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Aaj Ki Awaz का बाइस्कोप: यहां देखिए राज बब्बर और स्मिता पाटिल की असली प्रेम कहानी, कैमरे की जुबानी

Tue, 08 Sep 2020 01:44 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Tue, 08 Sep 2020 01:44 AM IST
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Aaj Ki Awaz this day that year series by pankaj shukla 7 september 1984 bioscope raj babbar smita
आज का आवाज - फोटो : अमर उजाला

देश में किसी भी शादी समारोह में आप चले जाएं आपको बारात निकलते समय ‘आज मेरे यार की शादी है’ और दुल्हन के विदा होते समय ‘बाबुल की दुआएं लेती जा जा तुझको सुखी संसार मिले’, ये दो गाने जरूर बजते सुनाई देंगे। गाने शादी के कुछ और भी बहुत सुपरहिट रहे हैं जैसे, ‘डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल चली’ या फिर ‘मेरा यार बना है दूल्हा’। आज के बाइस्कोप में इन गानों का जिक्र इसलिए क्योंकि आज की फिल्म मे जिन संगीतकार ने संगीत दिया है, उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार तो सन 1962 और 1966 में ही जीत लिए थे लेकिन संगीत का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने के लिए उन्हें इसके बाद कोई तीस साल तक इंतजार करना पड़ा। और, ये मिला भी तो किसी हिंदी फिल्म के लिए नहीं बल्कि एक मलयालम फिल्म के लिए। जी हां, हिंदी सिनेमा के इस मशहूर संगीतकार का जब बंबई में दिल टूटा तो वह जाकर मलयालम सिनेमा में संगीत बनाने लगे और वह भी नाम बदलकर। इस संगीतकार का नाम है रवि और मलायलम सिनेमा में इनका नाम लोगों ने रखा, बॉम्बे रवि। रवि के संगीत निर्देशन से सजी निर्माता बी आर चोपड़ा और निर्देशक रवि चोपड़ा की फिल्म ‘आज की आवाज’ हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।



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Aaj Ki Awaz this day that year series by pankaj shukla 7 september 1984 bioscope raj babbar smita
आज की आवाज - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

‘आज की आवाज’ और रवि के साज
आज के बाइस्कोप का खेल शुरू करने से पहले थोड़ा इससे पहले वाला खेल रवि के साथ और खेल लेते हैं। रवि अब हमारे बीच तो नहीं है लेकिन 3 मार्च 1926 को दिल्ली में जन्मे रवि ने संगीत की बिना कोई तालीम लिए फिल्म इंडस्ट्री में जो कारनामे किए हैं, वह सिर्फ ईश्वर का चमत्कार ही माने जा सकते हैं। अब तो खैर मुंबई में मलाड का इलाका पूरी तरह से मुख्य शहर का हिस्सा सा ही बन गया है लेकिन आज से सत्तर साल पहले जब रवि बंबई आए तो कहीं ठिकाना ना होने की वजह से मलाड रेलवे स्टेशन पर ही रातें बिताया करते थे। फिल्म ‘आनंदमठ’ में कोरस सिंगर से अपनी शुरूआत करने वाले रवि को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में गायक हेमंत कुमार ने सबसे पहला सहारा दिया। और तिनके का सहारा पाकर रवि ने जो संगीत का दरिया पार किया, उसमें ‘चौदवीं का चांद’, ‘दो बदन’, ‘हमराज’, ‘आंखें’, ‘घराना’, ‘खानदान’ और ‘निकाह’ जैसी फिल्में उनकी शोहरत की खेवैया बनीं। ‘वक्त’, ‘नीलकमल’, ‘गुमराह’ और ‘आज की आवाज’ संगीतकार रवि की कुछ और बेहतरीन फिल्में रही हैं। आशा भोसले के करियर को एक नया आकार देने में रवि का बहुत बड़ा हाथ है और गायक महेंद्र कपूर को अगर हिंदी सिनेमा में शोहरत मिली तो इसके पीछे संगीतकार रवि का बहुत बड़ा हाथ है। आगे बढ़ने से पहले चलिए महेंद्र कपूर की आवाज में फिल्म ‘आज की आवाज’ की ये बेहतरीन गजल सुन लेते हैं..

