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'बत्ती गुल मीटर चालू' के डायरेक्टर ने किया खुलासा, बिजली का बिल ज्यादा आए तो करें ये काम

Sun, 09 Sep 2018 01:42 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 09 Sep 2018 01:42 PM IST
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batti gul meter chalu director Shree Narayan Singh exclusive interview

आपका लुक आध्यात्मिक और पूजा-पाठ वाले व्यक्ति का है। तिलक, मालाएं और अंगूठियां। बॉलीवुड में यह कैसी लाइफ स्टाइल है?


मैं अपनी तरह से रहता हूं। पत्नी और दो बच्चे हैं। काम करता हूं, घर जाता हूं। पूजा करता हूं। जिंदगी में सब कुछ करके देख लिया और समझ में यह आया कि सब माया है।

batti gul meter chalu director Shree Narayan Singh exclusive interview
Batti Gul Meter Chalu

'बत्ती गुल मीटर चालू' का आइडिया कैसे आया?
यह विपुल रावल की कहानी है, जिन्होंने 'रुस्तम' (अक्षय कुमार) लिखी थी। फिल्म का पहले नाम था रोशनी। विपुल ने प्रेरणा अरोड़ा को स्टोरी दी, जो टॉयलेट की एक प्रोड्यूसर थीं। उन्होंने कहानी मुझे दी और कहा कि शाहिद कपूर इसमें काम करने को इच्छुक हैं। स्टोरी का आइडिया अच्छा था, लेकिन एप्रोच मुझे डिफरेंट चाहिए थी। मैं शाहिद से मिला। उन्हें अपनी बात बताई और वे मेरे एप्रोच पर सहमत हो गए। फिर हमने गरिमा-सिद्धार्थ को आइडिया/कॉन्सेप्ट दिया, उन्होंने रिसर्च-रेकी की और पूरी स्क्रिप्ट लिखी।

batti gul meter chalu director Shree Narayan Singh exclusive interview
Batti Gul Meter Chalu

ट्रेलर से लगता है कि फिल्म में आपने प्राइवेट बिजली कंपनियों की दादागिरी दिखाई है?
प्राइवेट हो या सरकारी, हम किसी को निशाना नहीं बना रहे। हम बता रहे हैं, सिर्फ वही जिम्मेदार नहीं हैं। आम लोगों की सोच और कार्यप्रणाली भी जिम्मेदार होती है।

 

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batti gul meter chalu director Shree Narayan Singh exclusive interview
Batti Gul Meter Chalu

अंततः फिल्म क्या कह रही है?
हम लोगों को बता रहे हैं कि ज्यादा बिल आ जाए तो सीधे जाकर भर देने की जरूरत नहीं है। बिजली हमारा अधिकार है। ज्यादा बिल आए तो कहां-कहां जाएं और कैसे लड़ें, आपको आपका हक मिलेगा।

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Batti Gul Meter Chalu

'टॉयलेट और बत्ती गुल जैसी फिल्में बताती हैं कि सिनेमा अब समाज को राह दिखाने की कोशिश कर रहा है। 80-90 के दशक में यह बात गायब हो गई थी। इसके लिए हमें दर्शकों को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने नए विषयों को स्वीकार किया। इससे निर्माता-निर्देशकों का मनोबल बढ़ा है। वे अच्छी चीजें कहने को तैयार हैं। बड़े-बड़े कलाकर ऐसी कहानियों में काम करने को तैयार हैं।'

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