गोरखपुर में जन्मे रवि दुबे मुंबई की छोटे परदे की मनोरंजन दुनिया का बड़ा नाम हैं। जीवन के खेल के पुराने नियमों में उनका यकीन नहीं है। बदलाव को वह तरक्की की असली धुन मानते हैं। रवि दुबे अब निर्माता बन चुके हैं। अपनी पत्नी सरगुन के साथ वह दिलचस्प कहानियां परदे पर पेश कर रहे हैं। उनकी ख्वाहिश ऐसे किस्से कहने की है जो दूसरों की जिंदगी में भी रंग भर सकें। अभिनेता, निर्माता रवि दुबे से ये एक्सक्लूसिव बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
EXCLUSIVE:रवि दुबे बोले- ‘जिस मिट्टी ने मुझे रोटी दी, वहीं खुश हूं, नहीं बनना दूसरे देश का नागरिक’
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जब कोई दमदार अभिनेता निर्माता बनता है तो वह अपने गांव, शहर की कहानी दिखाना चाहता है, लेकिन आप अपनी ससुराल की कहानी दिखा रहे हैं?
हां, हमारे धारावाहिक ‘उडारियां’ जिसका कि हिंदी में मतलब उड़ान होता है, इसका पूरा श्रेय सरगुन को ही जाता है। सरगुन ने ही इसे सोचा, इसका विकास किया और इसे बनाने का सारा श्रेय मैं उन्हीं को देता हूं। किसी पुरानी पंजाबी फिल्म से इस धारावाहिक का कोई वास्ता नहीं है। हम और भी कहानियों पर काम कर रहे हैं और उनमें उत्तर प्रदेश आधारित कहानियां भी शामिल हैं। लेकिन उन्हें आने में अभी वक्त है।
‘उडारियां’ की कहानी तीन लोगों के सपनों की कहानी है, कहानी का एक सिरा कनाडा से भी जुड़ता है, आखिर पंजाब के लोगों को कनाडा से इतना मोह क्यों है?
हमारी कहानी दरअसल रिश्तों की कहानी है। इसके तीन किरदार हैं। तीनों अलग अलग पृष्ठभूमि से हैं। और, तीनों के अलग अलग सपने हैं। हम इनके सपनों की उड़ान की बात कर रहे हैं। जहां तक पंजाब के लोगों के कनाडा जाने की चाहत की बात है तो अक्सर नई पीढ़ी उन बातों से बहुत प्रभावित होती है, जो उनके आसपास पहले से होता आ रहा है। इसका सही कारण तो मैं नहीं बता सकता लेकिन कुछ चीजें परंपराओं से भी आ जाती हैं।
अच्छा, अगर कनाडा या अमेरिका की सरकार रवि दुबे को अपने देश का नागरिक बनना चाहे तो आप क्या करेंगे?
मुझे किसी दूसरे देश का दूसरे दर्जे का नागरिक बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं जहां हूं वहां अव्वल नंबर रहना चाहता हूं। मैं अपने देश का नागरिक बनकर बहुत सुखी हूं। मेरे देश की मिट्टी मुझे जो कुछ दे रही है, मैं उसका एहसानमंद हूं। मेरी रोजी रोटी यहां के लोगों से चल रही है। मेरा देश मुझे रोटी दे रहा है तो मैं तो इसी के साथ जुड़ा रहना चाहूंगा।
वैसे तो एक कलाकार का निर्माता बनना प्राकृतिक विकास ही है, लेकिन क्या आपको लगता है कि अभिनय की भी एक समय सीमा होती है?
मैं नहीं मानता कि अभिनेता के पास अभिनय के लिए सीमित समय होता है। मैं जिन लोगों को अपना आदर्श मानता हूं, वे सभी बरसों से अभिनय कर रहे हैं। ये सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कोई कैसे खुद में नई बात खोज सकता है। खुद को समय के साथ बदलना और नए नए हुनर सीखते रहने में ही तरक्की है। और, इसका उम्र के साथ कोई लेना देना नहीं है।