संगीत वही है जो बिना भाषा के भी अपना संदेश सुनने वाले तक पहुंचा दे। संगीत एक भाव है और भावों के लिए भाषा कभी सरहद नहीं बनती। भारतीय संगीत के दिग्गजों ने ये बातें बार बार समझाई हैं। विदेशी संगीतकारों को भारत की धरती पर जो सम्मान मिला, वह बिरले ही किसी दूसरे देश में मिलता है। और, देसी संगीतकारों का तो जैसे हर नई पीढ़ी में एक नया पंथ ही बनता रहा है। सी रामचंद्रन, शंकर जयकिशन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याणजी आनंदजी और बप्पी लाहिड़ी को सुनते रहने वालों को जब फिल्म ‘रोजा’ में पहली बार संगीत की एक नई झंकार सुनने को मिली तो वे दीवाने हो गए। फिल्म ‘रोजा’ ने अरविंद स्वामी को पहला पैन इंडिया स्टार बनाया और ए आर रहमान को पहला पैन इंडिया म्यूजिक डायरेक्टर। रहमान संगीत को इबादत मानते हैं। और, संगीत का हर सबक सीखने को तैयार रहते हैं चाहे फिर इसके लिए उन्हें खुद को क्यों न खो देना पड़े।
A R Rahman Exclusive: ‘अमर उजाला’ से खास मुलाकात में बोले रहमान, ‘वंदे मातरम्’ भारत का मूल भाव है
नुसरत फतेह अली खान से पहली मुलाकात
ऐसा ही कुछ हुआ जब रहमान का पहला पहला साबका नुसरत फतेह अली खान के संगीत से पड़ा। रहमान बताते हैं, ‘मेरे एक दोस्त सारंग ने एक बार मुझे एक सीडी दी। उस सीडी में नुसरत साब की आवाज मैंने पहली बार सुनी। उसमें उन्होंने ‘दम मस्त कलंदर’ गाया था। उन्हें सुनकर मेरे तो होश ही उड़ गए। मैंने दक्षिण भारतीय संगीत सुना हुआ था। उत्तर भारत का संगीत सुना हुआ था, लेकिन ये तो कुछ और ही था। मैंने पूछा कि ये क्या है, किसकी आवाज है ये? मेरे जीवन के अगले पांच साल इसके बाद पंजाबी लहजा, पंजाबी भाषा और सूफियाना को समर्पित रहे। उनसे मुलाकात कराने का वादा मुझसे सबसे पहले शेखर कपूर ने किया था, लेकिन वह हो न सका।’
देर तक लाइन में लगे रहे रहमान
तो फिर नुसरत साब मिले कैसे? पूछने पर रहमान बताते हैं, ‘मैं अपने एक अलबम के सिलसिले में न्यूयॉर्क में था और मुझे पता चला कि नुसरत साहब का शो हो रहा है। तो मैं शो देखने गया। कोई पांच छह हजार गोरे मस्त होकर झूम रहे थे। मुझे लगा कि किसी कलाकार को इससे ज्यादा क्या चाहिए। कार्यक्रम के बाद बैकस्टेज उनसे मुलाकात की बात आयोजकों ने मान ली तो मैं लाइन में खड़ा हो गया। कोई पांच छह सौ लोग रहे होंगे। तभी उनके मैनेजर ने मुझे पहचान लिया, वह मुझे लाइन से निकालकर ले गया। नुसरत साब ने कहा कि मैं मुंबई आ रहा हूं, वहां हम मिलते हैं। मैंने कहा कि मुझे आपसे सीखना है। नुसरत साब ने मना नहीं किया।’
रात दो बजे उस्ताद से मिला पहला सबक
रहमान बिना सांस लिए पूरा किस्सा एक बालसुलभ उत्साह के साथ सुनाते जाते हैं, ‘तो रात के दो बजे उनके होटल के स्यूट में महफिल लगी। हर तरफ से लोग आ रहे हैं और उन्होंने मुझे कव्वाली का पहला ज्ञान दिया। जो कव्वाली उस दिन उन्होंने गाकर सुनाई, वह मुझे अब तक याद है। वही इकलौता सबक उन्होंने मुझे दिया। तब भरतबाला ने कहा कि आप दोनों मिलकर कुछ क्यों नहीं करते। तो 1997 में हम पाकिस्तान गए। सिर्फ एक रात के लिए। मतलब कि हम शाम को पहुंचे। बिना आराम किए काम पर लग गए। सुबह तक काम करते रहे। फिर अगली शाम तक काम जारी रहा बिना सोए। और शाम को हम वापस आ गए।’ रहमान और नुसरत फतेह अली खान की ये संगत रहमान के अलबम ‘मां तुझे सलाम’ के गाने ‘चंदा सूरज लाखों तारे ....’ में सुनी जा सकती है।
रहमान के पिता रोज देखते थे लता की फोटो
ए आर रहमान के संगीत को सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से खूब स्नेह मिला है। वह बताते हैं, ‘लता जी के साथ मेरा पहला गाना ‘जिया जले था..’। उनके पास होना भी किसी सपने जैसा होता है। मुझे जहां तक पता है मेरे पिताजी के पास युवा लता मंगेशकर की एक फोटो थी। इस फोटो को वह रोज सुबह उठकर देखते थे। संगीत की प्रेरणा के लिए। किसी भी तरह के गायन का वह शिखर हैं। लताजी जैसा गाने वाला ना कोई हुआ है और न होगा। अभी हम लोगों को क्या क्या नहीं करना पड़ता। ड्रेस बदलो, मेकअप करो, म्यूजिक वीडियो शूट करो, यहां स्टेज पर उछलकूद करो, वहां नाचो। लेकिन, उन्होंने क्या किया, कुछ नहीं। सिर्फ संगीत की साधना की। पूरा जीवन उन्होंने संगीत को दे दिया। विश्व में संगीत की प्रेरणा मानी जाती हैं वह। एक तरह से देखा जाए तो लता मंगेशकर के साथ काम करके मैंने अपने पिताजी का सपना पूरा कर दिया है।’
