मुंबई के मौसम का ताप यूं होता है कि मार्च और अप्रैल के महीनों में ही पारा कई बार चालीस के आसपास पहुंचने लगता है। इसी गर्मी में अब से कोई 32 साल पहले एक लड़का कभी ऑटो रिक्शा के पीछे तो कहीं किसी दीवार पर पोस्टर लगाता नजर आ जाता था। पोस्टर पर किसी का चेहरा तो नहीं होता, पर इस पर लिखा होता, ‘हू इज आमिर खान? आस्क द गर्ल नेक्स्ट डोर’ यानी कि ‘आमिर खान कौन है? प़ड़ोस की लड़की से पूछो।‘सुबह, शाम, दोपहर कभी भी अपनी ही फिल्म के ये पोस्टर चिपकाते दिख जाने वाला ये लड़का था आगे चलकर मार्केटिंग जीनियस और मिस्टर पऱफेक्शनिस्ट के नाम से मशहूर हुआ हीरो आमिर खान।
Bioscope S2: मंसूर खान ने नहीं मानी फिल्म के अंत को लेकर पिता की बात, ऐसे ब्लॉकबस्टर बनी आमिर की फिल्म
मंसूर खान पर दांव
उधर, नासिर हुसैन की गिनती उन दिनों हिंदी सिनेमा के चंद सबसे कामयाब फिल्म निर्माता, निर्देशकों में होती थी। वह परेशान थे अपने बेटे से जो आईआईटी की पढ़ाई बीच में छोड़ चुका था और अमेरिका से भी पढाई अधूरी छोड़ बंबई लौट चुका था। मंसूर खान नाम के इस लड़के को म्यूजिक से इतनी मोहब्बत थी कि उसे दूरदर्शन पर आने वाले गजलों के एक कार्यक्रम को नई स्टाइल में एडिट करने की धुन सवार हुई और अपने कार्यक्रम को वह कैसे बनाएगा, इसके लिए उसने पायलट एपीसोड के तौर पर एक फिल्म बना डाली। ये फिल्म नासिर हुसैन को पसंद आ गई। नासिर हुसैन वैसे तो तमाम हिट फिल्में बना चुके थे लेकिन उनकी पिछली दो फिल्में 'मंजिल मंजिल' और 'ज़बरदस्त' फ्लॉप हो चुकी थीं। तो तय हुआ कि नए चेहरों को लेकर कम बजट की वैसी ही फिल्म बनाई जाए जैसी कभी 'मेरा नाम जोकर' फ्लॉप होने पर राज कपूर ने बनाई थी।
पिता की सोच से अलग
नासिर हुसैन ने फिल्म की कहानी भी लिख रखी थी और एक दिन मंसूर खान को बुलाकर उन्हें इस फिल्म के निर्देशन का जिम्मा सौंप दिया। मंसूर खान ने आमिर खान को फिल्म के हीरो के तौर पर फाइनल करने से पहले तमाम नए लड़कों के स्क्रीन टेस्ट लिए। फिर तय हुआ कि घर का लड़का ही इन सबमें सबसे ठीक है। घर का लड़का यानी आमिर खान। नासिर हुसैन के भाई ताहिर हुसैन का बड़ा बेटा। मंसूर खान ने फिल्म की कहानी को बिल्कुल वैसा ही रखा जैसा कि उनके पिता नासिर हुसैन चाहते थे लेकिन सिर्फ शुरू के 11 सीन तक यानी जैसे ही फिल्म के ओपनिंग क्रेडिट्स शुरू होते हैं, फिल्म उस रास्ते चली जाती है जिधर मंसूर खान ने सोची थी।
रीना दत्ता ने दिन रात एक किए
आमिर खान की पहली पत्नी रीना दत्ता ने इस फिल्म की शूटिंग के दौरान बहुत मेहनत की। फिल्म के सुपरहिट गाने ‘पापा कहते हैं’ में वह जरा देर के लिए दिखती भी हैं। पर तब आमिर खान को इस बात की सख्त मनाही थी कि वह रिलीज से पहले किसी को अपनी शादी के बारे में कतई नहीं बताएंगे। फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ में आपको ‘महाभारत’ के अर्जुन भी नजर आएंगे। वह इससे पहले की नासिर हुसैन की दोनों फिल्मों ‘मंजिल मंजिल’ और ‘जबरदस्त’ में भी थे। इन कलाकार का असली नाम फिरोज है। फिल्म में मकरंद देशपांडे, शाहजाद खान और आमिर के भाई फैसल खान ने भी छोटे छोटे रोल किए हैं। इमरान खान ने फिल्म में आमिर के बचपन का रोल किया है।
आर डी बर्मन से नहीं जमी पटरी
मंसूर खान को फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ के लिए उनके पिता ने अपनी टीम के संगीतकार आर डी बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी विरासत में दिए। मंसूर की एक दो मीटिंग भी हुईं आर डी बर्मन से पर बात उन्हें कुछ जमी नहीं। उन दिनों आनंद मिलिंद कुछ फिल्मों में संगीत दे चुके थे। मंसूर को अपनी फिल्म के संगीत के लिए बिल्कुल नई सोच वाले संगीतकार चाहिए थे जो उनके हिसाब से धुनों में प्रयोग कर सकें और गीतकार को लिखने के लिए कुछ नया दे सकें। आनंद मिलिंद इस मामले में खरे साबित हुए और उन्होंने जो धुन बनाई उस पर मजरूह सुल्तानपुरी ने गाना लिखा, ‘पापा कहते हैं’।