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50 Years Of Majboor know about amitabh bachchan Salim khan Javed ali golden jubilee film Cold Sweat connection
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50 Years Of Majboor: 'शोले' के निर्देशक ने क्यों नहीं बनाई अमिताभ की 'मजबूर'? 'कोल्ड स्वेट' की कॉपी थी फिल्म!
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: साक्षी
Updated Fri, 06 Dec 2024 10:09 AM IST
सार
50 Years Of Majboor: अमिताभ बच्चन, परवीन बाबी और प्राण की 6 दिसंबर, 1974 में रिलीज हुई फिल्म 'मजबूर' ने आज अपने 50 साल पूरे कर लिए हैं। फिल्म की गोल्डन जुबली पर चलिए आपको बताते हैं 'मजबूर' से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से...
50 Years Of Majboor: अमिताभ बच्चन अभिनीत 'मजबूर' ने 6 दिसंबर, 1974 में रिलीज हुई थीं और आज इस फिल्म को रिलीज हुए पूरे 50 साल हो चुके हैं। 'मजबूर' की आज गोल्डन जुबली है। इस फिल्म से जुड़े कई दिलचस्प किस्से और तथ्य हैं, जो कुछ ही लोगों को पता होंगे। यह हॉलीवुड से प्रेरित फिल्म है। बॉलीवुड में यह फिल्म बनाने के बाद खुद भारत में कई भाषाओं में इसका रीमेक बनाया गया। चलिए फिल्म की 50वीं सालगिरह के मौके पर जानते हैं फिल्म से जुड़ी कुछ अनसुने किस्से...
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फिल्म 'मजबूर'
- फोटो : एक्स: @FilmHistoryPic
अमिताभ के साथ सलीम-जावेद की दूसरी फिल्म
'मजबूर' का निर्देशन बॉलीवुड अभिनेत्री रवीना टंडन के पिता रवि टंडन ने किया था। 1973 में आई जंजीर के बाद 'मजबूर' सलीम-जावेद और अमिताभ बच्चन के बीच दूसरी फिल्म थी। इसके बाद 1975 में 'दीवार' आई। सलीम-जावेद ने अमिताभ बच्चन को तीनों फिल्मों के जरिए तीन अलग-अलग किरदार दिए। 'मजबूर' की कहानी एक अमेरिकी फिल्म पर आधारित होने की अफवाह थी। अवधारणा यह थी कि कहानी का नायक यानी अमिताभ बच्चन अपनी विधवा मां, विकलांग बहन और छोटे भाई के बहुत करीब है और उनकी देखभाल करना अभिनेता की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे ब्रेन ट्यूमर हो जाता है और डॉक्टर उसे बताते हैं कि वह छह से आठ महीने से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाएंगे।
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फिल्म 'मजबूर'
- फोटो : एक्स: @FilmHistoryPic
हॉलीवुड फिल्म से कॉपी थीं फिल्म की कहानी?
अमिताभ बच्चन को पता चलता है कि उनकी मृत्यु के बाद अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए जल्दी से जल्दी पैसे कमाने का एकमात्र तरीका एक हत्या की जिम्मेदारी लेना है, जिससे उन्हें पांच लाख रुपये मिलेंगे। पचास साल पहले पांच लाख एक बड़ी रकम थी। वह पैसे जुटाता है, जेल जाता है, अपना ऑपरेशन करवाता है और उसे पता चलता है कि वह बीमारी से ठीक हो गया है। अब क्या? उसे पुलिस को असली कातिल तक पहुंचाने में मदद करनी है। यह अवधारणा उस समय हिट साबित हुई। उस समय फिल्म समीक्षकों ने कहा था कि 'मजबूर' का क्लाइमेक्स अमेरिकी फिल्म ओल्ड स्वेट के क्लाइमेक्स से प्रेरित था। दोनों फिल्मों के क्लाइमेक्स में लाल रंग की कार है। कैसे नायक साबित करता है कि वह असली हत्यारा नहीं है और पुलिस को असली कातिल तक पहुंचाने में मदद करता है, यह भी दोनों फिल्मों में है।
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फिल्म 'मजबूर'
- फोटो : एक्स: @FilmHistoryPic
फिल्म पर क्यों काम नहीं कर पाए रमेश सिप्पी?
फिल्म सलीम-जावेद ने लिखी थी। जब निर्देशक 'सीता और गीता' के बाद अपनी अगली फिल्म शुरू करना चाहते थे, तब लेखक जोड़ी ने मजबूर की स्क्रिप्ट रमेश सिप्पी को सुनाई थी, लेकिन जीपी सिप्पी एक बड़ी फिल्म बनाना चाहते थे और उन्होंने 'शोले' पर काम करना शुरू कर दिया। फिर सलीम-जावेद ने निर्माता प्रेमजी को कहानी सुनाई। प्रेमजी कभी दिलीप कुमार के सचिव थे। फिर 'मजबूर' की स्क्रिप्ट रवि टंडन के पास गई और उन्होंने इसे अपने तरीके से संभाला।
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फिल्म 'मजबूर'
- फोटो : एक्स: @FilmHistoryPic
ऐसे डाला गया फिल्म की कहानी में 'प्राण'
'मजबूर' में प्राण भी थे। फिल्म में अभिनेता प्राण की एंट्री दूसरे भाग में होती है, लेकिन अभिनेता बहुत ज्यादा माइलेज लेकर चले जाते हैं। प्रेमजी को फिल्म के दूसरे भाग में प्राण के महत्वपूर्ण किरदार को पेश करने में संदेह था, लेकिन प्राण को कैसे पेश किया जाए? सलीम-जावेद ने उन्हें 'माइकल दारू पी के दंगा करता है' गाने की सिचुएशन दी। फिल्म में माइकल उर्फ प्राण का अपनी आंखों के सामने हाथ रखने और देखने का एक अनोखा अंदाज है। यह अंदाज रवि टंडन का था जो चीजों को ऐसे ही देखते थे। वह गाना एक बड़ा हिट साबित हुआ।
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