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Aaj Ki Awaz this day that year series by pankaj shukla 7 september 1984 bioscope raj babbar smita
आज की आवाज - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

हर भाषा में हिट रही कहानी
फिल्म ‘आज की आवाज’ हॉलीवुड की चर्चित फिल्म ‘डेथविश’ का रीमेक मानी जाती है। फिल्म की कहानी इसके निर्देशक रवि चोपड़ा तक कैसे पहुंची और कैसे एक दूसरी फिल्म से निकलकर स्मिता पाटिल रातोंरात राज बब्बर के साथ इस फिल्म का हिस्सा बन गईं, वो किस्सा जानने से पहले जान लेते हैं कि फिल्म ‘आज की आवाज’ आखिर है क्या? ये फिल्म सन 1984 में रिलीज हुई। उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से कोई सात हफ्ता पहले। देश में उस वक्त एक अलग ही माहौल था और उस माहौल को ही इस फिल्म में रवि चोपड़ा ने पूरी शिद्दत के साथ पेश करने की कोशिश की है। फिल्म में राज बब्बर और स्मिता पाटिल के अलावा विजय अरोड़ा और नाना पाटेकर भी हैं। फिल्म को हिंदी में इतनी लोकप्रियता मिली कि इसे अगले ही साल तेलुगू में ‘न्यायम मीरे चेप्पाली’ नाम से बनाया गया और इसके बाद तमिल में ‘नान सिगप्पू मनिथन’ के नाम से। कन्नड़ में यही फिल्म ‘महात्मा’ के नाम से रीमेक हुई। फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में बी आर चोपड़ा के नाम से गच्चा गाए सेंसर बोर्ड ने इस बार बहुत एहतियात बरती और फिल्म में बलात्कार और हिंसा के दृश्यों को काटने के लिए दो बार फिल्म निर्देशक को अपने दफ्तर बुलाया। फिल्म के सेंसर सर्टिफिकेट पर आपको लिखा भी दिखाई देगा, री-रिवाइज्ड यानी एक बार रिवाइज होने के बाद फिर से रिवाइजिंग कमेटी के पास ये फिल्म भेजी गई।

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आज की आवाज - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

कहानी ‘आज की आवाज’ की
फिल्म ‘आज की आवाज’ की कहानी प्रोफेसर प्रभात की सिस्टम और समाज से एक साथ लड़ने की कहानी है। वह अपनी मां और बहन के साथ शहर के एक व्यस्त इलाके में रहते हैं और आसपास पनपते अपराधों से परेशान हैं। उनकी शिकायत पर पुलिस कमिश्नर इलाके में पुलिस को सख्ती करने को कहते हैं और इससे पेंच कुछ ऐसे अपराधियों के कस जाते हैं जिन्हें प्रोफेसर का ये पंगा अच्छा नहीं लगता। एक युवती के अपहरण के बाद उसका बलात्कार होता है और उसकी हत्या हो जाती है। आरोपी कोई गवाह न होने के चलते छूट जाता है। प्रभात अपराधियों को भगाने का बीड़ा खुद उठाता है और सीधे इलाके के बड़े बदमाश जगमोहन दास की आंखों की किरकिरी बन जाता है। जगमोहन दास का पूरा कारोबार ही डर की वजह से चलता है और प्रभात डरने से ही इंकार कर देता है। डर की हुकूमत वापस लाने के लिए जगमोहन दास जो करता है उसकी शिकायत भी प्रभात सिस्टम से करता है लेकिन उसे कोई मदद नहीं मिलती और फिर वह खुद ही सिस्टम बन जाता है। ऐसा सिस्टम जिसमें जिरह, सबूत, वकील की कोई जरूरत नहीं है। वह इंस्टैंट इंसाफ शुरू करता है।

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आज की आवाज - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

राज और स्मिता का असली प्रेम
फिल्म ‘आज की आवाज’ उस दौर की फिल्म है जब राज बब्बर और स्मिता पाटिल प्रेम रंग में डूबे हुए थे। दोनों के बीच का आकर्षण और इस आकर्षण के चलते दोनो के चेहरे पर पनपने वाला ओज स्क्रीन पर साफ नजर आता है। सांवली सी स्मिता पाटिल का शरमा कर गुलाबी हो जाना दर्शकों को इस फिल्म में खूब भाया। दोनों ने अभिनय भी कमाल का किया है। फिल्म में सबसे दमदार मौजूदगी दर्ज कराई नाना पाटेकर ने। बाद की फिल्मों में हकलाते हुए तेज बोलने की जो अदा नाना ने पकड़ी, उससे ये फिल्म अछूती रही। यहां नाना की आवाज सर्द है। बोलने का लहजा बहुत शांत है और उनका भय के विस्तार का तरीका भी बहुत गहरा है। नाना का ये अंदाज दोबार देखने को उनके चाहने वाले अब तक तरसते हैं। लेकिन, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि स्मिता पाटिल उन्हें इस रोल के लिए पकड़कर अपने साथ बी आर फिल्म्स के ऑफिस लाई थीं। पहली बार में नाना को एक छोटा मोटा रोल दे दिया गया तो नाना रूठ गए और दफ्तर से बाहर निकल गए। स्मिता ने देखा तो वह भागकर उनके पीछे गईं। इस बार खुद उन्होंने रवि चोपड़ा से बात की और उन्हें समझाया कि नाना एक सीनियर कलाकार हैं। तब जाकर नाना को फिल्म में जगमोहन दास का रोल मिला था।

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