सिनेमा, खासतौर से फीचर फिल्मों से इतर सिनेमा, अपने आप में तमाम कहानियां समेटे रहता है। ऐसी ही एक दुनिया है विज्ञापन फिल्मों की जिसमें बसने, बनने वाले सिनेमा से ही प्रसून जोशी जैसे नाम सामने आते रहते हैं। लेकिन, ऐसा कम ही होता है कि कोई महिला इन विज्ञापन फिल्मों में बड़ा नाम कमाए और सामाजिक कार्यों में भी बराबर की उसकी भागीदारी हो। सरकारी विज्ञापन फिल्मों का बड़ा नाम बन चुकीं दीपमाला यही कर रही हैं।
अपराजिता: 800 विज्ञापन फिल्में बना चुकी निर्देशक की बड़ी पहल, पहली बार ट्रांसजेंडर को बनाया हीरोइन
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एक कोरियाई कंपनी के लिए पहली बार बौद्ध सर्किट पर बने कार्यक्रम की एंकरिंग से विज्ञापन फिल्मों की दुनिया में आईं दीपमाला एक साधारण परिवार से रही हैं लेकिन वह जीवन की असल अपराजिता हैं। छोटी सी शुरुआत करने वाली दीपमाला अब अपनी खुद की कंपनी चलाती हैं और तमाम लोगों को उनकी कंपनी में रोजगार भी मिला हुआ है। वह बताती हैं, ‘मैंने अपनी शुरुआत एक राष्ट्रीय चैनल के कार्यक्रम विभाग में इंटर्न के तौर पर की थी, लेकिन मुझे लगा कि उड़ने के लिए ये आसमान वो नहीं जो मुझे चाहिए। मैंने कुछ और चैनलों व प्रोडक्शन कंपनियों में पंख तौले और फिर एक दिन खुद उड़ने का फैसला कर लिया।’
दीपमाला को अपनी कंपनी खोले 10 साल हो चुके हैं। निर्माता और निर्देशक के तौर पर वह अब तक 800 फिल्में बना चुकी हैं। इसकी शुरूआत के बारे में पूछने पर वह बताती हैं, ‘अपने काम की शुरुआत तो मैंने उधार के कंप्यूटर से ही की थी लेकिन विचार मेरे अपने थे। एक दिन एक सैन्य अफसर के सामने पड़ी मोटी फाइल उठाकर मैंने उन्हें सलाह दी कि अगर इस पूरी बात को वीडियो में बदल दिया जाए तो दूसरों को समझाने में ज्यादा आसानी होगी। उन्होंने मुझे ये काम दिया और मैंने जो फिल्म बनाकर उन्हें दी तो उससे वह बहुत खुश भी हुए।’
बस यहीं से दीपमाला का काम चल निकला। धीरे धीरे सरकारी दफ्तरों में उनके काम की चर्चा होने वही और जल्द ही मंत्रालयों के साथ साथ संयुक्त राष्ट्र की फिल्में भी दीपमाला बनाने लगीं। केंद्र और राज्य सरकारों की मदद से चलने वाले तमाम गैरसरकारी संगठनों के लिए भी उन्होंने फिल्में बनाईं। और, ऐसे ही एक संगठन के लिए काम करते हुए उन्हें मिल गई अपनी एक फिल्म की हीरोइन या कहें कि हीरो। या कि दोनों कह सकते हैं। दीपमाला ने हिंदी सिनेमा के एक बड़े सितारे के साथ जो अपनी शॉर्ट फिल्म बनाई है, उसकी हीरोइन एक ट्रांसजेंडर है। हिंदी सिनेमा में किसी ट्रांसजेंडर को हीरोइन बनने का पहला मौका दीपमाला ने ही दिया है। दीपामाला बताती हैं, ‘मेरी ये शॉर्टफिल्म कई फिल्म फेस्टिवल्स में घूम चुकी है और तमाम पुरस्कार भी इसे मिले हैं, लेकिन अभी इस फिल्म की फिनिशिंग बाकी है। ये काम पूरा होती ही मैं इसे किसी ओटीटी पर रिलीज करना चाहती हूं।’
दीपमाला का इरादा अब विज्ञापन फिल्मों से आगे भी अपनी दुनिया बसाने का है। वह इन दिनों एक खास विषय पर रिसर्च कर रही हैं जिसका ताल्लुक एक ऐसी दुनिया से है जिसका मनोरंजन तो सबको भाता है, पर जिसकी छाया कोई अपने आसपास पड़ने नहीं देना चाहता। दीपमाला कहती हैं, ‘हां, ये मुश्किल विषय है। और, यह क्षेत्र भी बहुत चुनौतियों से भरा हुआ है। लेकिन, मैं सिनेमा को एक यात्रा समझती हूं और यात्रा में नए सहयात्री मिलना, नई सीखें मिलना और नए सबक मिलना जरूरी है। मैं इसके लिए तैयार हूं। मेरा आसमान अभी थोड़ा और विस्तार लेने वाला है।’