जिम कार्बेट ने चंपावत, पवलगढ़, ओखलकांडा आदि इलाकों में आदमखोर बाघों को मार जनता को उनके आतंक से निजात दिलाई थी। जिम कार्बेट का जिक्र वन्यजीवों खासकर बाघ के लोगों के बीच हिंसक होने पर जरूर आता है। कार्बेट ने जहां हिंसक वन्यजीवों को पैदल, मचानों से और हाथियों से हाका लगवाकर कम संसाधनों के बीच मार गिराकर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया था।
हमेशा लोगों को डराएगी नरभक्षी के आतंक की ये घटना
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वहीं, तराई पश्चिमी वन प्रभाग के आमपोखरा रेंज की आदमखोर बाघिन ने भी 45 दिनों तक विभाग की नाक में दम कर जनता में भय पैदा कर दिया था। पश्चिमी वृत्त के सीएफ डॉ. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि विभाग के इतिहास में इस आदमखोर बाघिन की घटना दर्ज की जाएगी कि इसे मारने के लिए 45 दिन लग गए।
क्षेत्र में आतंक का सबब बनी आदमखोर बाघिन ने गांव गोरखपुर में परमजीत की जान ले ली थी। बृहस्पतिवार को बाघिन का खात्मा होने पर परमजीत की पत्नी मंजीत कौर बाघिन के शव के पास पहुंची और काफी देर तक उसे देखती रही। जब उसे विभाग वाले उसे वहां से हटाने लगे तब उसने कहा ‘ये मेरे लिए बाघिन नही नागिन है इसने मेरे पति को डंस कर मुझे और मेरे बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए उनसे दूर कर दिया।’ उसके बाद वह फूट फूटकर रोने लगी।
45 दिनों से क्षेत्र में दहशत का पर्याय बनी आदमखोर बाघिन ने वन विभाग को कई अनुभव दे गई। शुरू में विभाग ने इसे हल्के में लेते हुए गश्त शुरू की। जैसे-जैसे क्षेत्र में बाघिन का आतंक बढ़ता चला गया, वैसे-वैसे ग्रामीणों का आक्रोश भी बढ़ा। पहले तो विभाग को पता ही नहीं चला कि यह आदमखोर बाघिन है या तेंदुआ।
इस बीच तेंदुए के फुट प्रिंट मिलने पर तेंदुए को ही आदमखोर घोषित कर दिया गया। उसे मारने की इजाजत भी ले ली गई। लेकिन, बाद में हुई जांच के बाद पीसीसीएफ ने खुलासा किया कि आतंक मचाने वाली एक बाघिन है। इसमें भी विभाग की काफी किरकिरी हुई। वहीं विभागीय अधिकारियों को भी बीच-बीच में लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। कभी कार्बेट के निदेशक और तराई की डीएफओ को कई घंटे धूप में खड़ा रहना पड़ा तो कभी कर्मियों को तल्ला कानियां में अभियान के दौरान भागी बाघिन के बाद अपने कपड़े फटवाने के साथ ही मार तक खानी पड़ी।