नई पीढ़ी के निर्देशकों में अली अब्बास जफर इकलौते ऐसे फिल्म निर्देशक हैं जिनकी दो फिल्मों ‘टाइगर जिंदा है’ और ‘सुल्तान’ ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 300 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की है। अली की निर्देशित फिल्म ‘भारत’ ने भी 200 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार किया। देहरादून में जन्मे और दिल्ली में कॉलेज की पढ़ाई करने वाले अली अब्बास जफर ने मुंबई में अपनी खुद की फिल्म निर्माण कंपनी खोली है। अपनी अगली फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की शूटिंग पूरी कर चुके अली अब्बास से उनके अंधेरी पश्चिम स्थित कार्यालय में ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने ये एक्सक्लूसिव मुलाकात की।
Ali Abbas Zafar Interview: हिंदुस्तान की मिट्टी ही मेरे सिनेमा की खाद, बचपन में दोस्ती धर्म देखकर नहीं की जाती
अपनी अगली फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की शूटिंग पूरी कर चुके अली अब्बास से उनके अंधेरी पश्चिम स्थित कार्यालय में ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने एक्सक्लूसिव मुलाकात की।
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फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ अपने नाम से अमिताभ बच्चन और गोविंदा की इसी नाम की कॉमेडी फिल्म की याद दिलाती है, क्या आपकी फिल्म भी एक कॉमेडी फिल्म है?
नाम की वजह से ही लोगों को ऐसा लग रहा होगा लेकिन जैसा कि हमने अनाउंसमेंट वीडियो में ही दिखा दिया था, ये फिल्म दो ऐसे जाबांज सैन्य अफसरों की कहानी है जो देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। बीएम, सीएम उनके कोड नेम हैं। ये पूरी तरह से एक बिग स्क्रीन एक्शन फिल्म है और मैं इतना ही कह सकता हूं कि इस फिल्म में अक्षय कुमार और टाइगर श्रॉफ के एक्शन दृश्य थियेटर में इसे देखने वाले दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देंगे।
एक्शन आपकी फिल्मों की एक सतत बहते रहने वाली अंतर्धारा है। ओटीटी के लिए आपकी बनाई फिल्म ‘ब्लडी डैडी’ भी इसी श्रेणी की फिल्म है...
विश्व सिनेमा की ऐसी ही फिल्में इन दिनों के युवा दर्शक पसंद कर रहे हैं। ये फिल्म हमने तब शुरू की थी जब पूरी दुनिया लॉक डाउन मे चल रही थी। किसी को कुछ नहीं पता था कि सिनेमाघर फिर कब खुलेंगे। अब लोग मुझसे कह रहे हैं कि इस फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया जाना चाहिए, लेकिन ये फिल्म बनी ही ओटीटी के लिए थी। लोग इसे पसंद कर रहे हैं तो इसमें एक वर्ग ऐसा भी है जो ‘300’, ‘किल बिल’ और ‘जॉन विक’ सीरीज की फिल्में पसंद करता रहा है। शाहिद कपूर तो इस फिल्म के नतीजों से इतना उत्साहित हैं कि वे इसकी सीक्वल पर तुरंत काम शुरू करना चाहते हैं।
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इससे पहले आपने नेटफ्लिक्स के लिए ‘जोगी’ बनाई जो एक विशेष कालखंड की फिल्म है और इसमें आपने दिलजीत दोसांझ को बिल्कुल अलग ही तेवर के साथ पेश किया। एक निर्देशक और एक अभिनेता के बीच परस्पर विश्वास सिनेमा की सफलता के लिए कितना जरूरी है?
सच कहूं तो फिल्म ‘जोगी’ को मिले प्यार ने मेरे भीतर के निर्देशक को एक नया साहस और और एक अलग किस्म की मजबूती दी है। मैं इस फिल्म को बनाते हुए बहुत डरा हुआ था लेकिन देश दुनिया में जिस तरह से दर्शकों ने इस फिल्म को शाबसी दी, उससे पता चलता है कि दर्शकों का फिल्में देखने का स्वाद कितना बदल चुका है, उन्हें अब अच्छी कहानियां और उनका बेहतर प्रस्तुतीकरण चाहिए। और, मेरे सिनेमा का भी यही मूलमंत्र रहा है।
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आपके सिनेमा में एक बात और दिखती है, वह है अलग अलग धर्मों के किरदारों के बीच बनने वाला रिश्ता, ये आप जानबूझकर बुनते हैं या फिर ये कहानी लिखने का आपका स्वाभाविक प्रवाह है?
मेरी कहानियों के किरदार मेरे हिंदुस्तान के किरदार हैं। वह ‘सुल्तान’ का सुल्तान खान हो सकता है, ‘भारत’ का विलायती खान हो सकता है या फिर ‘जोगी’ का कलीम। ये किरदार पूरी फिल्म में कहीं धर्म का दिखावा या मजहबी बात नहीं करते। ये किरदार मेरे आसपास के किरदार हैं जिनकी छाया मैं अपनी कहानियों में देख पाता हूं। और, इनके अक्स में मुझे अपना हिंदुस्तान नजर आता है। हम बचपन में दोस्ती करते नहीं, बस ये दोस्तियां हो जाती हैं, और उस समय हम किसी का धर्म कहां पूछते हैं? यही भाव मेरे सिनेमा का है। मेरा सिनेमा हिंदुस्तान की मिट्टी को ही अपनी खाद मानता है। और, एक मिट्टी में पनपे हर पौधे का धर्म एक ही होता है।
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