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Jhulan Retirement: लोकल ट्रेन से रोज ढाई घंटे का सफर कर क्रिकेटर बनीं झूलन, 1997 के विश्वकप फाइनल ने बदला जीवन
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: रोहित राज
Updated Sat, 24 Sep 2022 10:21 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल के चकदाह कस्बे की रहने वाली झूलन ने क्रिकेटर बनने के लिए काफी संघर्ष किया। कोलकाता के लिए पहली लोकल ट्रेन लेना और उत्तरी कोलकाता के श्रद्धानंद पार्क में अभ्यास के लिए आना आसान नहीं था।
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झूलन गोस्वामी
- फोटो : सोशल मीडिया
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भारत की दिग्गज महिला तेज गेंदबाज झूलन गोस्वामी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया है। उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ अपना आखिरी मैच खेला। यह मुकाबला लंदन के लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में खेला गया। झूलने आखिरी मैच में 10 ओवर में 30 रन देकर दो विकेट लिए। उनका पश्चिम बंगाल के एक छोटे से कस्बे से भारत की स्टार महिला क्रिकेटर बनने का सफर आसान नहीं रहा है।
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झूलन के आखिरी मैच से पहले गले लगकर रोने लगीं कप्तान हरमनप्रीत कौर।
- फोटो : BCCI
पश्चिम बंगाल के चकदाह कस्बे की रहने वाली झूलन ने क्रिकेटर बनने के लिए काफी संघर्ष किया। कोलकाता के लिए पहली लोकल ट्रेन लेना और उत्तरी कोलकाता के श्रद्धानंद पार्क में अभ्यास के लिए आना आसान नहीं था। भारतीय टीम में पदार्पण के बाद भी जब वह चकदाह स्टेशन से घर लौटती थीं तो वह खुले वैन रिक्शा में बैठी नजर आती थीं।
आखिरी मैच से पहले कप्तान हरमनप्रीत कौर के साथ झूलन
- फोटो : BCCI
अब महिलाओं का आईपीएल शुरू होने वाला है। महिला क्रिकेटरों को केंद्रीय अनुबंध मिला रहा है। वे अब मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और ऑडी में घूम रही हैं। वहीं, झूलन द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में यात्रा करने, छात्रावासों और युवा छात्रावासों में रहने के संघर्ष और अब सुख-सुविधाओं के बीच एक पुल रही हैं। सामान्य शौचालय से लेकर बिजनेस क्लास की यात्रा और उचित केंद्रीय अनुबंध और वित्तीय सुरक्षा के साथ पांच सितारों पर रहते हैं। इस बीच हुगली और टेम्स नदियों में काफी पानी बह गया है, जब झूलन क्रिकेट यात्रा पर निकली थीं।
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झूलन गोस्वामी
- फोटो : सोशल मीडिया
लोकल ट्रेन से रोजाना ढाई घंटे का सफर
झूलन ने अपने सफर को याद करते हुए शुक्रवार (23 सितंबर) को कहा था, ''सबसे अच्छी याद अपने पहले मैच में कप्तान से कैप मिलना और पहला ओवर फेंकने रही, क्योंकि मैंने कभी नहीं सोचा था कि कभी भारत के लिए खेलूंगी। सफर आसान नहीं था। ट्रेनिंग के लिए रोजाना ढाई घंटे लोकल ट्रेन से सफल करना पड़ता था।''
1997 में जिंदगी बदली
वह याद करती हैं कि 1997 का विश्वकप फाइनल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच ईडन गार्डन में खेला गया था जिसमें 90 हजार दर्शक शामिल थे। तब मैं बॉल गर्ल्स बनी थी। तब से सपना देखना शुरू किया था कि एक दिन देश के लिए खेलूंगी।
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