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सिनेमा में सौ में से नब्बे नायक सदा 'भीतर वाले' रहें, लेकिन 'महानायक' हमेशा बाहर वाला होगा

Wed, 25 Sep 2019 07:04 PM IST
अपूर्वा राय बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: अपूर्वा राय Updated Wed, 25 Sep 2019 07:04 PM IST
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Amitabh Bachchan: From Angry Young Man to dada saheb phalke award
Amitabh Bachchan - फोटो : social media

अमिताभ बच्चन के स्टारडम पर लिखी अपनी शोध पुस्तक 'अमिताभ : मेकिंग ऑफ़ ए सुपरस्टार' में लेखिका सुष्मिता दासगुप्ता अमिताभ बच्चन के सिनेमा में पदार्पण को एक युगांतकारी घटना बताते हुए लिखती हैं कि शायद हिन्दी सिनेमा में पहला साउंड के आने, और दूसरा कलर के आने के बाद तीसरी सबसे बड़ी युग परिवर्तनकारी घटना अमिताभ युग की शुरुआत ही मानी जा सकती है। हो सकता है कि इस कथन में आपको थोड़ा महिमामंडन जैसा लगे, लेकिन जब आप इस दावे के ख़ास धारा को मोड़नेवाले आयाम पर गौर करेंगे तो अर्थ बेहतर समझ आएगा। क्योंकि अमिताभ परंपरा के निर्माता होने से पहले उसे तोड़नेवाले थे।

Amitabh Bachchan: From Angry Young Man to dada saheb phalke award
amitabh bachchan - फोटो : social media

सिनेमा की 'दूसरी परंपरा' की खोज

वे जरूरत से ज्यादा लम्बे थे। उस जमाने के फैशन बेलबॉटम में तो उनकी छरहरी टांगें और उभरकर आती थीं। ट्रेड पंडितों ने भविष्यवाणी की कि इस 'दोष' के चलते उनके साथ काम करने को, सफल जोड़ी बनाने को कोई स्थापित नायिका तैयार नहीं होगी। पर नतीजा, उन्होंने अपने सिनेमा में नायिका की भूमिका को ही सदा के लिए हाशिये पर भेज दिया। और जैसा सिने इतिहासकार रवि वासुदेवन लिखते हैं, देखते ही देखते इस छह फीट दो इंच के इकहरे बदन लड़के का यही 'दोष' लम्बाई इस लम्बवत पसरे मुम्बई महानगर और उसकी उर्ध्वाधर वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का जीता-जागता प्रतीक बन गई।

Amitabh Bachchan: From Angry Young Man to dada saheb phalke award
amitabh bachchan - फोटो : file photo

आवाज

अमिताभ भिन्न थे। पंजाब के देहातों से भागे गबरू जवानों और पीढ़ियों से सिनेमा बनाते आये खानदानों से निकले नायकों के बीच वे एक हिन्दी साहित्यकार के बेटे थे। भले वे आगे चलकर एक्शन फ़िल्मों के सरताज बने, उनकी पहली फिल्म 'सात हिन्दुस्तानी' का अन्तर्मुखी मुस्लिम शायर अनवर अली अपनी बात कलम और कलाम से कहना कहीं ज़्यादा पसन्द करता था। उनकी आवाज को तय मानकों से भिन्न पाया गया। ऑल इंडिया रेडियो ने उन्हें ऑडिशन के बाद बैरंग लौटा दिया था।जवाब में उन्होंने आवाज के तयशुदा मानकों को ही पलट डाला, हमेशा के लिए। आज अमिताभ बच्चन की आवाज भारतीय जनमानस की सबसे पहचानी हुई आवाज़ों में से एक है। संभवत: सबसे पहचानी।

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Amitabh Bachchan: From Angry Young Man to dada saheb phalke award
फिल्म शराबी में अमिताभ बच्चन - फोटो : सोशल मीडिया

गुस्सैल नायक में बोलता समाज का प्रतिरोध

सत्तर का दशक उनका दशक था। यूं भी यह दशक आजाद भारत के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा दशक है नक्सलबाड़ी की अनुगूंज, चुनावी उठापटक, भारत-पाकिस्तान युद्ध, सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन और आपातकाल। यहाँ युद्ध भी है, तानाशाह भी, मसीहा भी, क्रांति भी। यह दशक युवा असंतोष का दशक है, जिसका सिनेमाई प्रतिफलन अमिताभ के 'एंग्री यंग मैन' किरदार में होता है। हिन्दी सिनेमा का सबाल्टर्न हीरो महानायकीय हिंसक टर्न लेता है। यह फिल्में एक ओर सिस्टम के प्रति समाज में पनपते गुस्से की जिन्दा बानगी हैं, वहीं हर बार समाज में गहरे पैठी गैर-बराबरी से उपजी इन समस्याओं के किसी मसीहाई समाधान के साथ इन फिल्मों ने अपने दर्शक के लिए अन्तत: यथास्थितिवाद की पुष्टि करने का ही काम किया।

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Amitabh Bachchan: From Angry Young Man to dada saheb phalke award
amitabh bachchan - फोटो : social media

'जंजीर' से लेकर 'अग्निपथ' तक अमिताभ का निभाया गया विजय का किरदार इसी द्वैध से ग्रस्त है। वो हीरो नहीं, एंटी-हीरो है। मैथिली राव उस दौर के सिनेमा पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं, "सलीम-जावेद की पटकथाओं में उन गुमसुम उलझनों के गुस्से की झलक होती थी जो नेहरुवादी सपनों के छले जाने और गरीबी हटाओ के खोखले नारे से पैदा हुई थी।" यश चोपड़ा की 'दीवार' के उस क्लासिक सीन में विजय जब पलटकर अपने भाई को कहता है, "जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ.." तो वह पूरे नागरिक समाज को उसका निश्छल बचपन छीने जाने का अपराधी ठहरा रहा है। ये तमाम किरदार दरअसल भारत में जारी एकतरफा शहरीकरण तथा कथित विकास की प्रक्रिया की बलि चढ़े किरदार हैं।

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