गूगल पर मुसहर शब्द लिखकर सर्च करने से जो जानकारी आती है, वह बस सिर्फ दो लाइन की है। विकीपीडिया के मुताबिक, मुसहर अथवा मुशहर जाति उत्तरी भारत के निचले गंगा मैदान और तराई इलाकों में निवास करने वाली एक जाति है। ये लोग दलित समुदाय में आते हैं। नाम का शाब्दिक अर्थ "चूहा खाने वाला" है। किसी इंसानी पहचान के साथ ये शाब्दिक अर्थ जुड़ना ही, भीतर तक झिंझोड़ देने वाला है। यही आत्मिक प्रलाप अब एक फिल्म का विषय बनने जा रहा है। नाम है, ‘गंगा तट’।
फिल्म ‘भोर’ के बाद सिनेमा में फिर दिखेंगी मुसहर जाति की दिक्कतें, मधुराज मधु के उपन्यास पर बनेगी फिल्म
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सितारों और कॉरपोरेट घरानों के पीछे भागते बड़े बड़े फिल्मकारों के बीच ऐसी किसी फिल्म के निर्माता व निर्देशक का कोई नाम जानना नहीं जानता। लेकिन, मुंबई शहर सपनों का शहर है। यहां सबको सपने देखने की आजादी है। जो विवादों का सिनेमा बनाता हैं, उनको भी और जिनको जमीन से जुड़ी कोई बात खटककर सिनेमा बनाने पर मजबूर कर देती है उनको भी। प्रकाश झा भी मानते हैं कि आम आदमी से सिनेमा दूर हो रहा है या कि आम आदमी सिनेमा में अब अपना प्रतिबिम्ब देखना नहीं चाहता, सच दोनों हैं। फिल्म ‘गंगा तट’ ऐसा ही एक आईना है जिससे जो सबसे बड़ा नाम जुड़ा है वह हैं धारावाहिक ‘महाभारत’ में द्रोणाचार्य का किरदार निभाने वाले अभिनेता सुरेंद्र पाल।
फिल्म ‘गंगा तट’ दरअसल पत्रकार मधुराज मधु की इसी नाम से लिखे उपन्यास पर बनने जा रही फिल्म है। फिल्म की कथा और संवाद लिखने का काम उन्होंने ही किया है, हालांकि पटकथा लिखने में उन्होंने अमर सिंह पटेल और प्रोफेसर शशि पटेल की भी मदद ली है। वह कहते हैं, “इस फ़िल्म के माध्यम से समाज में यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सेवा, समर्पण, सहयोग की भावना के बगैर समाज का विकास संभव नहीं है।”
भारत के अलावा नेपाल और बांग्लादेश में भी मुसहर जाति के लोग मिलते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार और झारखंड में भी इनकी काफी आबादी है। हाल ही में इनके विकास की योजनाओं भी बनी हैं और इनके लिए घर बनाने की योजनाओं के लिए लाभार्थियों के सर्वे भी हुए। सिनेमा में इनके ऊपर काम कम ही हुआ है। दो साल पहले गोवा के भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में एक फिल्म देखने को मिली, ‘भोर’। निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह की इस फिल्म में एक लड़की के नजरिए से पूरी समस्या पर कैमरा घुमाया गया था।
अब, फिल्म ‘गंगा तट’ में निर्देशक ललित आर्य इस बात को किस ढंग से कहेंगे, इस पर काम शुरू हो चुका है। फिल्म का मुहूर्त राजी खुशी संपन्न हो गया। ललित आर्य के मुताबिक वैचारिक मतभेदों के कारण वैचारिक शक्तियों को हमेशा से देश मे पनपने का मौका मिलता रहा है। फिलहाल मानव-मानव के बीच बढ़ती दूरियां चौड़ी होती जा रही है जिसे समाप्त किया जाना बहुत जरूरी हो गया है। इसीलिए, समाज में मुसहर जाति की समस्याओं को ‘गंगा तट’ फिल्म में कहानी का आधार बनाया है।