उत्तर प्रदेश के शहर अयोध्या में जन्मीं अनुष्का शर्मा का ननिहाल गढ़वाल में हैं। परवरिश उनकी बंगलुरू में हुई और ससुराल नई दिल्ली है। ये विस्तार अनुष्का को अब बतौर फिल्म निर्माता बहुत मदद कर रहा है। भाई कर्णेश शर्मा मर्चेंट नेवी की नौकरी छोड़ उनके साथ उनकी कंपनी क्लीन स्लेट फिल्म्स चलाते हैं। कहानियों के चयन के अपने तरीकों, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नए लोगों को मौका देने के अपने इरादों और बतौर अभिनेत्री अपनी नई फिल्म के वादों पर अनुष्का शर्मा ने ये एक्सक्लूसिव मुलाकात की पंकज शुक्ल से।
EXCLUSIVE: महिला किरदारों पर फिल्में बनाने का अनुष्का का ये है असली राज, परदे पर वापसी की तैयारी
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बतौर अभिनेत्री हिंदी सिनेमा की ट्रेंडसेटर फिल्में चुनने के बाद बतौर निर्माता भी आप एनएच 10 से लेकर परी, फिल्लौरी और बुलबुल जैसी लीक से इतर फिल्में बना रही हैं, आपका कहानी चुनने का तरीका क्या है?
जब से मैंने और कर्णेश ने ये तय किया कि हम फिल्में बनाना चाहते हैं तो हम दोनों ने ये तय किया कि हम ऐसी फिल्में बनाना चाहते हैं जैसी हम देखना चाहते हैं। ऐसी फिल्में जिनमें आपको लगता है कि कोई गंभीर बात बोली जा रही है लेकिन ये बात बहुत आसानी से बोली जा रही है। हमारी कहानियां उपदेशात्मक नहीं हैं। और, न ही आपको ज्यादा ज्ञान दे रही हैं। हम ये कहानियां बहुत ही साधारण तरीके से बता रहे हैं। लेकिन, इनको कहने के लिए जो हम वातावरण बना रहे हैं वह हम बहुत ही मनोरंजक बना रहे हैं। खूबसूरत बना रहे हैं। हमारी कहानियों में किस्से कहने का तरीका बिल्कुल अलग रहेगा। हमने अपनी इसी सोच को ध्यान में रखकर कहानियां चुनी हैं।
आपने अब तक जितनी फिल्में बतौर निर्माता बनाई हैं, उनमें कहानियां महिला किरदारों के नजरिये से ही कही गई हैं, इसके पीछे कोई सोची समझी वजह?
ये एक संयोग है। फिर क्या है कि लड़कियों की कहानियां हमेशा एक मजबूत संदेश लेकर आती हैं। ये कहानियां मजबूत इसलिए भी होती हैं क्योंकि हमारे आसपास भी जो महिला किरदार होते हैं, उनकी गहराई ज्यादा होती है। आप देखेंगे कि महिला किरदारों की कहानियां हमें बहुत ज्यादा सुनाई भी नहीं गईं। आमतौर पर जो फिल्में हमारे देश में बनी हैं, उनमें से ज्यादातर जिंदगी को किसी पुरुष को नजरिये से देखा जाता है। कहानी के महिला किरदार उतनी गहराई से नहीं दिखाए जाते। हम ऐसी ही कहानियां बोलना चाहते हैं जिनमें महिला किरदारों के नजरिये से कोई बात कही जा रही है। क्योंकि, इसमें एक नयापन है। क्योंकि, हममें से ज्यादातर लोगों ने उस प्वाइंट ऑफ व्यू की कहानी सुनी ही नहीं। यह कहानियां कहने का हमारा नजरिया है। हम खुश हैं कि लोगों को ये दिख रहा है और उसकी तारीफ भी हो रही है।
आपने कुछ दिन पहले एक बात कही कि मुंबई में जो लोग नए नए काम करने आते हैं क्लीन स्लेट फिल्म्स उनका घर है। आपकी फिल्म बुलबुल में अन्विता को करियर शुरू करने के 15 साल बाद निर्देशन का मौका मिला है। तो युवाओं को आपके यहां मौका मिलना कितना आसान है?
हमने अपना ये प्रोडक्शन हाउस अभी शुरू किया है। मैं और कर्णेश दो लोग ही इसे मिलकर चलाते हैं। कोई लंबा चौड़ा स्टाफ नहीं है। पूरी पारदर्शिता है। अभी तक जो हुआ है उसमें पहले हमारे साथ जिन लोगों ने काम किया है, हम उन्हीं के साथ आगे बढ़ते जा रहे हैं। जैसे अन्विता ने पहले हमारे साथ परी में काम किया है, फिल्लौरी में काम किया है। अंशय लाल जो बुलबुल के क्रिएटिव प्रोड्यूसर हैं उन्होंने फिल्लौरी निर्देशित की थी। सुदीप शर्मा ने अपनी पहली फिल्म जो लिखी थी एनएच 10, वह हमारे साथ बनाई फिर पाताल लोक में जाकर वह क्रिएटिव बने। प्रोशित रॉय ने परी निर्देशित की, उसके पहले फिल्लौरी में वह असिस्टेंट डायरेक्टर रहे।
आपके कहने का मतलब काम करते करते लोगों के साथ एक अलग तरह की सहूलियत हो जाती है?
नहीं, मैं ऐसा नहीं बोलूंगी कि सहूलियत या कंफर्ट लेवल हो जाता है। प्रोशित ने भी अपनी पहली फिल्म जब वो असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर आए थे तो वह उनकी पहली फिल्म ही थी। प्रोफेशनल्स के तौर पर ही हम मिले थे। हमारा काम करने का तरीका इतना पारदर्शी है कि ऐसा नहीं कोई टीम है या बीच में कोई बंदा है और हमारे पास चीजें फिल्टर होकर या वाया वाया होकर पहुंच रही हैं तो प्रोशित ने हमसे बात की और इसी तरह अन्विता की बात हुई कर्णेश से। अन्विता और प्रोशित ने कर्णेश को कहानी पिच की और ये लोग आकर मुझसे कोलकाता में मिले जहां मैं काम कर रही थी। हम लोग नए नए लोगों के साथ काम कर पा रहे हैं, उनको मौका दे पा रहे हैं तो इसलिए कि हम लोग अच्छी कहानियां ढूंढ रहे हैं। हमारे यहां और कोई और कसौटी नहीं है। ऐसे ही होता है जब आप एक ऐसा वातावरण बनाते हैं और लोगों को ये भरोसा दिलाते हैं कि आप हमसे खुलकर बात कर सकते हैं तो नए लोग आगे आते हैं। हमारे यहां इस बात का संकोच किसी को नहीं होता कि मुझसे या कर्णेश से कोई बात कैसे कही जाए। किसी तरह का कोई भय जैसा माहौल नहीं है हमारे यहां।