भारतीय संस्कृति और भारतीय कला के प्रचार-प्रसार में जुटी संस्था संस्कार भारती के आयोजन सिने टॉकीज 2002 के समापन सत्र में सिनेमा में लोकतंत्र को मजबूत करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने इस मौके पर कहा कि सिनेमा उद्योग में आम लोगों की भागीदारी बढ़ने से ही इसे मजबूती मिलेगी। इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे लोगों को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि एक किसान का बेटा भी फिल्म बना सके।
Cine Talkies 2022: प्रसून जोशी बोले, किसान का बेटा भी फिल्म बना सके, सिने उद्योग को बनाना होगा ऐसा माहौल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दो दिन तक यहां मुंबई विश्वविद्यालय प्रांगण में चले सिने टॉकीज 2002 के आयोजन में भारतीय संस्कृति और सिनेमा के बीच रिश्ता और प्रगाढ़ करने पर गहन विचार विमर्श हुआ। सिनेमा को देश की ताकत बनाने और देश को आजाद कराने में सिनेमा के योगदान पर भी खास तौर से चर्चा हुई। इस अवसर पर प्रसून जोशी ने समावेशी सिनेमा की बात को रेखांकित करते हुए कहा, "अगर आप एक किसान और उसके संघर्ष पर फ़िल्म बनाने का इरादा रखते हैं तो आपको इस तरह का वातावरण निर्मित करना होगा जहां एक किसान का बेटा भी आकर फिल्म बना सके, वर्ना हमारा सिनेमा में कोरी कल्पनाओं से अधिक कुछ नहीं होगा। यह बहुत आवश्यक है कि सिनेमा बनाने वालों का संबंध गांवों, छोटे-छोटे शहरों और विभिन्न तरह की पृष्ठभूमि के लोगों से हो। अगर कुछ गिने-चुने लोग ही सिनेमा बनाते रहेंगे तो सिनेमा में कुछ ही बातें बार-बार दोहराई जाती रहेंगी।”
सेंसर बोर्ड अध्यक्ष ने कहा, “अगर फिल्मों में भारतीय संस्कृति की झलक देखनी है तो फिल्म मेकिंग को इस कदर आसान बनाना होगा कि हर कोई सिनेमा बना सके। फिल्म बनाना आखिर इतना मुश्किल कार्य क्यों होना चाहिए? सिनेमा में रूचि रखने वाले सभी प्रतिभावान लोगों को फिल्म बनाने के लिए सुलभ अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। दुनिया और हमारे सिनेमा में ये फर्क है कि हम अनुभूत सत्य को काफी महत्व देते हैं। कहानियों और फिल्म लेखन में अगर अनुभूत सत्य होगा तो हमारी फिल्मों में भारतीय संस्कृति की झलक जरूर देखने को मिलेगी। ऐसे में अगर लोग रामायण और महाभारत के अलावा निजी कहानियां भी कहेंगे तो उसमें भारतीय संस्कृति अवश्य दिखाई देगी। कोई जरूरी नहीं है कि लोग गिनी चुनी कहानियां ही बार-बार दोहराते रहें। हमें सिनेमा से जुड़ी चुनौतियों को भी अच्छी तरह से समझना होगा। सिनेमा में अच्छे कंटेंट की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता है। आवश्यकता है कहानी की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाए और भारतीय संस्कृति और देश की मिट्टी से जुड़ी कहानियों को प्राथमिकता मिले।"
इस मौके पर संगीतकार अनु मलिक ने अपने हिट गाने 'संदेश आते हैं...' का जिक्र करते हुए कहा, “देशभक्ति से परिपूर्ण इस गाने की गिनती हिंदी सिनेमा के इतिहास में अब तक के सबसे बेहतरीन गानों में होती है। एक संगीतकार के तौर पर मुझे आज भी इस बात का गर्व होता है कि मुझे इस इस गाने को स्वरबद्ध करने का सुनहरा मौका मिला। पिछले कई दशकों में रचे गये देशभक्ति के जज्बे से ओत-प्रोत तमाम गाने मेरे दिल के बेहद करीब हैं और मैं उन्हें आज भी बड़ी शिद्दत से सुनता हूं। मुझे एक भारतीय होने पर गर्व है और मेरा मानना है कि हमारा देश चमत्कारों का देश है। जहां तक देशभक्ति से परिपूर्ण गानों को संगीतबद्ध करने की बात है, मैं हमेशा से ही कुछ इस तरह से गानों को स्वरबद्ध करता हूं जिससे लोगों में देश-प्रेम की भावना जागे। आज भी बच्चे जब देशभक्ति वाले गीत सुनते हैं तो वे ऐसे गानों के प्रति जल्दी आकर्षित होते हैं।”
संस्कार भारती के उपाध्यक्ष अभिनेता नीतीश भारद्वाज ने इस मौके पर आने वाले 25 साल के लिए सिनेमा की दशा और दिशा तय करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा, “सिनेमा में बदलाव हो रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण फिल्म कश्मीर फाइल्स की सफलता है। आज कुछ फिल्मकार विलेन को हीरो बना के पेश कर रहे हैं। पहले भी एंग्री यंगमैन वाले किरदार बहुत प्रसिद्ध हुए हैं। लेकिन फिल्म कश्मीर फाइल्स की सफलता ने यह साबित कर दिया कि अब लोग वह देखना चाहते हैं कि उनके साथ हुआ क्या था। सिनेमा ऐसा माध्यम है जिससे समाज को बदला जा सकता है। अमेरिका ने सिनेमा के प्रभाव को बहुत पहले समझ लिया था। हमारे फिल्मकारों और कलाकारों का यह दायित्व बनता है कई भारतीय संस्कृति के धरोहर को आगे बढ़ाएं।''