दूरदर्शन के धारावाहिक ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ में झाड़ू लगाने वाले की एक छोटी सी भूमिका से शुरू हुआ कानपुर के अमर कौशिक का कैमरे से रिश्ता उन्हें कोई ढाई दशक बाद इस साल की पहली 500 करोड़ी फिल्म तक ले आया है। कानपुर में जन्म लेने के बाद अमर कौशिक की शुरुआती पढ़ाई अरुणाचल प्रदेश में हुई। कई दिग्गज निर्देशकों के वह सहायक रहे और बतौर निर्देशक उन्हें अपनी पहली फिल्म ‘स्त्री’ भी बहुत ही दिलचस्प तरीके से मिली। अमर कौशिक से ये एक्सक्लूसिव बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
Amar Kaushik Interview: अमर कौशिक के लिए ये वाला राजकुमार सबसे लकी, अभिषेक के किरदार से जन्मा हॉरर यूनिवर्स
पांच सौ करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली फिल्म ‘स्त्री 2’ बनाने की बहुत बहुत बधाई, अमर! सपने में गाना तो नहीं सुनाई देता, आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे...
ये बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है मेरे ऊपर। पांच सौ करोड़ क्लब में आने से ज्यादा जरूरी है यहां पर बने रहना। मैं अपना सिर जबर्दस्ती ऊंचा करके नहीं घूमना चाहता क्योंकि ये जीवन का बस एक शुक्रवार है। अगले शुक्रवार का किसी को क्या पता? हां, लोग हैं जो मुझे चढ़ा रहे हैं कि आप ये हो गए, आपने तो हिला दिया, आपने तो वो कर दिया, लेकिन मैंने सिर्फ एक कहानी कही है और वही करता रहूंगा। अच्छी फिल्में बनाने की कोशिश करता रहूंगा। अच्छा सिनेमा बनाता रहूंगा। ये फिल्में नंबर क्या करेंगीं, पता नहीं!
हां, सिनेमा अच्छा होना चाहिए, वैसा सिनेमा जिसे देखने के लिए लोग रोज सुबह अखबार में सिनेमाघरों की लिस्ट देखा करते थे..
हां, जैसे हम लोग बचपन में पागल होते थे न सिनेमा जाने के लिए कि ये फिल्म देखने जाना है, वह उत्साह गायब हो रहा था। मुझे महसूस हुआ कि मैं भी तो वैसा ही दर्शक रहा हूं और और अगर अभी मुझे बनाने का मौका मिल रहा है तो मैं क्यों नहीं ऐसा वैसा ही सिनेमा बनाऊं जिसे देखने के लिए लोगों में ये जोश हो कि मुझे सिनेमाघर जाना है। और, समय न हो, पैसे न हों, तो भी कहीं न कहीं से जुगाड़ करके निकल ही जाते थे, सिनेमा देखने।
विकीपीडिया के मुताबिक आपका जन्म अरुणाचल प्रदेश में हुआ और पढ़ाई कानपुर में हुई..
जी नहीं, मेरा जन्म कानपुर में हुआ। हां, जन्मते ही मैं अरुणाचल प्रदेश चला गया। पिताजी वहीं पर वन विभाग में नौकरी करते थे। मां मुझे तब जन्म देने ही कानपुर आई थीं। फिर अरुणाचल में छठी-सातवीं तक पढ़ाई की और फिर से कानपुर..! कानपुर में ही मैंने बचपन की सारी शैतानियां कीं, यहीं जवान हुआ, यहीं बिगड़ा, यही लफ्फाजी की और यहीं जिंदगी के असली सबक सीखे। अभी कहीं पढ़ा कि हैप्पीनेस इंडेक्स में कानपुर नंबर वन है। कानपुर का ये ह्यूमर ही आपको मेरे सिनेमा में दिखता है।
आपकी बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘स्त्री’ की बात करते हैं। निर्देशकद्वय राज और डीके की लिखी ये कहानी है, आपकी उनसे मुलाकात फिल्म ‘गो गोवा गॉन’ के दौरान ही हुई? कैसे वे तैयार हुए आपको ये कहानी देने के लिए?
राज और डीके से पहले मैंने राजकुमार गुप्ता के साथ काफी फिल्में की हैं। मैं उनके साथ ‘नो वन किल्ड जेसिका’, ‘आमिर’ और ‘घनचक्कर’ में था। ओनिर के साथ मैंने ‘आईएम’ और ‘सॉरी भाई’ कीं। राज और डीके के साथ भी मैंने ‘गो गोआ गॉन’ की। ये फिल्म पहली बार बनना शुरू होने के बाद लंबे समय तक रुकी रही। लेकिन, मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा। इस फिल्म के सेट पर मुझे लगता था कि जिस तरह की कहानी मुझे बहुत पसंद है, वैसा ये हॉरर नहीं है। मुझे कल्पनालोक बहुत पसंद है। वो चमत्कारी दुनिया जो होती थी, ‘अलिफ लैला’ और ‘चंद्रकांता’। लेकिन, ‘गो गोवा गॉन’ के किरदार कहीं न कहीं विदेशी थे तो मुझे लगता था कि अपनी कहानियां भी बहुत हैं मेरे पास जो इस तरीके की हैं और वही मैंने किया जब मुझे बनाने का मौका मिला।