औसत से 24 विकेट झटके।
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आकिब नबी
- फोटो : ANI/PTI
कोच नहीं था, गलतियां बताने वाला भी कोई नहीं
हालांकि इसके बाद का दौर उनके लिए आसान नहीं रहा। अगले तीन फर्स्ट क्लास सीजन में वह सिर्फ 22 विकेट ही ले सके और उनकी गेंदबाजी औसत बढ़कर 42.46 हो गई। आकिब नबी के प्रदर्शन में आई गिरावट की एक बड़ी वजह व्यवस्थित कोचिंग का अभाव था। उनकी हाई-आर्म एक्शन से स्विंग गेंदबाजी स्वाभाविक रूप से होती थी, लेकिन शुरुआती वर्षों में उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन लगभग नहीं मिला। इसके बाद उनका करियर कुछ समय के लिए ठहर सा गया। तीन घरेलू सीजन में वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। उस दौर को याद करते हुए वह कहते हैं, 'जम्मू-कश्मीर क्रिकेट संघ में गेंदबाजी कोच नहीं था। मुझे यह बताने वाला कोई नहीं था कि मैं कहां गलती कर रहा हूं।' यहीं से उनकी जिंदगी में गेंदबाजी कोच पी. कृष्णकुमार की एंट्री हुई।
हालांकि इसके बाद का दौर उनके लिए आसान नहीं रहा। अगले तीन फर्स्ट क्लास सीजन में वह सिर्फ 22 विकेट ही ले सके और उनकी गेंदबाजी औसत बढ़कर 42.46 हो गई। आकिब नबी के प्रदर्शन में आई गिरावट की एक बड़ी वजह व्यवस्थित कोचिंग का अभाव था। उनकी हाई-आर्म एक्शन से स्विंग गेंदबाजी स्वाभाविक रूप से होती थी, लेकिन शुरुआती वर्षों में उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन लगभग नहीं मिला। इसके बाद उनका करियर कुछ समय के लिए ठहर सा गया। तीन घरेलू सीजन में वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। उस दौर को याद करते हुए वह कहते हैं, 'जम्मू-कश्मीर क्रिकेट संघ में गेंदबाजी कोच नहीं था। मुझे यह बताने वाला कोई नहीं था कि मैं कहां गलती कर रहा हूं।' यहीं से उनकी जिंदगी में गेंदबाजी कोच पी. कृष्णकुमार की एंट्री हुई।