बीते जमाने के दिग्गज अभिनेता बलराज साहनी ने हिंदी सिनेमा को अपने सहज अभिनय से एक अलग मुकाम तक पहुंचाया। जिस तरह से फिल्मों में सहजता से अपने किरदार निभाए हैं, उसे देखकर ऐसा नहीं कभी नहीं लगा कि वह अभिनय कर रहे हैं। वह मेथड एक्टिंग का आविष्कार होने से पहले के मेथड एक्टर थे। प्रभावशाली अभिनय के प्रचलन में आने से बहुत पहले बलराज साहनी ने अपने पात्रों को अपनाना सीख लिया था, जैसे कि वे उनके डीएनए का हिस्सा हों। एक मई 1913 को ब्रिटिश भारत के रावलपिंडी में जन्मे बलराज साहनी के जन्मदिन पर आइए जानते हैं उनके द्वारा निभाए गए 10 चर्चित किरदार के बारे में...
Balraj Sahni: इन 10 किरदारों ने दिलाई बलराज साहनी को बड़े परदे पर बुलंदी, हर फिल्म अभिनय की अनोखी टेक्स्ट बुक
फिल्म: धरती के लाल (1946)
किरदार: निरंजन
साल 1943 में बंगाल में पड़े अकाल को केंद्र में रखकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने फिल्म 'धरती के लाल' का निर्माण और निर्देशन किया था जो साल 1946 में रिलीज हुई। इस फिल्म में किसानो की दुर्दशा को दिखया था। उन दिनों किसानों का इतना शोषण होता था कि भीख मांगने और आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाने के बाद भी अपनी घरती मां को नहीं बेचते थे। इस फिल्म में बलराज साहनी ने ऐसे ही एक गरीब किसान के बेटे निरंजन का किरदार निभाया था, जो अपने उसूलों का बहुत पक्का होता है। तमाम मुश्किलों के बावजूद वह अपनी जमीन को बेचने के लिए तैयार नहीं होता है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास की यथार्थवादी सिनेमा की नींव डालने वाली फिल्म साबित हुई। भारत के साथ -साथ अंतरराष्ट्रीय स्टार पर भी इस फिल्म को खूब सराहा गया था। पूरे सोवियत संघ में देखी जाने वाली यह पहली भारतीय फिल्म है।
फिल्म: दो बीघा जमीन (1953)
किरदार: शंभू महतो
फिल्म 'दो बीघा जमीन' अपने समाजवादी विषय के लिए जानी जाने वाली फिल्म है, जिसे भारत के शुरुआती समानांतर सिनेमा में एक महत्वपूर्ण फिल्म और एक ट्रेंडसेटर माना जाता है। बिमल रॉय के निर्देशन में बनी इस फिल्म में इस फिल्म में बलराज साहनी और निरूपा रॉय की मुख्य भूमिका थी। बलराज साहनी ने इस फिल्म में एक किसान शंभू महतो का किरदार निभाया था। दो बीघा जमीन शंभू महतो के परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन है। लेकिन स्थानीय जमींदार कुछ व्यापारियों के साथ मिलकर एक मिल का निर्माण करना चाहता है और वह शंभू की जमीन खरीद सकता है। शंभू अपनी आजीविका के एकमात्र साधन को बेचने से असहमत है और जमींदार का कर्ज उतारने के लिए तपते डामर पर नंगे पांव कोलकाता (कलकत्ता) की सड़कों पर रिक्शा चलाता है। जिस तरह से बलराज साहनी ने फिल्म में रिक्शा चालक के किरदार को निभाया है, वह आज भी ‘मेथड एक्टिंग’ में विश्वास रखने वाले अभिनेताओं के लिए एक मानक है। रिक्शा दौड़ाते बलराज साहनी की छवि अपनी मार्मिकता में हिंदी सिनेमा में अद्वितीय रही है। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया, यह फिल्मफेयर बेस्ट फिल्म का अवार्ड जीतने वाली पहली फिल्म बन गई और कान फिल्म फेस्टिवल में 'नीचा नगर' के बाद अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी।
फिल्म: घर संसार (1958)
किरदार: कैलाश
फिल्म 'घर संसार' पारिवारिक फिल्म थी, जिसमें बलराज साहनी ने एक पत्र लेखक कैलाश की भूमिका निभाई थी। कैलाश उन लोगों को अपनी सेवाएं देता है, जो लिख नहीं सकते हैं। इस फिल्म में नरगिस ने बलराज साहनी की पत्नी का किरदार निभाया था। बलराज साहनी और नरगिस दोनों अपनी भूमिकाओं में एक शांत गरिमा लाते हैं और दयालु और मधुर लोगों के रूप में लोगों से पेश आते हैं। बड़े भाई का जो कर्तव्य होता है, उस किरदार को बड़ी ही बखूबी से बलराज साहनी ने निभाया था। बलराज साहनी और नरगिस के अलावा इस फिल्म में राजेन्द्र कुमार और कुमकुम की मुख्य भूमिकाएं थी। इस फिल्म का निर्माण एए नाडियाडवाला ने किया था और फिल्म के निर्देशक वी एम व्यास थे ।
फिल्म: लाजवंती (1959 )
किरदार: निर्मल
फिल्म 'लाजवंती' में बलराज साहनी और नरगिस की मुख्य भूमिकाएं हैं। इस फिल्म में गृहस्थी की साधारण समस्या को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से दिखाया है। बलराज साहनी ने इस फिल्म में शहर के नामी वकील निर्मल का किरदार निभाया। नरगिस ने बलराज साहनी की पत्नी कविता का किरदार निभाया। निर्मल काम में ज्यादा व्यस्त रहता है इसलिए अपनी पत्नी को ज्यादा समय नहीं दे पाता है, यह बात कविता को बहुत अखरती है। उसी दौरान कविता की मुलाकात अपने कॉलेज के दिनों के दोस्त के होती है और दोनों के बीच मुलाकात का सिलसिला बढ़ता है। बात जब निर्मल तक पहुंचती है, तो वह कविता को घर से निकाल देता है। घर में सभी सुविधाएं हो और पति के पास समय न हो तो सब कुछ बेकार होता है। इस विषय को इस फिल्म में बहुत ही प्रभावशाली ढंग से पेश किया गया था। बलराज साहनी का इस फिल्म में बहुत ही बेजोड़ अभिनय रहा है। उस समय यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुई थी। इस फिल्म को साल 1959 में नेशनल अवार्ड मिला था, यह अवार्ड सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट के रूप में मिला था। फिल्म का निर्माण मोहन सहगल ने किया था और फिल्म के निर्देशक नरेंद्र सूरी थे।
